ईरान को भारत से है चाबहार बंदरगाह विकसित करने की उम्मीद
प्रकाशित: 19-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रमोद भार्गव
अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध के दौरान भारतीय विपक्ष, मोदी विरोधी मीडिया और कुछ चरमपंथियों ने पीएम नरेंद्र मोदी को पश्चिम एशिया की इस विशम स्थिति में दोशी ठहराने के आरोप लगाए थे। कूटनीतिक रणनीति में पाकिस्तान को केवल इसलिए सफल ठहराने के कसीदे काढ़े गए, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच असफल रहीं समझौते की बैठकें इस्लामाबाद में हुई थीं। यह भी आशंकाएं जताई जा रही थीं कि स्पश्ट नीति नहीं होने के कारण भारत और ईरान के संबंधों में खटास उत्पन्न हो रही है। किंतु अब इन सब कुशंकाओं के विपरीत भारत दौरे पर आए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने ईरान में भारत के सहयोग से निर्माणाधीन चाबहार बंदरगाह को एक सुनहरे दरवाजे और सहयोग का प्रतीक बताते हुए उम्मीद जताई कि भारत इस रणनीतिक बंदरगाह को विकसित करना जारी रहेगा। भारत ही इस क्षेत्र में प्रभावशाली रचनात्मक भूमिका निभा सकता है। अराघची ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने के बाद नई दिल्ली में ईरानी दूतावास में ठहरे थे। यहीं उनकी विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हुई द्विपक्षीय हुई वार्ता में यह बात निकलकर आई है।
अराघची ने इस बंदरगाह के विकास में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इस परियोजना में सुस्ती आ गई है, लेकिन मुझे विश्वास है कि यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और फिर इस आवागमन मार्ग के रूप में यूरोप तक पहुंचने का सुनहरा दरवाजा साबित होगा। साथ ही यूरोपीय लोगों, मध्य-एशियाई लोगों और अन्य लोगों के लिए हिंद महासागर तक पहुंचने का भी माध्यम बनेगा। यह रणनीतिक दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण बंदरगाह है। ईरान और भारत के अलावा अन्य देशों के लोगों के लिए भी यह बंदरगाह उपयोगी साबित होगा। अतएव मुझे उम्मीद है कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना को पूरा करेगा ताकि अन्य देश भी इसका लाभ उठा सकें। अराघची ने यहां तक कहा कि भारत ही वह देश है, जो पश्चिम एशिया में शांति के लिए अहम भूमिका निभा सकता है।
दिल्ली में संपन्न हुए ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन के बाद आया अराघची का बयान इस बात का संकेत है कि भारत ही वह देश है, जिससे शांति और समावेशन की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि इस भू-राजनीतिक क्षेत्र के ईरान समेत लगभग सभी देशों से भारत के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के चलते अराघची के बयान को बढ़ते ऊर्जा और आर्थिक संकट के परिप्रेक्ष्य में वैश्विक चिंता के रूप में भी देखने की जरूरत है। दरअसल भारत ने ईरान के साथ चाबहार स्थित शाहिद बेहेस्ती बंदरगाह के संचालन के लिए एक समझौता किया हुआ है। 10 वर्षों के लिए हुए इस समझौते पर दोनों देशों के संधि पत्र पर हस्ताक्षर भी हो चुके थे। परंतु हस्ताक्षर के चंद घंटों बाद भी ईरान पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते यह समझौता खटाई में पड़ा हुआ है।
