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लोभ और अहंकार के बोझ से डूबती बसपा

👤 admin5 | Updated on:2017-05-18 15:30:52.0
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राजनाथ सिंह सूर्य

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने मायाजाल से बाहर निकलकर भीतरी स्थिति का जो खुलासा किया है, उसने मायावती की सत्ता सम्पन्नता और लक्ष्य के संबंध में वर्षों से बनती जा रही अवधारणा को पुष्ट कर दिया है। राजनीति में मायावती के उदय और अस्ताचल की ओर जाने की अवधि इतनी अधिक रहस्यमय है कि उसकी परतें उखाड़ने के लिए मनसा, वाचा, कर्मणा तैयार होने में सिद्दीकी को तीन दशक लग गए। बहुजन समाज पार्टी के उत्थान में बलि चढ़ाए जाने वालों की लंबी फेहरिस्त है और अभी बहुतों के उसी रास्ते पर जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन किसी ने शायद ही कभी सोचा होगा कि उनके नसीब में सिद्दीकी से जुदा होना भी होगा। अपने मंत्र से मुग्ध कर जिन लोगों को मायामय बनाने का मायावती पर आरोप लगाया जाता रहा है उसमें नसीमुद्दीन का नाम सर्वोपरि है। कहते हैं ज्यादा मि"ाई में भी खटाई पड़ जाती है। यह खटास अब कहां से पड़नी शुरू होकर भड़ास में बदल स्वाद बिगाड़ने वाली स्थिति में पहुंच गई।

उसकी अवधि भले ही कम हो लेकिन विवाद महाभारत की कथाओं से कम नहीं है। इसलिए मैं उसके विवरण में नहीं जाना चाहता। हां, यह अवश्य स्मरण दिलाना चाहता हूं कि चाहे चुनाव हो या उपचुनाव हारते-हारते थम गए कांशीराम और मायावती को अपने लिए मुफीद समय पर 1993 में मुलायम सिंह यादव मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम के नारे के साथ मैदान में बाजी मार ली। तब उनका असली स्वरूप फ्रकट होना शुरू हो गया था। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को हाथ में ब्रीफकेस लेकर मीराबाई मार्ग स्थित अतिथि गृह में जहां कांशीराम आकर "हरते थे, कई बार जाते लोगों ने देखा और जब 1995 में मीराबाई गेस्ट हाउस कांड हुआ जिसमे मायावती के मर जाने जैसी स्थिति पैदा हो गई थी। मुलायम सिंह को कांशीराम से फरमाइश पूरी करने के लिए घुटने टेकते देखा गया है। ऐसी स्थिति उस दिन भी थी जब कांशीराम ने मंत्रिमंडल में अपनी पार्टी कोटे के मंत्री मोहम्मद मसूद खां को जो शिक्षा मंत्री थे मंत्री पद से बर्खास्त किया। अपितु जिस बंगले में रहते थे उससे उनका समान फेंकवा दिए जाने के बाद ब्रीफकेस की अहमियत पर ध्यान देने की मंशा से मुलायम सिंह को इतना आतंकित कर दिया था कि उन्होंने एक बार में ही हुक्म के मुताबिक कार्रवाई करने के बाद ही फर्शों से लगा "sकने का साहस किया।

मुलायम सिंह यादव को 1991 के चुनाव में वे बुरी तरह हार गए थे। कांशीराम की पार्टी बहुजन समाज पार्टी को अहमियत नहीं मिल पा रही थी लेकिन 1993 में एक दूजे के लिए मुफीद साबित हुए। कांशीराम को लोकसभा में स्थान मिला और मुलायम सिंह को राज्य। कांशीराम को लोकसभा भले ही रास आ गई हो, मुलायम सिंह को राजसत्ता संभालना जी का जंजाल बन गया। जो मीराबाई गेस्ट हाउस कांड के उबाल के रूप में ऐसा राजनीतिक बदलाव का कारण बना जिसने मायावती को राजनीतिक रूप से स्थापित कर दिया था। आम 40 विधायकों के साथ पहली बार सभी गैर समाजवादी दलों के बाह्य समर्थन से मुख्यमंत्री बनी मायावती ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चार बार मुख्यमंत्री बनी और हर बार उनकी सत्ता की हनक और सम्पदा चमकदार होती गई। कहते हैं कि अति सर्वत्र वर्जयेत। मायावती के लिए इस कहावत के माने नहीं। अति ही उनकी विशेषता बन गई और उनके इस अति के कारण कांशीराम के जाने के बाद एक-एक कर नींव के पत्थर और महल के स्तम्भ समझे जाने वालों को मायावती नया आशियाना बनाने के लिए उखाड़ फेंकती गई। उन्हें भी नहीं छोड़ा जो उनके आशियाना बनाने के कारीगर थे। कहते हैं कि शाहजहां ने ताजमहल बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे, ताकि दोबारा वैसा भवन न बन सके। मायावती ने अपने वैभव के रंग महल को हकीकत बनाने वाले कारीगरों के साथ भी वही किया। शाहजहां के कारीगरों की तरह मायावती के अंग-भंग किए गए कारीगर सुप्त होने की बजाय जागृत होकर भीतर की हकीकत का वर्णन करते गए जो अविश्वसनीयता की लंबी अवधि के बाद विश्वसनीयता के लिए सदाचार तंत्र पा गई कि अब अविश्वास करने वालों को भी पछतावा हो रहा है। टूटे-फूटे घर और हर पार्ट से बजने वाली साइकिल की पूंजी से राजनीति की शुरुआत करने वाली मायावती दलित की बेटी से दौलत की देवी बनने के लिए फ्रत्यक्ष रूप में देवी के रूप में चढ़ावा के लिए जिस वर्ग को सम्मोहित किए हुए थी, उनका भी 2017 के उत्तर फ्रदेश विधानसभा निर्वाचन में मोहभंग हो जाने के कारण आसमान में ही उड़ते रहने वाली मायावती जो भारत की राजनीतिक रंगत बदलने के लिए अकेले दम पर भाड़ फोड़ने में समर्थ होने का दावा कर रही थीं, धड़ाम से इतनी नीचे गिर पड़ी कि उनसे उ"कर धूल झाड़ने से पहले ही सदा सहाय रहने के तत्पर नसीमुद्दीन भी उनसे नाता तोड़ गए और अब खुलासा करने पर उतारू हो गए हैं। मायावती और नसीमुद्दीन ने एक-दूसरे के बारे में जो खुलासा जंग छेड़ दिया है, उससे पिछले चार दशक से राजनीति में सत्ता सम्पन्नता के लिए बनाई गई साथ मित्रता के परिणामों पर से तेजी के साथ पर्दा उ"ाना शुरू कर दिया है और जो सम्पन्नता के अतिरेक से ग्रस्त अहंकार भरी अभिव्यक्तियों से हनक बनाए रखना चाहते हैं वे `पुन मूषको भव' कब तक हो सकेंगे, यह निर्भर करता है जो एजेंसियों के नियत और सक्रियता पर जिसको सदैव संदेह की आशंका घेरे रहती है।

