कश्मीरियों के साथ भारत
प्रकाशित: 10-06-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) की पुलिस और सैन्य बलों द्वारा 20 से अधिक प्रदर्शनकारी नागरिकों की हत्या के लिए सीधे इस्लामाबाद को जिम्मेदार ठहराया और विश्व समुदाय से आग्रह किया कि निर्देष जनता पर अत्याचार का पाकिस्तान को दोषी ठहराएं। वहीं संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वत नैनी ने भी गुलाम कश्मीर में पाकिस्तान के सुरक्षाबलों की बर्बरता की निन्दा की।
दरअसल सोमवार को पीओके के रावलाकोट में सेना ने प्रदर्शनकारी नागरिकों पर फायरिंग करके 120 लोगों को मार डाला था जबकि पुलिस ने पूरे गुलाम कश्मीर में कई स्थानों पर हुए प्रदर्शन को क्रूरतापूर्वक दबाने के लिए बल प्रयोग किया जिसमें काफी लोग मारे गए और ज्यादातर घायल बताए जा रहे हैं। असल में पाकिस्तान ने गुलाम कश्मीर में विदेशी मीडिया पर रोक लगा रखी है। विदेशी मिशन के राजनायिकों को भी इस क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं मिलती। रही बात मानवाधिकार संगठनों की तो पाकिस्तान जैसे देश में मानवाधिकारवादियों के लिए मानवाधिकार तो आतंकियों और जल्लाद सैन्य कर्मियों के ही होते हैं। इसीलिए भारत ने विश्व समुदाय से अनुरोध किया है कि पाकिस्तान द्वारा गुलाम कश्मीर के लोगों पर अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएं और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन उस क्षेत्र में जाकर वास्तविकता को देखें।
सच तो यह है कि भारत को पाकिस्तान के खिलाफ यही आवाज विश्व मंचों पर बहुत पहले ही उठाना चाहिए थी। आखिर पीओके भी तो जम्मू-कश्मीर का ही हिस्सा है और जम्मू-कश्मीर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत वैधानिक विलय के बाद भारत का अभिन्न अंग है। यह तो भारत का अधिकार है कि वह बलपूर्वक कब्जाए गए जिस भूभाग के निवासियों पर इस्लामाबाद की सरकार के इशारे पर लाठी, गोली और बम से हमला वदी वाले भेड़ियों ने किया, उनकी निन्दा करे क्योंकि जिन लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है वे हमारे अपने हैं।
मजे की बात तो यह है कि रक्षामंत्री राजनाथ सिंह पहले भी कह चुके हैं कि हमारे लोगों पर पाकिस्तान अत्याचार कर रहा है। मतलब यही है गुलाम कश्मीर के लोग भी उतने ही भारतीय हैं जितने कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय।
बहरहाल भारत ने जिस तरह पाकिस्तान को गुलाम कश्मीर में सरकारी हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया है, इसकी आशंका सोमवार को पाकिस्तान की मीडिया में व्यक्त की गई थी। मीडिया चैनलों पर बैठकर पूर्व सैन्य अधिकारियों, राजनायिकों व पत्रकारों ने दो टूक शब्दों में स्वीकार किया कि पाक सेना की हैवानियत की वजह से अब भारत को बहुत अच्छा अवसर मिल गया है और वे पाक सेना की बर्बरता का मुद्दा जोर-शोर से उठाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उसकी शिकायत करें। पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों ने पाक सेना और सरकार को जमकर लताड़ा। लब्बोलुआब यह है कि भारत को गुलाम कश्मीर की पीड़ित जनता के साथ खड़ा होने का समय आ गया है। बेहतर तो यह होता कि यदि पाकिस्तान पीओके को नहीं संभाल पा रहा है तो उसे इस क्षेत्र को खाली कर देना चाहिए। किन्तु पाकिस्तान से ऐसी शराफत की उम्मीद नहीं की जा सकती। उम्मीद तो यही है कि गुलाम कश्मीरी शीघ्र ही आजादी पाने के लिए क्रूर पाक सैनिकों को अपनी जमीन से भागने पर मजबूर कर देंगे।
दरअसल सोमवार को पीओके के रावलाकोट में सेना ने प्रदर्शनकारी नागरिकों पर फायरिंग करके 120 लोगों को मार डाला था जबकि पुलिस ने पूरे गुलाम कश्मीर में कई स्थानों पर हुए प्रदर्शन को क्रूरतापूर्वक दबाने के लिए बल प्रयोग किया जिसमें काफी लोग मारे गए और ज्यादातर घायल बताए जा रहे हैं। असल में पाकिस्तान ने गुलाम कश्मीर में विदेशी मीडिया पर रोक लगा रखी है। विदेशी मिशन के राजनायिकों को भी इस क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं मिलती। रही बात मानवाधिकार संगठनों की तो पाकिस्तान जैसे देश में मानवाधिकारवादियों के लिए मानवाधिकार तो आतंकियों और जल्लाद सैन्य कर्मियों के ही होते हैं। इसीलिए भारत ने विश्व समुदाय से अनुरोध किया है कि पाकिस्तान द्वारा गुलाम कश्मीर के लोगों पर अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएं और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन उस क्षेत्र में जाकर वास्तविकता को देखें।
सच तो यह है कि भारत को पाकिस्तान के खिलाफ यही आवाज विश्व मंचों पर बहुत पहले ही उठाना चाहिए थी। आखिर पीओके भी तो जम्मू-कश्मीर का ही हिस्सा है और जम्मू-कश्मीर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत वैधानिक विलय के बाद भारत का अभिन्न अंग है। यह तो भारत का अधिकार है कि वह बलपूर्वक कब्जाए गए जिस भूभाग के निवासियों पर इस्लामाबाद की सरकार के इशारे पर लाठी, गोली और बम से हमला वदी वाले भेड़ियों ने किया, उनकी निन्दा करे क्योंकि जिन लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है वे हमारे अपने हैं।
मजे की बात तो यह है कि रक्षामंत्री राजनाथ सिंह पहले भी कह चुके हैं कि हमारे लोगों पर पाकिस्तान अत्याचार कर रहा है। मतलब यही है गुलाम कश्मीर के लोग भी उतने ही भारतीय हैं जितने कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय।
बहरहाल भारत ने जिस तरह पाकिस्तान को गुलाम कश्मीर में सरकारी हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया है, इसकी आशंका सोमवार को पाकिस्तान की मीडिया में व्यक्त की गई थी। मीडिया चैनलों पर बैठकर पूर्व सैन्य अधिकारियों, राजनायिकों व पत्रकारों ने दो टूक शब्दों में स्वीकार किया कि पाक सेना की हैवानियत की वजह से अब भारत को बहुत अच्छा अवसर मिल गया है और वे पाक सेना की बर्बरता का मुद्दा जोर-शोर से उठाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर हर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उसकी शिकायत करें। पाकिस्तान के बुद्धिजीवियों ने पाक सेना और सरकार को जमकर लताड़ा। लब्बोलुआब यह है कि भारत को गुलाम कश्मीर की पीड़ित जनता के साथ खड़ा होने का समय आ गया है। बेहतर तो यह होता कि यदि पाकिस्तान पीओके को नहीं संभाल पा रहा है तो उसे इस क्षेत्र को खाली कर देना चाहिए। किन्तु पाकिस्तान से ऐसी शराफत की उम्मीद नहीं की जा सकती। उम्मीद तो यही है कि गुलाम कश्मीरी शीघ्र ही आजादी पाने के लिए क्रूर पाक सैनिकों को अपनी जमीन से भागने पर मजबूर कर देंगे।