इंडियन पोर्टस ग्लोबल लिमिटेड और ईरान के बंदरगाह एवं समुद्री संगठन के बीच 13 मई 2016 को समझौता हुआ था। भारत के तबके जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोबाल ने ईरान पहुंचकर अपने समकक्ष के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इंडिया पोर्ट ग्लोबल लिमिटेड को करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश करना था। भारत सरकार की यह संस्था सागरमाला विकास कंपनी की सहायक कंपनी है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक चाबहार स्थित शाहिद बेहिश्ती बंदरगाह को विकसित करने के लिए ही इस कंपनी को अस्तित्व में लाया गया था। इसका लक्ष्य भूमि से घिरे अफगानिस्तान और मध्य-एशियाई देशों के लिए मार्ग तैयार करना था। यह कंपनी कंटेनरों के संचालन से लेकर वेयरहाउसिंग तक का काम करती है। इंडिया पोर्ट ने इस बंदरगाह का संचालन सबसे पहले साल 2018 के अंत में शुरू किया था। तब ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मानवाधिकार उल्लंघन और चरमपंथी संगठनों को मदद करने के आरोप में अमेरिका ने ईरान पर अनेक व्यापक असर डालने वाले प्रतिबंध लगा दिए थे। 1998 में जब पोखरण में भारत ने परमाणु परीक्षण किया था तब भी अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे।
भारत सरकार को अपने पूंजी निवेश से इस बंदरगाह पर पांच गोदियों का निर्माण करना है। इनमें से दो बनकर तैयार हो गई हैं। इनमें से एक पर जब भारत का गेहूं से भरा पहला जहाज इस बंदरगाह पर पहुंचा था, तब उसकी अगवानी ईरान के तब के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने की थी। इसी के साथ इस बंदरगाह का औपचारिक उद्घाटन भी संपन्न हो गया था। भारत के लिए यह बंदरगाह आर्थिक, सामरिक एवं रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। इस परियोजना के पहले चरण को ‘शाहिद बेहिश्ती पोर्ट' के नाम से जाना जाता है। वैसे चाबहार का अर्थ चारों ओर बहार अर्थात खुशहाली से है।
ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित इस बंदरगाह की भौगोलिक स्थिति बेहद अहम् है। चाबहार ओमान की खाड़ी में स्थित है। अतएव यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया, यूरोप, रूस और अफगानिस्तान में प्रवेश के लिए एक द्वार माना जाता है। चाबहार के सबसे निकट गुजरात का कंडला बंदरगाह 1016 किमी और मुंबई बंदरगाह की दूरी 1455 किमी है। यहां से महज 140 किमी दूर पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह है। इसे चीन ने विकसित किया है। यह बहुत पहले से संचालित है। दरअसल पाकिस्तान ने कूटनीतिक चाल चलते हुए अपने क्षेत्र से भारतीय जहाजों को अफगानिस्तान ले जाने से मना कर दिया था।
नतीजतन भारत ने वैकल्पिक मार्ग की तलाश किया और चाबहार बंदरगाह ईरान के साथ हुए द्विपक्षीय समझौते के बाद अस्तित्व में आया। भारत के लिए यह रास्ता इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि पाक और चीन की मिली-जुली रणनीति के तहत भारत को दक्षिण एशिया में हाशिए पर डालने की कुटिल चाल अपनाई हुई है। चीन ने दक्षिण एशिया में बड़ा पूंजी निवेश करते हुए पाक, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों से मजबूत आर्थिक व सामरिक संबंध बना लिए हैं। इनके जरिए चीन एवं पाक ने भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापार को प्रतिबंधित करने की कोशिश की थी, जो अब तक नाकाम रही है। भारत से बंदरगाह बनवाए जाने की बुनियाद 2002 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और ईरानी राष्ट्रपति सैयद मोहम्मद खातमी ने डाली थी, जो पीएम नरेंद्र मोदी की सकारात्मक पहल के बाद परवान चढ़ना शुरू हुई, लेकिन प्रतिबंधों के चलते अधूरी है।
