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स्वाभाविक सहयोगी

प्रकाशित: 25-05-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
स्वाभाविक सहयोगी
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्के रूबियो और भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर के बीच आज द्विपक्षीय बैठक हुई और बाद में संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस भी हुई। इसी दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने भारत को अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में से एक बताते हुए दोनों को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताया और कहा कि यही साझा लोकतांत्रिक मूल्य दोनों देशों को एक दूसरे के निकट लाते हैं।
विदेश मंत्री रूबियो ने कहा कि रणनीतिक साझेदारी मात्र सामान्य संबंध नहीं होती, बल्कि यह वह रिश्ता होता है जिसमें दो देशों के हित एक दूसरे से जुड़े होते हैं और दोनों मिलकर वैश्विक चुनौतियों का समाधान निकालते हैं।
इसी अवसर पर भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने कहा कि भारत और अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी दोनों देशों के साझा राष्ट्रीय हितों पर आधारित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच लगातार संपर्क और संवाद ने द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत किया है।
दरअसल दोनों देशों के विदेश मंत्रियें की यह बैठक विदेश सचिव विक्रम मिस्री की वाशिंगटन डीसी यात्रा से ठीक पांच सप्ताह बाद संपन्न हुई है। मतलब यह कि इस बैठक की पूरी रूपरेखा पांच सप्ताह में तैयार हुई है। ये पांच सप्ताह दोनों देशें के हितों में जो व्यावहारिक उतार-चढ़ाव आया है, उसके अतिरिक्त ज्यादा कुछ बातें करने की जरूरत नहीं महसूस हुई। कारण कि पश्चिम एशिया हो या मध्य पूर्व एशिया, ईरान हो या यूक्रेन, होर्मूज स्ट्रेट हो या ऊर्जा संकट दोनों देशों के हित इन मुद्दों से जुड़े हैं। इन मुद्दों के अलावा भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा, व्यापार, निवेश, महत्वपूर्ण तकनीक और लोगों के बीच संबंधों को मजबूत बनाने जैसे विषयों पर बातचीत हुई। सच तो यह है कि अमेरिका भारत से और भी ज्यादा सहयोग की उम्मीद लगाए बैठा है। अमेरिका इस बात को अच्छी तरह जानता है कि उसके कहने पर भारत न तो रूस से व्यापारिक व सामरिक रिश्ते सीमित करने वाला है और न ही चीन प्रत्यक्ष संघर्ष करने वाला है। भारत की अपनी जरूरतें हैं जो मात्र अमेरिका पूरी नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त यदि जरूरत पड़ी तो भारत रूस से व्यापारिक और सामरिक संबंधों की समीक्षा खुद करेगा। इसी तरह जरूरत पड़ी तो चीन के साथ रणनीतिक संबंधों को नरम-गरम कर सकता है किन्तु यह फैसला खुद भारत करेगा न कि भारत से अमेरिका करवा सकता है। ब्रिक्स का नेतृत्व भारत कर रहा है और भारत को छोड़कर सारे सदस्य देश अमेरिका के प्रति कड़ा तेवर अपनाए हुए हैं। ब्राजील, चीन और रूस व्यापार के लिए डालर के स्थान पर नई ब्रिक्स मुद्रा लाने पर आमादा हैं। लेकिन अमेरिका को भारत पर भरोसा है कि वह अमेरिका विरोधी इस तहर के फैसले नहीं होने देगा। इसके साथ ही अमेरिका यह बात अच्छी तरह जानता है कि हिन्द महासागर में शक्ति संतुलन कायम करने में चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए ही भारत अण्डमान निकोबार में रणनीतिक जलमार्ग का निर्माण कर रहा है।
वास्तविकता तो यही है कि भारत भी इस तथ्य से अच्छी तरह परिचित है कि आज भारत की जरूरतें मात्र रूस या कुछ अन्य देशों से पूरी नहीं हो सकतीं। अमेरिका शक्ति और संपन्नता के जिस शिखर पर पहुंच चुका है, वहां तक अभी दुनिया का कोई देश नहीं पहुंच पाया है। इसलिए वाशिंगटन डीसी से दुश्मनी नहीं मित्रता ही राष्ट्रीय हितों के लिए करना हर दृष्टि से लाभदायक होगा। लब्बोलुआब यह है कि भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में किसी एक व्यक्ति के कारण कड़वाहट कुछ दिनों के लिए आ भी जाए तो वह आत्मीय हितों के विरुद्ध ज्यादा दिनों तक स्थाई भाव के रूप में कायम नहीं रह पाती। दोनों ही देश लोकतांत्रिक हैं, दोनों की अपनी-अपनी सीमाएं हैं फिर भी कुछ वैश्विक परिस्थितियां दोनों को एक पेज पर खड़ा करने के लिए विवश करती हैं यानि स्वाभाविक सहयोगी बनाती हैं।