खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो पाया है भारत, किस मिशन पर सरकार कर रही है काम
प्रकाशित: 13-05-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नई दिल्ली:
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की कि भारत को विदेशी खाद्य तेलों पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए, ताकि देश की अर्थव्यवस्था और लोगों की सेहत दोनों सुरक्षित रह सके. ऐसे समय एक एक बड़ा सवाल सामने आता है. सवाल यह है कि अगर भारत किसानों का देश है तो हम अपने लोगों के लिए पर्याप्त खाद्य तेल क्यों नहीं पैदा कर पा रहे हैं? आज जरूरत इस बात की है कि भारत का तेल और भारत के किसान ही देश का भविष्य बनें.
आज भारत दुनिया में खाद्य तेल आयात करने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल है. रिपोर्टों के मुताबिक, भारत हर साल करीब 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करता है. इस पर करीब 1.61 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 18.3 अरब डॉलर खर्च होते हैं.केवल खाद्य तेल के आयात पर ही इतना पैसा विदेश चला जाता है, जबकि भारत के पास बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन है और करोड़ों किसान खेती पर निर्भर हैं. इसके बावजूद चावल और गेहूं की तुलना में तिलहन की खेती बहुत कम होती है.
क्या भारत तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर है
हिमांशु पाठक इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर दी सेमी एरिड ट्रोपिक्स के महानिदेशक और इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के पूर्व प्रमुख हैं. वो कहते हैं कि इस समस्या की जड़ विज्ञान और सरकारी नीतियों दोनों में छिपी हुई है. मूंगफली के खेत में खड़े होकर वो बताते हैं, ''यह मूंगफली की ऐसी किस्म है, जो कम समय में तैयार हो जाती है, ज्यादा उत्पादन देती है और इसमें तेल की मात्रा भी अधिक होती है. भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है.हम इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर दी सेमी एरिड ट्रोपिक्स में इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि देश तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बने.'' पाठक के मुताबिक भारत हर साल 15 से 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करता है. खेती में कई प्रगति होने के बावजूद यह निर्भरता इसलिए बनी हुई है क्योंकि किसान तिलहन की खेती को जोखिम भरा मानते हैं. अनियमित बारिश, कीट, बीमारियां और कीमतों में उतार-चढ़ाव तिलहन की खेती को चावल और गेहूं की तुलना में कम सुरक्षित बनाते हैं.
डॉक्टर पाठक कहते हैं,''चावल और गेहूं काफी स्थिर फसलें हैं. सरकार इनकी खरीद की गारंटी देती है और नीतियों का मजबूत समर्थन भी मिलता है. लेकिन तिलहन फसलों को किसानों के बीच वैसा भरोसा नहीं मिला है.'' एक और बड़ी समस्या यह है कि तिलहन और दालों की खेती अक्सर ऐसी जमीन पर की जाती है, जहां मिट्टी कमजोर होती है, सिंचाई कम होती है और खेती में कम निवेश किया जाता है. इसका सीधा असर पैदावार पर पड़ता है. डॉक्टर पाठक साफ शब्दों में कहते हैं,''अगर फसल कमजोर जमीन पर उगाई जाएगी, तो उत्पादन भी कम ही होगा.''
समय के साथ यह सोच किसानों के व्यवहार का हिस्सा बन गई है. पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसान आज भी चावल और गेहूं की खेती इसलिए करते हैं क्योंकि इन फसलों के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और खरीद की व्यवस्था देती है. तिलहन फसलें भले ही बाजार में ज्यादा फायदा दें, लेकिन किसानों को उनमें जोखिम ज्यादा दिखाई देता है.
डॉ. पाठक कहते हैं,''अगर पानी और बिजली जैसी चीजों की असली लागत जोड़कर देखें, तो तिलहन की खेती ज्यादा फायदेमंद साबित होती है. लेकिन सरकारी नीतियां, बीमा, मुफ्त बिजली और खरीद व्यवस्था अभी भी चावल और गेहूं के पक्ष में हैं, इसलिए किसान उसी दिशा में जाते हैं.''