अटल बिहारी वाजपेयी जब पीएम थे, तब 2003 में ईरान के तत्कालीन खातमी दिल्ली आए थे। तभी भारत और ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह को विकसित करने व रेल लाइन बिछाने और कुछ सड़कें डालने के समझौते हो गए थे, लेकिन विवादित परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल नहीं होने के कारण भारत इन कार्यक्रमों में रुचि होने के बावजूद कुछ नहीं कर पाया था। इस समय भारत को परमाणु शक्ति के रूप में उभरने व स्थापित होने के लिए अमेरिकी सहयोग व समर्थन की जरूरत थी। भारत राजस्थान के रेगिस्तान में परमाणु परीक्षण के लिए तैयार था। परमाणु परीक्षण अप्रत्यक्ष तौर से परमाणु बम बना लेने की पुष्टि होती है। इसके तत्काल बाद पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने भी परमाणु बम बना लेने की तस्दीक कर दी थी। इसी समय भारत परमाणु निरस्त्राrकरण की कोशिश में लगा था। इस नाते भारत यह कतई नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न देश बन जाए? गोया, भारत को परमाणु अप्रसार संधि के मुद्दे पर अमेरिकी दबाव में ईरान के खिलाफ दो मर्तबा वोट देने पड़े थे। इन मतदानों के समय केंद्र में मनमोहन सिंह पीएम थे। हालांकि 2012 में तेरहान में आयोजित गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन में मनमोहन सिंह ईरान गए थे। उन्होंने सम्मेलन के अजेंडे से इतर ईरानी नेताओं से बातचीत भी की थी, लेकिन संवाद की करिश्माई शैली नहीं होने के कारण जड़ता टूट नहीं पाई थी। लिहाजा गतिरोध कायम रहा।
दरअसल चीन अपनी पूंजी से ग्वादर बंदरगाह का विकास अपने दूरगामी हितों को ध्यान में रखते हुए किया है। इसके मार्फत एक तो चीन हिंद महासागर तक सीधी पहुंच बनाने को आतुर है, दूसरे खाड़ी के देशों में पकड़ मजबूत करना चाहता है। चीन इसी क्रम में काशगर से लेकर ग्वादर तक 3000 किमी लंबा आर्थिक गलियारा बनाने में भी लगा है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए चीन पाकिस्तान में 46 लाख अरब डॉलर खर्च कर रहा है। इससे यह आशंका उत्पन्न हुई है कि चीन इस बंदरगाह से भारत की सामरिक गतिविधियों पर खुफिया नजर रखेगा। अलबत्ता भारत को ग्वादर के इर्द-गिर्द चीन व पाकिस्तानी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए चाबहार के रूप में एक मकान मिल रहा था, जो बन नहीं पाया।
(लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
अमेरिका-ईरान-इजरायल युद्ध के दौरान भारतीय विपक्ष, मोदी विरोधी मीडिया और कुछ चरमपंथियों ने पीएम नरेंद्र मोदी को पश्चिम एशिया की इस विशम स्थिति में दोशी ठहराने के आरोप लगाए थे। कूटनीतिक रणनीति में पाकिस्तान को केवल इसलिए सफल ठहराने के कसीदे काढ़े गए, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच असफल रहीं समझौते की बैठकें इस्लामाबाद में हुई थीं। यह भी आशंकाएं जताई जा रही थीं कि स्पश्ट नीति नहीं होने के कारण भारत और ईरान के संबंधों में खटास उत्पन्न हो रही है। किंतु अब इन सब कुशंकाओं के विपरीत भारत दौरे पर आए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने ईरान में भारत के सहयोग से निर्माणाधीन चाबहार बंदरगाह को एक सुनहरे दरवाजे और सहयोग का प्रतीक बताते हुए उम्मीद जताई कि भारत इस रणनीतिक बंदरगाह को विकसित करना जारी रहेगा। भारत ही इस क्षेत्र में प्रभावशाली रचनात्मक भूमिका निभा सकता है। अराघची ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने के बाद नई दिल्ली में ईरानी दूतावास में ठहरे थे। यहीं उनकी विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हुई द्विपक्षीय हुई वार्ता में यह बात निकलकर आई है।
अराघची ने इस बंदरगाह के विकास में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए कहा कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इस परियोजना में सुस्ती आ गई है, लेकिन मुझे विश्वास है कि यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया और फिर इस आवागमन मार्ग के रूप में यूरोप तक पहुंचने का सुनहरा दरवाजा साबित होगा। साथ ही यूरोपीय लोगों, मध्य-एशियाई लोगों और अन्य लोगों के लिए हिंद महासागर तक पहुंचने का भी माध्यम बनेगा। यह रणनीतिक दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण बंदरगाह है। ईरान और भारत के अलावा अन्य देशों के लोगों के लिए भी यह बंदरगाह उपयोगी साबित होगा। अतएव मुझे उम्मीद है कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना को पूरा करेगा ताकि अन्य देश भी इसका लाभ उठा सकें। अराघची ने यहां तक कहा कि भारत ही वह देश है, जो पश्चिम एशिया में शांति के लिए अहम भूमिका निभा सकता है।
