सरकार के ईंधन बचत उपायों से पेट्रोल, डीजल की मांग प्रभावित होगी
प्रकाशित: 25-05-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली, (भाषा)। सरकार की ईंधन बचत मुहिम, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रुपये की कमजोरी के कारण भारत में वर्ष 2026 की दूसरी छमाही में परिवहन ईंधन की मांग वृद्धि में सुस्ती आने की आशंका है। ऊर्जा विश्लेषकों ने यह राय जताई है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 15 मई से तीन चरणों में करीब पांच रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच पेट्रोलियम कंपनियों ने इसका कुछ बोझ उपभोक्ताओं पर डाला है। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नागरिकों और सरकारी विभागों से ईंधन बचाने, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और गैर-जरूरी यात्राएं कम करने की अपील की है। सरकार को आशंका है कि महंगे ऊर्जा आयात से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है और चालू खाते का घाटा (कैड) में भी बढ़ोतरी हो सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि ऊंची कीमतों और सरकारी सख्ती का असर ईंधन मांग पर पड़ेगा। ऊर्जा विश्लेषण कंपनी केप्लर की प्रमुख विश्लेषक एलिफ बिनीची की रिपोर्ट में भारत की 2026 के लिए परिष्कृत उत्पादों की मांग वृद्धि का अनुमान 39 प्रतिशत घटाकर करीब 78 हजार बैरल प्रतिदिन (केबीडी) कर दिया गया है। इससे पहले यह अनुमान 128 किलोलीटर बैरल प्रतिदिन (केबीडी) था। रिपोर्ट के अनुसार, पेट्रोल की मांग पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है। पेट्रोल की मांग वृद्धि का अनुमान 63 केबीडी से घटाकर 38 केबीडी प्रतिदिन कर दिया गया है। अब पेट्रोल की खपत लगभग 1,010 केबीडी प्रतिदिन रहने का अनुमान है, जो पहले।,035 केबीपीडी आंका गया था। रिपोर्ट में कहा गया कि दफ्तर आने-जाने की गतिविधियों में कमी, गैर-जरूरी यात्राओं में गिरावट और ईंधन बचत अभियान के कारण पेट्रोल की मांग कमजोर पड़ सकती है। वहीं डीजल की वार्षिक मांग वृद्धि का अनुमान भी करीब 20 केबीडी घटाया गया है।
हवाई यात्रा पर असर पड़ने की आशंका के चलते विमान ईंधन (एटीएफ) की मांग वृद्धि का अनुमान भी लगभग 50 प्रतिशत घटाकर छह केबीडी कर दिया गया है, जो पहले 11 केबीडी था। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बाद भारत की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव बना है। कच्चे तेल के आयात खर्च, रिफाइनरी लागत और रुपये की कमजोरी ने महंगाई और सरकारी पेट्रोलियम विपणन कंपनियों पर दबाव बढ़ाया है।
रिपोर्ट में कहा गया कि संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया करीब छह प्रतिशत कमजोर हुआ है, जबकि पिछले एक साल में इसमें लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट आई है। विदेशी मुद्रा भंडार भी फरवरी के अंत से करीब 4.3 प्रतिशत घटा है।
देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें वर्ष 2022 से काफी हद तक स्थिर रखी गई थीं, हालांकि वैश्विक बाजार में कच्चा तेल लगातार महंगा हुआ है। पिछले 10 दिन में कीमतों में लगभग पांच रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, लेकिन यह अभी भी पेट्रोलियम कंपनियों के अनुमानित लागत स्तर से काफी कम है।
फिलहाल देश में पेट्रोल की औसत कीमत करीब 103 रुपये प्रति लीटर है, जबकि इसकी लागत वसूली के लिए अनुमानित स्तर लगभग 125 रुपये प्रति लीटर बताया गया है। इसी तरह डीजल की औसत कीमत करीब 94 रुपये प्रति लीटर है, जबकि संतुलन स्तर 115-120 रुपये प्रति लीटर माना जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कीमतों में हालिया बढ़ोतरी से पहले सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों को प्रतिदिन करीब।,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था।
