Home » आपके पत्र » पहचान गई तो सब गया

पहचान गई तो सब गया

👤 | Updated on:2016-08-30 01:02:18.0
Share Post

 आज की तिथि में दुनिया में अनेकों ईसाई राष्ट्र, अनेकों मुस्लिम राष्ट्र और अनेकों बौद्ध राष्ट्र हैं पर एक भी घोषित हिन्दू राष्ट्र नहीं रह गया है जबकि दुनिया में हिन्दुओं की एक बहुत बड़ी आबादी है। जिस भारत भूमि को हिन्दुओं की बड़ी आबादी को देखकर, बाहरी आक्रांताओं तक ने हिन्दुस्तान नाम दिया। अफसोस कि अंग्रेजों से आजादी पाते-पाते हमने अपनी यह पहचान खो दी और अंग्रेजों से सत्ता संभालने वाले हमारे सत्ता वाहक नेताओं ने आश्चर्यजनक रूप से इसे हिन्दू राष्ट्र बनाने का मौका गंवाकर इसे लोकतांत्रिक राष्ट्र बना डाला जबकि सन् 1947 में भारत से अलग होकर पाकिस्तान एक घोषित मुस्लिम राष्ट्र के रूप में खड़ा हो रहा था और बाद में पाकिस्तान से अलग होकर पूर्वी पाकिस्तान को बंगलादेश नाम से एक मुस्लिम राष्ट्र के रूप में ही खड़ा हुआ जबकि वहां हिन्दुओं की काफी आबादी है। क्या इसका अर्थ यह लिया जाए कि हिन्दू राज करने का सामर्थ्य नहीं रखते हैं। अगर यहूदियों को इजरायल के रूप में एक घोषित यहूदी राष्ट्र न मिला होता तो अब तक यहूदियों का अस्तित्व ही धरती से मिट चुका होता। हमारे पड़ोस में स्थित नेपाल अंतिम हिन्दू राष्ट्र था पर चीन समर्थित माओवादी आंदोलन के परिणामस्वरूप उसने भी विलक्षण हिन्दू राष्ट्र की पहचान की प्रतीक राजशाही को हटाकर लोकतंत्र को अपना लिया पर हम देख सकते हैं कि जब से नेपाल ने अपनी हिन्दू राष्ट्र की पहचान छोड़ी है, वहां अराजकता और राजनैतिक अस्थिरता का ही दौर चला आ रहा है। इन हालात में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि एक घोषित हिन्दू राष्ट्र की गैर-मौजूदगी में हिन्दू कौम एक दिन यकीनन अपने आपको कठिन स्थिति में पाएगी, जब लोकतंत्र बनाई गई इसकी अपनी भूमि पर गैर-हिन्दू कौमें बहुमत पर पहुंचेंगी और यह खतरा यकीनी भी है और नजदीक भी। इसलिए हमें हिन्दू हितों की सुरक्षा के लिए तुरन्त यह सुनिश्चित करना होगा कि हिन्दू और हिन्दू राष्ट्र की घोषित पहचान उस भूमि पर तो कम से कम बनी ही रहे, जहां सदियों से यह बनी चली आई है। हमें याद रखना होगा कि पहचान गई तो सब गया। -राजन गुप्ता, कंझावला, दिल्ली। बसों में सीटें आरामदायक नहीं हरियाणा रोडवेज की बसों की बाडी बिल्डिंग और अंदरुनी साज-सज्जा का कार्य देखने वाले, गुड़गांव स्थिति हरियाणा रोडवेज इंजीनियरिंग कारपोरेशन का ध्यान बसों की बेआरामदायक सीट व्यवस्था की ओर दिलाना चाहते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि इस समय हरियाणा रोडवेज की बसों का स्वरूप बेहद आकर्षक है, मगर बसों के अन्दर जिस तरह से सीटें लगाई गई हैं, वह यात्रियों के लिए बेहद तकलीफदेय ठहरती हैं। एक तो आगे-पीछे की सीटों के बीच में इतनी कम जगह छोड़ी गई है कि यात्रियों के घुटने आगे की सीट से सटे बिना रहते ही नहीं हैं। दूसरे आगे की सीट की पीठ को ऊपर से थोड़ा पीछे की ओर झुकाया गया है, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है। इन तंग सीटों पर यात्री