समाजोन्मुखी पत्रकारिता के पितामह हैं देर्वषि नारद देर्वषि नारद
प्रकाशित: 02-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
नारद मुनि की छवि को एक चुगलखोर अर्थात् इधर की उधर करने वाले और आपस में भिड़ाकर क्लेश कराने वाले पौराणिक चरित्र के रूप में गढ़ दिया गया है लेकिन वास्तव में उनका प्रमुख उद्देश्य प्रत्येक भत्त की पुकार भगवान तक पहुंचाना ही परिलक्षित होता रहा है। वे एक लोक से दूसरे लोक में भ्रमण करते हुए संवाद-संकलन का कार्यं कर एक सािय एवं सार्थक संवाददाता की भूमिका निभाते रहे हैं। संवाद के माध्यम से वे तोड़ने का नहीं बल्कि जोड़ने का कार्यं करते हैं और पत्रकारिता के प्रथम पितृ पुरूष हैं। देवताओं के त्रषि होने के साथ-साथ वे ब्रrाण्ड के प्रथम दिव्य पत्रकार के रूप में लोकमंडल के संवाददाता हैं। उन्हें देवताओं का दिव्य दूत और संचार का अग्रणी साधक माना गया है। उन्हें ब्रrाण्ड का पहला ऐसा संदेशवाहक अर्थात् पत्रकार माना जाता है, जो एक लोक से दूसरे लोक की परिामा करते हुए सूचनाओं का आदान-प्रदान किया करते थे।
मान्यता है कि देर्वषि नारद का जन्म ज्येष्ठ माह के वृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के दिन हुआ था। इसीलिए प्रतिवर्ष इसी दिन नारद जयंती मनाईं जाती है, जो इस वर्ष 2 मईं को मनाईं जा रही है। इस दिन भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी का पूजन करने के पात् देर्वषि नारद की पूजा की जाती है। अपनी वीणा की मधुर तान से भगवान विष्णु का गुणगान करने और अपने श्रीमुख से सदैव नारायण-नारायण का जप करते हुए विचरण करने वाले नारद को मर्हषि व्यास, मर्हषि वाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेव का गुरू माना जाता है। वुछ शास्त्रों में नारद मुनि को त्रिकालदशा और विष्णु का अवतार भी माना गया है। श्रीमद्भागवद्पुराण के अनुसार सृष्टि में भगवान विष्णु ने देर्वषि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया है। वुछ स्थानों पर उनका वर्णन बृहस्पति के शिष्य के रूप में भी मिलता है। धरमिक पुराणों के अनुसार अनेक कलाओं तथा विदृाओं में निपुण देर्वषि नारद को संगीत की शिक्षा ब्रrाजी ने स्वयं दी थी और भगवान विष्णु ने उन्हें माया के विविध रूप समझाए थे। मान्यता है कि देर्वषि नारद ने ही भत्त प्रह्लाद, भत्त अम्बरीष, भत्त ध्रुव इत्यादि भगवान विष्णु के कईं परम भत्ताें को उपदेश देकर उन्हें भत्ति मार्ग में प्रवृत्त किया था। उन्होंने ही भृगु कन्या लक्ष्मी का विवाह भगवान विष्णु के साथ कराया। देवराज इन्द्र को समझा-बुझाकर देव नर्तकी उर्वशी का पुरुरवा के साथ परिणय सूत्र कराया। इसके अलावा वे कईं अत्याचारी महाराक्षसों द्वारा जनता के उत्पीड़न का वृत्तांत भगवान तक पहुंचाकर उनके विनाश का माध्यम भी बने। मर्हषि वाल्मीकि को रामायण की रचना करने के लिए प्रेरित किया। यही कारण है कि समस्त युगों, कालों, विधाओं और वर्गो में सम्मान के पात्र रहे नारद जी को सभी लोकों के समाचारों की जानकारी रखने वाले कवि, मेधावी नीतिज्ञ तथा एक प्रभावशाली वत्ता के रूप में स्मरण किया जाता है।
मान्यता है कि देर्वषि नारद का जन्म ज्येष्ठ माह के वृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के दिन हुआ था। इसीलिए प्रतिवर्ष इसी दिन नारद जयंती मनाईं जाती है, जो इस वर्ष 2 मईं को मनाईं जा रही है। इस दिन भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी का पूजन करने के पात् देर्वषि नारद की पूजा की जाती है। अपनी वीणा की मधुर तान से भगवान विष्णु का गुणगान करने और अपने श्रीमुख से सदैव नारायण-नारायण का जप करते हुए विचरण करने वाले नारद को मर्हषि व्यास, मर्हषि वाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेव का गुरू माना जाता है। वुछ शास्त्रों में नारद मुनि को त्रिकालदशा और विष्णु का अवतार भी माना गया है। श्रीमद्भागवद्पुराण के अनुसार सृष्टि में भगवान विष्णु ने देर्वषि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया है। वुछ स्थानों पर उनका वर्णन बृहस्पति के शिष्य के रूप में भी मिलता है। धरमिक पुराणों के अनुसार अनेक कलाओं तथा विदृाओं में निपुण देर्वषि नारद को संगीत की शिक्षा ब्रrाजी ने स्वयं दी थी और भगवान विष्णु ने उन्हें माया के विविध रूप समझाए थे। मान्यता है कि देर्वषि नारद ने ही भत्त प्रह्लाद, भत्त अम्बरीष, भत्त ध्रुव इत्यादि भगवान विष्णु के कईं परम भत्ताें को उपदेश देकर उन्हें भत्ति मार्ग में प्रवृत्त किया था। उन्होंने ही भृगु कन्या लक्ष्मी का विवाह भगवान विष्णु के साथ कराया। देवराज इन्द्र को समझा-बुझाकर देव नर्तकी उर्वशी का पुरुरवा के साथ परिणय सूत्र कराया। इसके अलावा वे कईं अत्याचारी महाराक्षसों द्वारा जनता के उत्पीड़न का वृत्तांत भगवान तक पहुंचाकर उनके विनाश का माध्यम भी बने। मर्हषि वाल्मीकि को रामायण की रचना करने के लिए प्रेरित किया। यही कारण है कि समस्त युगों, कालों, विधाओं और वर्गो में सम्मान के पात्र रहे नारद जी को सभी लोकों के समाचारों की जानकारी रखने वाले कवि, मेधावी नीतिज्ञ तथा एक प्रभावशाली वत्ता के रूप में स्मरण किया जाता है।