तिलहन की फसलों की नई किस्में
अब विज्ञान इस स्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा है. हिमांशु पाठक का कहना है कि लंबे समय तक नजरअंदाज किए जाने के बाद अब तिलहन फसलों पर शोध तेजी से आगे बढ़ा है. ऐसी नई किस्में तैयार की गई हैं जो कीटों, बीमारियों और मौसम की मार को बेहतर तरीके से सहन कर सकती हैं. कई नई किस्मों पर अभी भी काम चल रहा है. वो बताते हैं,''पहले किसी एक बीमारी से पूरी तिलहन फसल बर्बाद हो जाती थी. अब हमारे पास ऐसी किस्में हैं जो कई तरह की समस्याओं को झेल सकती हैं और लगातार अच्छा उत्पादन दे सकती हैं.'' अच्छे बीज भी इस बदलाव में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सिर्फ बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों के इस्तेमाल से ही उत्पादन 15 से 20 फीसदी तक बढ़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि शोध संस्थानों में तैयार किए गए अच्छे बीज सही गुणवत्ता के साथ किसानों तक पहुंचें, ताकि किसान तिलहन की खेती को भरोसेमंद विकल्प मान सकें.
खाद्य तेलों के महत्व को समझते हुए सरकार ने नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल शुरू किया है. इस मिशन का उद्देश्य आने वाले वर्षों में देश में खाद्य तेल की मांग और उत्पादन के बीच की दूरी को कम करना है. इसके तहत बेहतर बीज व्यवस्था, खाली पड़ी जमीन पर तिलहन की खेती बढ़ाना, दूसरी फसलों के साथ तिलहन उगाने को बढ़ावा देना और नई तकनीक से उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.
यह मिशन उन सरकारी नीतियों की कमियों को भी सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी वजह से किसान तिलहन की खेती से दूर होते गए. किसानों का भरोसा बढ़ाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), सरकारी खरीद और बीमा जैसी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है. डॉक्टर पाठक का मानना है कि अगर नीतियां लगातार और स्थिर बनी रहीं, तो भारत इस लक्ष्य को हासिल कर सकता है. वो कहते हैं, ''तिलहन मिशन के तहत हमने साफ लक्ष्य तय किया है. जिस तरह का शोध और नीति ढांचा अब तैयार हो चुका है, उससे मुझे पूरा भरोसा है कि भारत खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है.''
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की कि भारत को विदेशी खाद्य तेलों पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए, ताकि देश की अर्थव्यवस्था और लोगों की सेहत दोनों सुरक्षित रह सके. ऐसे समय एक एक बड़ा सवाल सामने आता है. सवाल यह है कि अगर भारत किसानों का देश है तो हम अपने लोगों के लिए पर्याप्त खाद्य तेल क्यों नहीं पैदा कर पा रहे हैं? आज जरूरत इस बात की है कि भारत का तेल और भारत के किसान ही देश का भविष्य बनें.
आज भारत दुनिया में खाद्य तेल आयात करने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल है. रिपोर्टों के मुताबिक, भारत हर साल करीब 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करता है. इस पर करीब 1.61 लाख करोड़ रुपये यानी करीब 18.3 अरब डॉलर खर्च होते हैं.केवल खाद्य तेल के आयात पर ही इतना पैसा विदेश चला जाता है, जबकि भारत के पास बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन है और करोड़ों किसान खेती पर निर्भर हैं. इसके बावजूद चावल और गेहूं की तुलना में तिलहन की खेती बहुत कम होती है.
क्या भारत तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर है
हिमांशु पाठक इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर दी सेमी एरिड ट्रोपिक्स के महानिदेशक और इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के पूर्व प्रमुख हैं. वो कहते हैं कि इस समस्या की जड़ विज्ञान और सरकारी नीतियों दोनों में छिपी हुई है. मूंगफली के खेत में खड़े होकर वो बताते हैं, ''यह मूंगफली की ऐसी किस्म है, जो कम समय में तैयार हो जाती है, ज्यादा उत्पादन देती है और इसमें तेल की मात्रा भी अधिक होती है. भारत बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है.हम इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर दी सेमी एरिड ट्रोपिक्स में इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि देश तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बने.'' पाठक के मुताबिक भारत हर साल 15 से 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करता है. खेती में कई प्रगति होने के बावजूद यह निर्भरता इसलिए बनी हुई है क्योंकि किसान तिलहन की खेती को जोखिम भरा मानते हैं. अनियमित बारिश, कीट, बीमारियां और कीमतों में उतार-चढ़ाव तिलहन की खेती को चावल और गेहूं की तुलना में कम सुरक्षित बनाते हैं.