दिल्ली में संपन्न हुए ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन के बाद आया अराघची का बयान इस बात का संकेत है कि भारत ही वह देश है, जिससे शांति और समावेशन की उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि इस भू-राजनीतिक क्षेत्र के ईरान समेत लगभग सभी देशों से भारत के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के चलते अराघची के बयान को बढ़ते ऊर्जा और आर्थिक संकट के परिप्रेक्ष्य में वैश्विक चिंता के रूप में भी देखने की जरूरत है। दरअसल भारत ने ईरान के साथ चाबहार स्थित शाहिद बेहेस्ती बंदरगाह के संचालन के लिए एक समझौता किया हुआ है। 10 वर्षों के लिए हुए इस समझौते पर दोनों देशों के संधि पत्र पर हस्ताक्षर भी हो चुके थे। परंतु हस्ताक्षर के चंद घंटों बाद भी ईरान पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते यह समझौता खटाई में पड़ा हुआ है।
इंडियन पोर्टस ग्लोबल लिमिटेड और ईरान के बंदरगाह एवं समुद्री संगठन के बीच 13 मई 2016 को समझौता हुआ था। भारत के तबके जहाजरानी मंत्री सर्बानंद सोनोबाल ने ईरान पहुंचकर अपने समकक्ष के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इंडिया पोर्ट ग्लोबल लिमिटेड को करीब 120 मिलियन डॉलर का निवेश करना था। भारत सरकार की यह संस्था सागरमाला विकास कंपनी की सहायक कंपनी है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक चाबहार स्थित शाहिद बेहिश्ती बंदरगाह को विकसित करने के लिए ही इस कंपनी को अस्तित्व में लाया गया था। इसका लक्ष्य भूमि से घिरे अफगानिस्तान और मध्य-एशियाई देशों के लिए मार्ग तैयार करना था। यह कंपनी कंटेनरों के संचालन से लेकर वेयरहाउसिंग तक का काम करती है। इंडिया पोर्ट ने इस बंदरगाह का संचालन सबसे पहले साल 2018 के अंत में शुरू किया था। तब ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मानवाधिकार उल्लंघन और चरमपंथी संगठनों को मदद करने के आरोप में अमेरिका ने ईरान पर अनेक व्यापक असर डालने वाले प्रतिबंध लगा दिए थे। 1998 में जब पोखरण में भारत ने परमाणु परीक्षण किया था तब भी अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए थे।
भारत सरकार को अपने पूंजी निवेश से इस बंदरगाह पर पांच गोदियों का निर्माण करना है। इनमें से दो बनकर तैयार हो गई हैं। इनमें से एक पर जब भारत का गेहूं से भरा पहला जहाज इस बंदरगाह पर पहुंचा था, तब उसकी अगवानी ईरान के तब के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने की थी। इसी के साथ इस बंदरगाह का औपचारिक उद्घाटन भी संपन्न हो गया था। भारत के लिए यह बंदरगाह आर्थिक, सामरिक एवं रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। इस परियोजना के पहले चरण को ‘शाहिद बेहिश्ती पोर्ट' के नाम से जाना जाता है। वैसे चाबहार का अर्थ चारों ओर बहार अर्थात खुशहाली से है।
ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित इस बंदरगाह की भौगोलिक स्थिति बेहद अहम् है। चाबहार ओमान की खाड़ी में स्थित है। अतएव यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया, यूरोप, रूस और अफगानिस्तान में प्रवेश के लिए एक द्वार माना जाता है। चाबहार के सबसे निकट गुजरात का कंडला बंदरगाह 1016 किमी और मुंबई बंदरगाह की दूरी 1455 किमी है। यहां से महज 140 किमी दूर पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह है। इसे चीन ने विकसित किया है। यह बहुत पहले से संचालित है। दरअसल पाकिस्तान ने कूटनीतिक चाल चलते हुए अपने क्षेत्र से भारतीय जहाजों को अफगानिस्तान ले जाने से मना कर दिया था।
