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अमरनाथ यात्रा: स्वर्ग लोक की प्राप्ति का रास्ता

2017-05-07 19:52:38.0
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अमरनाथ यात्रा: स्वर्ग लोक की प्राप्ति का रास्ता

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कुछ इसे स्वर्ग की प्राप्ति का रास्ता बताते हैं तो कुछ मोक्ष प्राप्ति का। लेकिन यह सच है कि अमरनाथ, अमरेश्वर आदि के नामों से विख्यात भगवान शिव के स्वयंभू शिवलिंगम के दर्शन, जो हिम से प्रत्येक पूर्णमासी को अपने पूर्ण आकार में होता है, अपने आप में दिल को सकून देने वाले होते हैं क्योंकि इतनी लंबी यात्रा करने तथा अनेकों बाधाओं को पार करके अमरनाथ गुफा तक पहुंचना कोई आसान कार्य नहीं है इसलिए प्रत्येक यात्री जो गुफा के भीतर हिमलिंगम के दर्शन करता है अपने आप को धन्य पाता है और बहुत ही भाग्यशाली समझता है क्योंकि कई लोग तो खड़ी चढ़ाइयों को देख कर ही वापस मुड़ जाते हैं आधे रास्ते से।

जिस दिन देशभर में रक्षाबंधन का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है उसी दिन अमरनाथ की गुफा में भगवान शिव के स्वयंभू हिमलिंगम के दर्शनों के लिए हजारों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। यह गुफा राजधानी शहर श्रीनगर तथा जम्मू से क्रमशः 140 तथा 326 किमी की दूरी पर तथा समुद्रतल से 14500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। अमरनाथ गुफा में हिमलिंग के दर्शनों के समय सारी कश्मीर घाटी में किसी समय 'ओम नमः शिवाय' तथा 'बाबा अमरनाथ की जय' के उद्घोष की गूंज रहती थी लेकिन आज आतंकवादी गतिविधियों के कारण ऐसा नहीं होता है।

छड़ी मुबारक: यह यात्रा 'छड़ी मुबारक' के साथ चलती है, जिसमें यात्री एक बहुत बड़े जुलूस के रूप में अपनी यात्रा आरंभ करते हैं। इसमें अनगिनत साधु भी होते हैं जो अपने हाथों में त्रिशूल और डमरू उठाए 'बम बम भोले' तथा 'जयकारा वीर बंजरगी-हर हर महादेव' के नारे लगाते हुए बड़ी श्रद्धा तथा भक्ति के साथ आगे आगे चलते हैं।

'छड़ी मुबारक' हमेशा श्रीनगर के दशनामी अखाड़ा से कई सौ साधुओं के एक जुलूस के रूप में 140 किमी की विपथ यात्रा पर रवाना होती थी जिसका प्रथम पड़ाव पम्पोर, दूसरा पड़ाव बिजबिहारा में और अनंतनाग में दिन को विश्राम करने के बाद सायं को मटन की ओर रवाना होकर रात का विश्राम करके दूसरे दिन प्रातः एशमुकाम की ओर चल पड़ती थी। जबसे आतंकवाद की काली छाया कश्मीर पर पड़ी है तभी से 'छड़ी मुबारक' की शुरूआत जम्मू से की जाती रही है और दशनामी अखाड़ा तथा अन्य पड़ावों पर इसके विश्राम मात्र औपचारिकता बन गए थे अब यह पुनः अपनी पुरानी परंपरा के मुताबिक चल रही है। पहले यह छड़ी पहलगाम पहुंच कर दो दिन विश्राम करती थी, जहां से हजारों की संख्यां में यात्री इसके साथ गुफा की यात्रा के लिए आगे बढ़ते थे लेकिन अब यह पहलगाम में इतनी देर नहीं रूकती बल्कि आज यात्री छड़ी से पहले ही अपनी यात्रा आरंभ करके वापस भी लौट आते हैं।