डॉक्टर पाठक कहते हैं,''चावल और गेहूं काफी स्थिर फसलें हैं. सरकार इनकी खरीद की गारंटी देती है और नीतियों का मजबूत समर्थन भी मिलता है. लेकिन तिलहन फसलों को किसानों के बीच वैसा भरोसा नहीं मिला है.'' एक और बड़ी समस्या यह है कि तिलहन और दालों की खेती अक्सर ऐसी जमीन पर की जाती है, जहां मिट्टी कमजोर होती है, सिंचाई कम होती है और खेती में कम निवेश किया जाता है. इसका सीधा असर पैदावार पर पड़ता है. डॉक्टर पाठक साफ शब्दों में कहते हैं,''अगर फसल कमजोर जमीन पर उगाई जाएगी, तो उत्पादन भी कम ही होगा.''
समय के साथ यह सोच किसानों के व्यवहार का हिस्सा बन गई है. पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसान आज भी चावल और गेहूं की खेती इसलिए करते हैं क्योंकि इन फसलों के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और खरीद की व्यवस्था देती है. तिलहन फसलें भले ही बाजार में ज्यादा फायदा दें, लेकिन किसानों को उनमें जोखिम ज्यादा दिखाई देता है.
डॉ. पाठक कहते हैं,''अगर पानी और बिजली जैसी चीजों की असली लागत जोड़कर देखें, तो तिलहन की खेती ज्यादा फायदेमंद साबित होती है. लेकिन सरकारी नीतियां, बीमा, मुफ्त बिजली और खरीद व्यवस्था अभी भी चावल और गेहूं के पक्ष में हैं, इसलिए किसान उसी दिशा में जाते हैं.''
तिलहन की फसलों की नई किस्में
अब विज्ञान इस स्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा है. हिमांशु पाठक का कहना है कि लंबे समय तक नजरअंदाज किए जाने के बाद अब तिलहन फसलों पर शोध तेजी से आगे बढ़ा है. ऐसी नई किस्में तैयार की गई हैं जो कीटों, बीमारियों और मौसम की मार को बेहतर तरीके से सहन कर सकती हैं. कई नई किस्मों पर अभी भी काम चल रहा है. वो बताते हैं,''पहले किसी एक बीमारी से पूरी तिलहन फसल बर्बाद हो जाती थी. अब हमारे पास ऐसी किस्में हैं जो कई तरह की समस्याओं को झेल सकती हैं और लगातार अच्छा उत्पादन दे सकती हैं.'' अच्छे बीज भी इस बदलाव में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सिर्फ बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों के इस्तेमाल से ही उत्पादन 15 से 20 फीसदी तक बढ़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि शोध संस्थानों में तैयार किए गए अच्छे बीज सही गुणवत्ता के साथ किसानों तक पहुंचें, ताकि किसान तिलहन की खेती को भरोसेमंद विकल्प मान सकें.
खाद्य तेलों के महत्व को समझते हुए सरकार ने नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल शुरू किया है. इस मिशन का उद्देश्य आने वाले वर्षों में देश में खाद्य तेल की मांग और उत्पादन के बीच की दूरी को कम करना है. इसके तहत बेहतर बीज व्यवस्था, खाली पड़ी जमीन पर तिलहन की खेती बढ़ाना, दूसरी फसलों के साथ तिलहन उगाने को बढ़ावा देना और नई तकनीक से उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.
यह मिशन उन सरकारी नीतियों की कमियों को भी सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी वजह से किसान तिलहन की खेती से दूर होते गए. किसानों का भरोसा बढ़ाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), सरकारी खरीद और बीमा जैसी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है. डॉक्टर पाठक का मानना है कि अगर नीतियां लगातार और स्थिर बनी रहीं, तो भारत इस लक्ष्य को हासिल कर सकता है. वो कहते हैं, ''तिलहन मिशन के तहत हमने साफ लक्ष्य तय किया है. जिस तरह का शोध और नीति ढांचा अब तैयार हो चुका है, उससे मुझे पूरा भरोसा है कि भारत खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है.''