बैठ ही मुश्किल से पाता है अपने सामान को तो वह रखे कहां। हालात इस कदर तक तकलीफदेय हैं कि अगर किसी यात्री को खिड़की की तरफ की खाली सीट पर बैठना हो तो साथ वाली सीट पर बैठे यात्री को अपनी टांगे बीच के रास्ते की तरफ निकालनी ही पड़ती हैं। दुर्घटना हेने की स्थिति में जो तंग सीटों पर बैठे हुए या फंसे हुए यात्रियों को ज्याद चोट लगने की संभावनाएं ज्यादा हो जाती हैं। अतएव यह सुनिश्चित किया जाना परम आवश्यक हो जाता है कि बसों में यात्री कम से कम बैठ तो आरामदायक स्थिति में पाएं और इसके लिए आवश्यक है कि आगे-पीछे की सीटों में यात्री और उसके सामान के हिसाब से पर्याप्त दूरी रखी जाए और आगे की सीट की पीठ आगे से थोड़ा पीछे की ओर मुड़ी हुई जरूरी हो पर पीछे की तरफ से वह 90 डिग्री के कोण पर सीधी होनी चाहिए। इससे यात्री सीट पर बैठ भी आसानी से पाएंगे और सीट से उठकर निकल भी आसानी से सकेंगे। -नीलम रानी, विकासपुरी, दिल्ली। राजधानी में ग्रामीण सेवा राजधानी में कई इलाके ऐसे हैं जहां ग्रामीण सेवा के रूप में एक वाहन चलता है। इन ग्रामीण सेवाओं की तादाद दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई राजधानी में रह रहे लोगों को इनकी जरूरत है। पूर्वी, उत्तरी, दक्षिणी, पश्चिमी राजधानी के सभी इलाकों में हम ग्रामीण सेवाओं को प्रतिदिन देखते हैं। जब हम इसमें बैठकर सफर करते हैं तो हमें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अक्सर देखने को मिलता है कि जितनी सीटें इसके अन्दर बैठने के लिए होती हैं उससे कहीं ज्यादा लोग इसके अन्दर बैठते हैं तथा चार से पांच सवारियां तो पीछे खड़े होकर सफर करते हैं। यह ज्यादातर उन इलाकों में देखने को मिलता है जहां बस की सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती या फिर बहुत कम मात्रा में होती है। कई बार तो ऐसे मामले भी देखने को मिलते हैं जिसके अंतर्गत मुसाफिर को गलत बोलकर बिठाया जाता है परन्तु वहां ग्रामीण सेवा नहीं जाती है और फिर लड़ाई-झगड़े देखने को मिलते हैं। अगर कोई पहली बार शहर आया है तो उसे यह पूरी तरह से बेवकूफ बनाने में कायमाब हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में बेचारा मुसाफिर पूरी तरह से मजबूर दिखाई पड़ता है। राजधानी में पहले से ही लोगों को इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है क्या अब हमें इसकी आदत भी डालनी पड़ेगी। मैं विनती करता हूं कि दिल्ली सरकार इस पर सोचे तथा कोई कड़े कदम उठाए। -सुरेश नैना, पंजाबी बाग, दिल्ली। देश की आजादी या बर्बादी विशाल कमर तोड़ महंगाई ने कर दिया, सचमुच देश के अधिकांश गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों का जीना हराम। सत्ता दल गठबंधन सरकारों ने गलत विदेशी आर्थिक नीतियों को लागू करके, देश की स्वतंत्रता की सबसे बड़ी कीमत भूलकर किया आजादी के दीवाने, देशभक्त क्रांतिकारी, शहीद सपूतों व महापुरुषों का घोर अपमान। -देशबंधु, उत्तम नगर, नई दिल्ली। अपना देश अपनी माटी, दिल्ली हो या गुवाहाटी भारत के उत्तर पूर्व के आठ राज्यों को आठ बहनें भी कहते