यात्रा का आरंभ: प्रकृति की गोद में बसे पहलगाम से इसकी शुरूआत होती है और कोई कोई जो संपन्न होता है वह यात्रा खच्चरों पर करता है जबकि बाकी लोग पैदल ही यह यात्रा करते हैं। कहा जाता है कि पहलगाम से पवित्र गुफा तक का मार्ग संसार की सुंदरतम पर्वत मालाओं का मार्ग है जो अक्षरशः सत्य है। इसमें हिमानी घाटियां, ऊंचाई से गिरते जलप्रपात, बर्फ से ढके सरोवर, उनसे निकलती सरिताएं, फिर उन्हें पार करने के लिए प्रकृति द्वारा निर्मित बर्फ के पुल। सब मिलकर प्रकृति का ऐसा अद्धभुत खेल प्रकट करते हैं कि मानव इन सब को मंत्रमुगध होकर देखता है और प्रकृति की गोद में विचरता हुआ, मनमोहक प्राकृतिक छटा का आनंद पाता है और वातावरण में अजीब सी शांति महसूस करता है।

अठखेलियां करतीं लिद्दर नदी के किनारे बसा एक छोटा सा कस्बा पहलगाम के नाम से जाना जाता है। इस कस्बे में ठहरने के लिए कभी सरकारी आरामगाह तथा होटल हुआ करते थे लेकिन आज आतंकवाद सब कुछ लील गया है। यहीं से यात्रा के लिए आवश्यक उचित सामान मूल्य या किराए पर मिल जाता है। यात्रियों को यात्रा के लिए भारी ऊनी कपड़े, मंकी कैप, बरसाती, छाते छड़ी, टार्च, मोमबती, पोलीथीन के बैग तथा थर्मस रखना आवश्यक है। टेंटों, खच्चर, पालकी तथा पिट्ठू का इंतजाम भी यहीं से हो जाता है जिनका सरकारी तौर पर दाम तय होता है। वैसे तो रास्ते में स्वयंसेवी संगठनों द्वारा लंगर लगाए गए होते हैं फिर भी यात्रियों को अपने साथ कुछ जलपान का सामान ले जाना चाहिए।

पहलगाम से श्रावण पूर्णिमा से तीन दिन पहले, शिव की प्रतीक पवित्र छड़ी के नेतृत्व में ढोल, ढमाकों, दुंदुंभियों और 'हर-हर महादेव' के जयघोष के बीच साधु संतों की टोलियों के साथ यात्री अगले पड़ाव चंदनवाड़ी की ओर बढ़ते हैं। यह पहलगाम से 16 किमी की दूरी पर स्थित है। चंदनवाड़ी 9500 फुट की ऊंचाई पर पहाड़ी नदियों के संगम पर एक सुरम्य घाटी है और लिद्दर नदी पर बना बर्फ का पुल आकर्षण का मुख्य केंद्र होता था लेकिन अब अधिक तापमान के कारण उसके दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। यहीं पर जलपान करके तथा थोड़ा विश्राम करके आगे की कठिन चढ़ाई 'पिस्सू घाटी' की ओर बढ़ा जाता है। पहलगाम से चंदनवाड़ी कार या टैक्सी में एक घंटे के भीतर पहुंचा जा सकता है क्योंकि यह रास्ता वाहन योग्य है।

चंदनवाड़ी से 13 किमी दूर है शेषनाग नामक स्थान। पिस्सू टाप की कठिन चढ़ाई पार कर जोजापाल नामक चारागाह से गुजरते हुए लिद्दर के किनारे किनारे चलते हुए शेषनाग पहुंचा जा सकता है। यहां पर झील का सौंदर्य अद्भुत है। शेषनाग झील 12200 फुट की ऊंचाई पर हिमशिखरों के बीच घिरी हिम से आच्छादित झील, लिद्दर नदी का उद्गम स्थल है। यहां रात्रि को लोग विश्राम टेंटों की बस्ती में करके आगे की यात्रा आरंभ करते हैं। यहां के हिममिश्रित जल से स्नान करने के बाद चढ़ाई से हुई सारी थकावट दूर हो जाती है।

फिर यहीं से यात्रा का दूसरा व दुर्गम चरण आंरभ होता है, 13 किमी दूर पंजतरणी की ओर। फिर से शुरू होती है एक ओर कठिन चढ़ाई। महागुनस शिखर की ओर जो 14800 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इस शिखर पर आक्सीजन की कमी है क्योंकि अमरनाथ यात्रा के दौरान यही शिखर सबसे ऊंचा है। आक्सीजन की कमी के कारण सांस फूलती है। हालांकि स्थान स्थान पर चिकित्सा संबंधी सहायता भी उपलब्ध रहती है। शिखर पर चढ़ने के उपरांत पोशपथरी को पार करके 12500 फुट की ऊंचाई पर भैरव पर्वत के दामन में है पांच नदियां अर्थात पंजतरणी। यहां पर यात्री रात को विश्राम करते हैं और प्रातःकाल भक्त पवित्र धाराओं में स्नान करके गुफा की ओर आगे बढ़त हैं जो पंजतरणी से मात्र 6 किमी की दूरी पर है।