यह बहुत कम लोग जानते हैं कि मायावती को सहयोगियों के फ्रति मालिकाना व्यवहार कांशीराम से उत्तराधिकार में मिली सौगात है। लेकिन मायावती द्वारा बकौल नसीमुद्दीन-मुसलमानों को गद्दार कहने की फ्रेरणा संभवत कांशीराम के उस आचरण का दुर्भाग्य मात्र है जो उन्होंने तीन दशक पूर्व मोहम्मद मसूद खां का सामान फेंकवाने के बाद लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्प मे आयोजित जनसभा में `मुसलमान कौम विश्वास के लायक नहीं है' कहकर फ्रकट किया था। सार्वजनिक जीवन में सत्ता से बढ़ती जा रही सम्पन्नता की होड़ में अब तुलनात्मक समीक्षा का दौर चल पड़ा है। दिखावे और हकीकत में जो अंतर दिखाई पड़ता था, उस पर से फ्रगल्भता से पर्दा हटा दिया है। कुछ वर्ग या स्वार्थी लोग भले ही अभी न देख पाने की मुद्रा में हों लेकिन राजनीति पर एकाधिकारी बनने वाले व्यक्तियों और परिवारों की सम्पदा में क्यों, कैसे और कब-कब किस तरीके से इजाफा होता रहा है। उस पर पड़ा पर्दा राजनीति में आई नई आंधी के कारण स्वत तार-तार होकर असलियत से रूबरू होने का अवसर फ्रदान कर रही है। चाहे परिवार की लंबी कुर्बानी की दुहाई हो या फिर दलित की बेटी से डाह की शिकायत। पर्दा डाले रखने में असफल साबित हो रही हैं। भेड़िया आया-भेड़िया आया कहकर एक दो बार लोगों को बुलावे में रखा जा सकता है। लेकिन यही भुलावा असली भेड़िया आने के शोर को अनसुना करा देता है, और भेड़िया शोर मचाने वाले को खा जाता है। कुछ ऐसी ही स्थिति सत्ता की सम्पन्नता के लिए साधन बनाकर राजनीति में उतरने वालों की होती जा रही है। अब उनके ही बीच आपसी संघर्ष चल पड़ा है। नसीमुद्दीन और मायावती का दंगल अकेला अखाड़ा नहीं है, दिल्ली में केजरीवाल और कपिल मिश्रा, चेन्नई में पनीर सेल्वम और शशिकला का दंगल भी चल रहा है। कोलकाता में अखाड़ा खुद चुका है। ममता भरी बंदोपाध्याय कब तक पूजनीय रहेंगी, इस पर फ्रश्न चिन्ह लग चुका है, रहीम ने कहा है कि अति से रगड़ करै जो कोई, अनल फ्रगट चंदन से होई। सम्पन्नतावादी राजनीतिज्ञों ने इस रगड़ की जो अतिशयता की है, उसी का परिणाम उन्हें भुगतना पड़ रहा है। कबीरदास ने `माया महा"गिन हम जानी' के साथ ही `भैया की दूल्हन, लुटौ बजार' का संदेश देने के बाद समाधान के लिए भी कहा है कि `कबीरा खड़ा बजार में मांगे सबकी खैर, न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।' ऐसा ही एक कबीर अब बाजार में खड़ा है।

(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)

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