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जस्टिस कर्णन की सजाöसंसद के अधिकार क्षेत्र में दखल

👤 admin5 | Updated on:2017-05-17 15:32:43.0
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बसंत कुमार

सर्वोच्च न्यायालय ने अभी हाल ही में कोलकाता उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीश जस्टिस कर्णन को न्यायालय की अवमानना के मामले में छह महीने की कैद की सजा सुनाई है। न्यायपालिका के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि एक सिटिंग जज का पहले उनका काम छीन लिया गया और फिर उन्हें छह महीने की सजा सुना दी। गौरतलब है कि जस्टिस कर्णन दलित समुदाय से हैं और अगले महीने सेवानिवृत्त होने वाले हैं। जस्टिस कर्णन के प्रकरण की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखकर उच्च न्यायपालिका के कुछ जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। अगर उनको ऐसा लगा था कि उच्च न्यायपालिका में कुछ लोग भ्रष्ट हैं तो उनके साहस या दुस्साहस की सराहना की जानी चाहिए थी और मामले की जांच करा ली जाती तो एक अनूठी पहल होती परन्तु ऐसा करने के स्थान पर उनका कार्य छीन लिया गया और मामला इतना पेचीदा हो गया कि आज वे सजा/कारावास से बचने के लिए इधर-उधर हाथ-पैर मारने पर मजबूर हैं। वैसे उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मामला नया नहीं है। 1980 के दशक में तीन न्यायाधीशों की समिति ने जस्टिस रामास्वामी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले को सही पाया परन्तु उन पर महाभियोग का प्रस्ताव नहीं पारित हो सका।

क्योंकि उस समय की सत्ताधारी पार्टी ने उत्तर-दक्षिण की राजनीति के चलते सदन का बहिष्कार किया और जस्टिस रामास्वामी महाभियोग प्रक्रिया द्वारा अपदस्थ होने से बच गए। उसके पश्चात सन 2012 में जस्टिस गांगुली के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया पूरी होने से पहले उन्होंने त्याग पत्र दे दिया जिसके कारण अपने रिटायरमेंट बेनिफिट्स लेने में कामयाब रहे। जहां तक न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों का प्रश्न है उसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय का वीरास्वामी मामले में दिया गया फैसला भ्रष्टाचार की समस्या को और कम्प्लीकेटेड बना देता है जिसमें यह कहा गया कि किसी भी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों में जांच सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती। वर्ष 2012 में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने केंद्रीय कानून मंत्रालय को लिखे गए एक पत्र में लिखा है कि सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच न्यायालय स्वयं करेगा और उसके पश्चात ही मामला सीबीआई को भेजा जा सकेगा।

(हिन्दुस्तान टाइम्स दिनांक 20.9.2012 में प्रकाशित) इस विषय में पूर्व डीजीपी श्री केपीएस गिल के व्यक्त विचार काफी समीचीन लगते हैं इन परिस्थितियों को जानते हुए जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के मामले में कुछ भी गलत नहीं किया।

यदि कुछ विद्वान इसको गलत मानते हैं तो उनके खिलाफ संविधान में प्रदत्त नियमों के अनुसार महाभियोग की प्रक्रिया चलाई जानी चाहिए थी। भारतीय संविधान में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अनुच्छेद 124 (सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति) और अनुच्छेद 217 (उच्च न्यायालय में नियुक्ति) में दी गई है। ये अनुच्छेद संविधान सभा में काफी चर्चा के बाद संविधान में लाए गए उसके पश्चात अनुच्छेद 214 और 124 में यह स्पष्ट किया गया है कि उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों को भ्रष्टाचार एवं अन्य अवांछनीय कंडक्ट करने पर महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा पद से हटाया जा सकता है।

जस्टिस कर्णन की न्यायाधीश के पद निर्वाहन की शक्तियां छीनने और उन्हें न्यायालय की अवमानना में छह माह की सजा देने से पूर्व हमें यह जानना आवश्यक है कि किस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने कोलेजियम सिस्टम द्वारा न्यायाधीशों की शक्तियां संसद से छीनी। यद्यपि संविधान में निहित अनुच्छेद 124 और 217 में दी गई प्रक्रिया उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया बहुत ही स्पष्ट थी परन्तु एसपी गुप्ता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, एडवोकेट ऑन रिकार्ड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया ने इसके लिए डिबेट का रास्ता खोला। उसके पश्चात नौ सदस्यीय बेंच ने न्यायालय की आजादी के नाम पर कोलेजियम सिस्टम अपनाकर न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार संसद से छीन लिया। जस्टिस कर्णन के मामले में भी एक न्यायाधीश को महाभियोग के द्वारा हटाने का संसद का अधिकार भी छीन लिया।