पंजतरणी से गुफा तक के मार्ग में पुनः दुर्गम चढ़ाई का सामना करना पड़ता है। लोग सांस लेते, विश्राम करते प्रभु भोले नाथ के दर्शनों की अभिलाषा लिए पवित्र गुफा की ओर बढ़ते हैं। रास्ता भयानक भी है और सुंदर भी। पगडंडी से नीचे नजर जाते ही खाइयों में बहती हिम नदी को देख कर डर लगता है।

फिर एक मोड़ से गुफा का दूर से दर्शन होने पर लोग उत्साहित हो जय-जयकार करते बर्फ के पुल को पार करके पहुंचते हैं पवित्र गुफा के नीचे बहती अमर गंगा के तट पर। यहीं से स्नान करके लोग उस पवित्र गुफा में जाते हैं लगभग 100 फुट चौड़ी तथा 150 फुट लंबी गुफा में प्राकृतिक पीठ पर हिम निर्मित शिवलिंगम के दर्शन पाकर लोग अपने आप को धन्य समझते हैं। यही हिमलिंग तथा लिंगपीठ ठोस बर्फ का होता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही मिलती है। गुफा में जहां-तहां पानी की बूंदें टपकती रहती हैं लेकिन शिवलिंग एक विशेष स्थान पर बनता है और यह लिंग चंद्र की कलाओं के साथ घटता बढ़ता है तथा पूर्णिमा को पूर्ण और अमावस को विलीन हो जाता है। गुफा में पार्वती तथा गणेश जी के प्रतीक लिंग भी देखने को मिलते हैं और फिर दर्शनों की आस को पूरी करक लोग वापसी की राह पकड़ लेते हैं। वैसे सोनमार्ग-बालटाल से भी एक रास्ता है जिससे एक दिन में यह यात्रा पूरी की जा सकती है।

अमरनाथ की अमरकथा: इस कथा का नाम अमरकथा इसलिए है क्योंकि इसको सुनने से शिवधाम की प्राप्ति होती है ऐसा कहा गया है। कहा जाता है कि यह वह परम पवित्र कथा है जिसको सुनने वालों को अमरपद की प्राप्ति होती है तथा वे अमर हो जाते हैं। यह कथा श्री शंकर भगवान ने इसी गुफा में (अमरनाथ की गुफा में) भगवती पार्वतीजी जी को सुनाई थी। इसी कथा को सुनकर ही श्री शुकदेव जी अमर हो गए थे। जब भगवान शंकर भगवती पार्वती को यह कथा सुना रहे थे तो वहां एक तोते का बच्चा भी इस परम पवित्र कथा को सुन रहा था और इसे सुनकर फिर उस तोते के बच्चे ने श्री शुकदेव स्वरूप को पाया था। 'शुक' वैसे भी संस्कृत में 'तोते' को कहते हैं और इसी कारण से बाद में वह फिर मुनि शुकदेव के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुए थे।

जैसा कि कहा जाता है कि शुकदेव जब नैमिषारण्य गए तो वहां ऋषियों मुनियों ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया और उनसे अमर कथा सुनाने का आग्रह किया और फिर क्या था 'अभिमानी' शुक ने अपनी तारीफ में पढ़े गए कसीदों से खुश होकर अमर कथा सुनानी आरंभ कर दी।

कहा जाता है कि जैसे ही कथा आरंभ हुई तो कैलाश पर्वत, क्षीर सागर और ब्रह्मलोक भी हिलने लगे। ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा समस्त देवता उस स्थल पर पहुंचे जहां पर अमर कथा चल रही थी। तब भगवान शंकर को स्मरण हुआ कि यदि इस कथा को सुनने वाले अमर हो गए तो पृथ्वी का संचालन बंद हो जाएगा और फिर देवताओं की प्रतिष्ठा में अंतर आ जाएगा। इसीलिए भगवान श्री शंकर क्रोध में आ गए और उन्होंने श्राप दिया कि जो इस कथा को सुनेगा वह अमर नहीं होगा परंतु वह शिव लोक अवश्य प्राप्त करेगा।

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