हैं। सिक्किम, अरुणाचल, असम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा। स्वतंत्रता के समय सिक्किम को छोड़कर शेष राज्य असम के ही भाग थे। आज पूर्वोत्तर राज्यों में अलगाव की भावना बह रही है। इसका मुख्य कारण है उत्तर और उत्तर पूर्व राज्यों के बीच कभी संवाद नहीं हुआ। हम अपना अतीत भी भूल गए हैं। पुराणों में और महाभारत में पूर्वोत्तर का वर्णन मिलता है। आजकल पूर्वोत्तर के लोगों को मंगोल कहा जाता है जबकि वैदिक काल में इन्हें किरात कहा जाता था। भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मणी अरुणाचल से थीं, अर्जुन की पत्नी चित्रगंदा मणिपुर की राजकुमारी थीं, भीम की पत्नी हिडम्बा कचारी की राजकुमारी थीं, तेजपुर के राजा बाना की पुत्री ऊषा का विवाह भगवान श्री कृष्ण के पौत्र अनुरुद्ध से हुआ। पूर्वोत्तर के अनेक पात्रों का वर्णन महाभारत में मिलता है। आज सारा पूर्वोत्तर सरकार की अदूरदर्शी नीतियों और हमारी उदासीनता के कारण विदेशी शक्तियों के षड्यंत्र का शिकार हो रहा है। सिक्कम में अपेक्षाकृत शांति है। हम सब भारत मां के पुत्र हैं। अत मां के पुत्र आपस में भाई-भाई ही होते हैं, यह अनुभूति नहीं है। हमारे कुछ बंधु ऐसे भी हैं जिन्हें पूर्वोत्तर के लोग चीनी या विदेशी नजर आते हैं। यह अज्ञानवश हो सकता है, लेकिन उनकी यह सोच देश के लिए घातक है। इस प्रकार की सोच हमारे शत्रु देश चीन की तो हो सकती है लेकिन एक देशभक्त नागरिक की नहीं। चीन भी यही चाहता है कि भारत के लोग पूर्वोत्तर के लोगों को चीनी समझें और चीन के निकट आएं। सूर्यभगवान अपनी किरणें सर्वप्रथम अरुणाचल प्रदेश में बिखेरते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी यहीं से भारत में प्रवेश करती है। यह हमारे हाथ में है कि हम पूर्वोत्तर से अपने संबंध प्रगाढ़ करें और दुश्मनों के मंसूबों को असफल करें। अन्यथा भारत के दुश्मनों की भारत में कोई कमी नहीं है। -जगवीर रावत, जहांगीरपुरी, दिल्ली। जुल्म आखिर कमजोर पर ही क्यों? जुल्म हमेशा कमजोर पर ही होता है। स्त्रियां शारीरिक रूप से पुरुषों से कमजोर होती हैं इसलिए पुरुष हमेशा उस पर जुल्मों सितम करता आया है। बहुत कुछ मामले प्रभावी कार्यवाही न होने की वजह से दब जाते हैं तो कुछ मामले मीडिया द्वारा शोर मचाने पर प्रभाव में आते हैं। दिल्ली में चलती बस में एक युवती से बलात्कार की कोशिश की गई। हताहत में उसका साथी भी है। इस युवती का साथी कहां से आ गया जबकि स्त्राr हमेशा सुरक्षा के लिहाज से घर वालों के साथ ही बाहर जाती है। इसके बाद चारों तरफ से सरकार को घेरा जा रहा है और बलात्कारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की जा रही है। हम यह मानेंगे कि स्त्रियां कमजोर होती हैं लेकिन इतनी कमजोर भी नहीं कि अपने ऊपर जुल्म का प्रतिकार न कर सकें। कमजोरी भरा बयान अखिलेश यादव का भी है जिसमें वह स्त्राr को सरकारी नौकरी की बात कर रहे हैं तो अब स्त्रियों को खुला परमिट मिल जाएगा। अपने ऊपर रेप करवाओ और नौकरी पाओ। इस तरह बोलने से चुप रहना बेहतर है। -दिलीप गुप्ता, वमनपुरी, बरेली।      

Share it
Top