विश्लेषकों ने कहा कि भारत अब भी रियायती रूसी कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वर्तमान में रूस से लगभग 19 से 20 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात देश के ईंधन बाजार को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया कि हालिया सरकारी कदमों से संकेत मिलता है कि नीति-निर्माता अब तेज ईंधन मांग वृद्धि के बजाय आर्थिक स्थिरता, महंगाई नियंत्रण, विदेशी मुद्रा संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट नहीं आती, रुपया स्थिर नहीं होता या सरकार अतिरिक्त राहत उपाय नहीं लाती, तो आने वाले महीनों में ईंधन कीमतों में और बढ़ोतरी तथा अतिरिक्त बचत उपाय लागू करना मुश्किल से टाला जा सकेगा।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 15 मई से तीन चरणों में करीब पांच रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच पेट्रोलियम कंपनियों ने इसका कुछ बोझ उपभोक्ताओं पर डाला है। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नागरिकों और सरकारी विभागों से ईंधन बचाने, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और गैर-जरूरी यात्राएं कम करने की अपील की है। सरकार को आशंका है कि महंगे ऊर्जा आयात से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है और चालू खाते का घाटा (कैड) में भी बढ़ोतरी हो सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि ऊंची कीमतों और सरकारी सख्ती का असर ईंधन मांग पर पड़ेगा। ऊर्जा विश्लेषण कंपनी केप्लर की प्रमुख विश्लेषक एलिफ बिनीची की रिपोर्ट में भारत की 2026 के लिए परिष्कृत उत्पादों की मांग वृद्धि का अनुमान 39 प्रतिशत घटाकर करीब 78 हजार बैरल प्रतिदिन (केबीडी) कर दिया गया है। इससे पहले यह अनुमान 128 किलोलीटर बैरल प्रतिदिन (केबीडी) था। रिपोर्ट के अनुसार, पेट्रोल की मांग पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना है। पेट्रोल की मांग वृद्धि का अनुमान 63 केबीडी से घटाकर 38 केबीडी प्रतिदिन कर दिया गया है। अब पेट्रोल की खपत लगभग 1,010 केबीडी प्रतिदिन रहने का अनुमान है, जो पहले।,035 केबीपीडी आंका गया था। रिपोर्ट में कहा गया कि दफ्तर आने-जाने की गतिविधियों में कमी, गैर-जरूरी यात्राओं में गिरावट और ईंधन बचत अभियान के कारण पेट्रोल की मांग कमजोर पड़ सकती है। वहीं डीजल की वार्षिक मांग वृद्धि का अनुमान भी करीब 20 केबीडी घटाया गया है।
हवाई यात्रा पर असर पड़ने की आशंका के चलते विमान ईंधन (एटीएफ) की मांग वृद्धि का अनुमान भी लगभग 50 प्रतिशत घटाकर छह केबीडी कर दिया गया है, जो पहले 11 केबीडी था। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ने के बाद भारत की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त दबाव बना है। कच्चे तेल के आयात खर्च, रिफाइनरी लागत और रुपये की कमजोरी ने महंगाई और सरकारी पेट्रोलियम विपणन कंपनियों पर दबाव बढ़ाया है।
रिपोर्ट में कहा गया कि संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपया करीब छह प्रतिशत कमजोर हुआ है, जबकि पिछले एक साल में इसमें लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट आई है। विदेशी मुद्रा भंडार भी फरवरी के अंत से करीब 4.3 प्रतिशत घटा है।
देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें वर्ष 2022 से काफी हद तक स्थिर रखी गई थीं, हालांकि वैश्विक बाजार में कच्चा तेल लगातार महंगा हुआ है। पिछले 10 दिन में कीमतों में लगभग पांच रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई, लेकिन यह अभी भी पेट्रोलियम कंपनियों के अनुमानित लागत स्तर से काफी कम है।
फिलहाल देश में पेट्रोल की औसत कीमत करीब 103 रुपये प्रति लीटर है, जबकि इसकी लागत वसूली के लिए अनुमानित स्तर लगभग 125 रुपये प्रति लीटर बताया गया है। इसी तरह डीजल की औसत कीमत करीब 94 रुपये प्रति लीटर है, जबकि संतुलन स्तर 115-120 रुपये प्रति लीटर माना जा रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कीमतों में हालिया बढ़ोतरी से पहले सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों को प्रतिदिन करीब।,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था।
विश्लेषकों ने कहा कि भारत अब भी रियायती रूसी कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वर्तमान में रूस से लगभग 19 से 20 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात देश के ईंधन बाजार को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया कि हालिया सरकारी कदमों से संकेत मिलता है कि नीति-निर्माता अब तेज ईंधन मांग वृद्धि के बजाय आर्थिक स्थिरता, महंगाई नियंत्रण, विदेशी मुद्रा संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट नहीं आती, रुपया स्थिर नहीं होता या सरकार अतिरिक्त राहत उपाय नहीं लाती, तो आने वाले महीनों में ईंधन कीमतों में और बढ़ोतरी तथा अतिरिक्त बचत उपाय लागू करना मुश्किल से टाला जा सकेगा।