सवाल केवल संसद के अधिकार छीन लेने का नहीं है। यदि मांटेस्क्यू के शक्ति पृथप्करण के सिद्धांत का उल्लंघन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में होगा तो देश में बहुत खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। देश के अधिकांश उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय अपने अपीलीय जूरिसडिक्सन में आने वाले करोड़ों केसों को निपटाने की बजाय पीआईएलस पर कार्यपालिका के कामों में निरंतर अपने फैसले देता रहता है तो क्या अब मान लिया जाए कि देश अब सुप्रीम कोर्ट से चलेगा।

यह बात समझ में नहीं आ रही है कि क्यों सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर की शर्तों को नहीं माना जा रहा है और विधायिका के अधिकार क्षेत्र को दिनोंदिन छीना जा रहा है। अगर जस्टिस कर्णन का व्यवहार उचित नहीं है और उनका दिमागी मेडिकल परीक्षण की आवश्यकता समझी गई तो इसके लिए जिम्मेदार कोलेजियम है न कि और कोई। संविधान में दिए गए नियमों के अनुसार न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के विषय में केवल संसद में चर्चा हो सकती है जो व्यवहार जस्टिस कर्णन के साथ किया गया कल किसी और जज के साथ किया जा सकता है। ऐसे जज भययुक्त वातावरण में कैसे काम कर सकते हैं। यह पूरे देश में स्थापित प्रक्रिया है कि आपराधिक मामले में बिना सुनवाई के और आरोपी को अपना पूरा बचाव का मौका दिए बिना सजा नहीं सुनाई जा सकती परन्तु दुर्भाग्यवश इस मामले में ऐसा किया गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि जस्टिस कर्णन के साथ यह सब इस कारण हो रहा है क्योंकि वे दलित समुदाय से हैं। संसद के सुप्रीम स्वरूप के प्रति पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा संविधान सभा में 1949 में दिया गया भाषण काफी महत्वपूर्ण देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीन प्रमुख स्तम्भ हैं और हमारी व्यवस्था सुचारू रूप से तभी काम कर सकती है जब ये तीनों स्तम्भ दूसरे के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने से बचें।

हमारे समाज में एक और समस्या यह है कि यदि कोई आर्थिक रूप से या सामाजिक रूप से कमजोर व्यक्ति जाने-अनजाने में कोई गलत काम कर देता है तो हम सभी उसे सजा दिलाने के लिए कानून को सौंपने के बजाय कानून अपने हाथ में ले लेते हैं। आज हम 21वीं शताब्दी में जी रहे हैं और सदियों से दिमाग में पल रही सड़ी-गली मानसिकता को त्यागना होगा। कहीं पर तथाकथित गौरक्षक गायों की खाल उतारने के आरोप में दलितों को पीट-पीटकर अधमरा कर देते हैं। कहीं पर दलितों की बारात को पानी न पीने देने के उद्देश्य से कुएं में मिट्टी का तेल डाल दिया जाता है। यदि कोई दलित की बेटी किसी गैर-बिरादरी के युवक से गलती से प्यार कर बैठती है तो समाज के ठेकेदार या तो उसे मौत के घाट उतार देते हैं या उसे निर्वस्त्र करके घुमाते हैं। जस्टिस कर्णन के मामले में भी संविधान का उल्लंघन करके एक दलित न्यायाधीश को अनुचित रूप से जेल की सजा सुनाई गई है परन्तु आश्चर्य की बात है कि सामाजिक न्याय के नाम पर जेएनयू कैंपस में इकट्ठा होकर देश विरोधी नारे लगाने वाले नेता जो दलित आदिवासी और अल्पसंख्यकों की राजनीति करते नहीं थकते, इस समय चुप्पी साधे हुए हैं। जबकि एक दलित न्यायाधीश द्वारा व्हिसिल ब्लोवर का काम करने पर उसे कानून को अपने हाथ में लेकर सजा दी गई है। यह कैसा दुर्भाग्य है कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी देश में गरीबों और वंचितों को सजा देने या दिलाने के लिए लोग कानून का सहारा लेने के स्थान पर कानून ही हाथ में ले लेते हैं। चाहे वे सभ्य समाज के ठेकेदार हों, तथाकथित गौरक्षक हों या अन्य लोग। ये लोग कानून को हाथ में लेते समय भारतीय संविधान की भी परवाह नहीं करते। भारतीय संविधान व न्यायपालिका हर भारतीय के लिए पूजनीय हैं और इनकी प्रतिष्ठा की रक्षा की जानी चाहिए।

(लेखक एक पहल नामक एनजीओ के राष्ट्रीय महासचिव हैं। लेख के विचार लेखक के अपने हैं।)

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