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इंडिया गठबंधन की सक्रियता कितनी सार्थक?

प्रकाशित: 10-06-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
पश्चिम बंगाल की मिली करारी हार के बाद ममता बनर्जी का इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होना एक महत्वपूर्ण बदलाव है। विपक्षी दलों को समझ में आ गया है कि यदि एक जुट नहीं हुए है तो 2029 का चुनाव भाजपा के पक्ष में जा सकता है। इंडिया गठबंधन को उत्तर प्रदेश के 2027 चुनाव का मद्देनजर किसी भी कीमत पर बहुजन समाज पार्टी को गठबंधन का हिस्सा बनाना जरूरी है। 2027 में इंडिया गठबंधन ने मिलकर चुनाव नहीं लड़ा और मायावती ने अकेले चुनाव लड़ा तो भाजपा तीसरी बार सत्ता में आ सकती है। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन को एक बार फिर मजबूत करने के प्रयास तेज होते दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में हुई बैठक में कई प्रमुख विपक्षी नेताओं ने भाग लिया और आगे की रणनीति पर चर्चा की। हालांकि इस बैठक में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल तथा कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं की अनुपस्थिति राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी रही। बैठक में विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए एक पांच सूत्रीय कार्यक्रम तैयार किया गया तथा आगामी 8 अगस्त को हैदराबाद में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित करने की घोषणा की गई। यह दर्शाता है कि विपक्ष भाजपा के मुकाबले एक साझा राजनीतिक मंच तैयार करने की कोशिश कर रहा है। मेरा मानना है कि इंडिया गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा को हारना नहीं, बल्कि अपने घटक दलों के बीच सामंजस्य बनाए रखना भी है। विभिन्न राज्यों में गठबंधन के दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर की एकता को राज्य स्तरीय राजनीति के साथ संतुलित करना आसान नहीं होगा।स्टालिन और केजरीवाल जैसे नेताओं की अनुपस्थिति यह संकेत भी देती है कि विपक्षी एकता को अभी और मजबूत करने की आवश्यकता है। किसी भी गठबंधन की ताकत उसकी व्यापक भागीदारी और साझा रणनीति में होती है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा लंबे समय से चल रही है कि बसपा को इंडिया गठबंधन में शामिल करने का प्रयास होना चाहिए। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है और उसका एक स्थायी सामाजिक आधार आज भी मौजूद है। यदि विपक्ष का उद्देश्य भाजपा को चुनौती देना है, तो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और अन्य सामाजिक समूहों के बीच व्यापक राजनीतिक समन्वय की आवश्यकता होगी।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।