नतीजतन भारत ने वैकल्पिक मार्ग की तलाश किया और चाबहार बंदरगाह ईरान के साथ हुए द्विपक्षीय समझौते के बाद अस्तित्व में आया। भारत के लिए यह रास्ता इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि पाक और चीन की मिली-जुली रणनीति के तहत भारत को दक्षिण एशिया में हाशिए पर डालने की कुटिल चाल अपनाई हुई है। चीन ने दक्षिण एशिया में बड़ा पूंजी निवेश करते हुए पाक, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों से मजबूत आर्थिक व सामरिक संबंध बना लिए हैं। इनके जरिए चीन एवं पाक ने भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापार को प्रतिबंधित करने की कोशिश की थी, जो अब तक नाकाम रही है। भारत से बंदरगाह बनवाए जाने की बुनियाद 2002 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और ईरानी राष्ट्रपति सैयद मोहम्मद खातमी ने डाली थी, जो पीएम नरेंद्र मोदी की सकारात्मक पहल के बाद परवान चढ़ना शुरू हुई, लेकिन प्रतिबंधों के चलते अधूरी है।
अटल बिहारी वाजपेयी जब पीएम थे, तब 2003 में ईरान के तत्कालीन खातमी दिल्ली आए थे। तभी भारत और ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह को विकसित करने व रेल लाइन बिछाने और कुछ सड़कें डालने के समझौते हो गए थे, लेकिन विवादित परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां अनुकूल नहीं होने के कारण भारत इन कार्यक्रमों में रुचि होने के बावजूद कुछ नहीं कर पाया था। इस समय भारत को परमाणु शक्ति के रूप में उभरने व स्थापित होने के लिए अमेरिकी सहयोग व समर्थन की जरूरत थी। भारत राजस्थान के रेगिस्तान में परमाणु परीक्षण के लिए तैयार था। परमाणु परीक्षण अप्रत्यक्ष तौर से परमाणु बम बना लेने की पुष्टि होती है। इसके तत्काल बाद पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने भी परमाणु बम बना लेने की तस्दीक कर दी थी। इसी समय भारत परमाणु निरस्त्राrकरण की कोशिश में लगा था। इस नाते भारत यह कतई नहीं चाहता था कि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न देश बन जाए? गोया, भारत को परमाणु अप्रसार संधि के मुद्दे पर अमेरिकी दबाव में ईरान के खिलाफ दो मर्तबा वोट देने पड़े थे। इन मतदानों के समय केंद्र में मनमोहन सिंह पीएम थे। हालांकि 2012 में तेरहान में आयोजित गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन में मनमोहन सिंह ईरान गए थे। उन्होंने सम्मेलन के अजेंडे से इतर ईरानी नेताओं से बातचीत भी की थी, लेकिन संवाद की करिश्माई शैली नहीं होने के कारण जड़ता टूट नहीं पाई थी। लिहाजा गतिरोध कायम रहा।
दरअसल चीन अपनी पूंजी से ग्वादर बंदरगाह का विकास अपने दूरगामी हितों को ध्यान में रखते हुए किया है। इसके मार्फत एक तो चीन हिंद महासागर तक सीधी पहुंच बनाने को आतुर है, दूसरे खाड़ी के देशों में पकड़ मजबूत करना चाहता है। चीन इसी क्रम में काशगर से लेकर ग्वादर तक 3000 किमी लंबा आर्थिक गलियारा बनाने में भी लगा है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए चीन पाकिस्तान में 46 लाख अरब डॉलर खर्च कर रहा है। इससे यह आशंका उत्पन्न हुई है कि चीन इस बंदरगाह से भारत की सामरिक गतिविधियों पर खुफिया नजर रखेगा। अलबत्ता भारत को ग्वादर के इर्द-गिर्द चीन व पाकिस्तानी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए चाबहार के रूप में एक मकान मिल रहा था, जो बन नहीं पाया।
(लेखक साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं।)