राजस्थान से सबक
प्रकाशित: 29-05-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करके बृहस्पतिवार को त्याग पत्र दे दिया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनके उत्तराधिकारी अब उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार होंगे।
दरअसल मई 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला तो पार्टी ने सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनने का अवसर दिया। दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने चुनाव परिणाम घोषित होते ही मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोंक दिया था। शिव कुमार का तर्क था कि उन्होंने चुनाव में पार्टी के लिए संसाधन जुटाए और कार्यकर्ता भी उन्हें ही मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते हैं। उस वक्त तो जैसे तैसे डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी नेतृत्व ने सहमत कर लिया था किन्तु सिद्धरमैया को कांग्रेस द्वारा दो टूक कह दिया गया था कि दावा तो डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री पद का बनता है फिर भी अभी तो आप बन जाइए किन्तु जब कभी भी त्यागपत्र देने के लिए कहा जाए, शीर्ष नेतृत्व के निर्देश का पालन करके पद छोड़ देना होगा। माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का एहसास हो गया कि 2028 में होने वाले चुनाव में डीके शिवकुमार के सहयोग के बिना सिद्धरमैया कांग्रेस को दोबारा चुनाव नहीं जिता पाएंगे। कांग्रेस नेतृत्व को डीके शिवकुमार ने एहसास दिला दिया कि यदि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में वह मदद नहीं करेंगे। यह सच है कि शिवकुमार बड़े व्यवसायी हैं और व्यवसायियों में उनकी गहरी पैठ है। इसलिए कांग्रेस को सहयोग राशि का प्रबंध कराने में उन जैसा कोई अन्य नेता कांग्रेस में है ही नहीं। यही कारण कि जब तक शिवकुमार को पार्टी नेतृत्व मना पाया तब तक मनाया, लेकिन जब देखा कि अब और अधिक वह मानने वाले नहीं हैं तब विवश होकर सिद्धरमैया को त्यागपत्र का निर्देश देना ही पड़ा। अब विधानसभा की शेष दो वर्ष की अवधि बची है जिसका उपयोग डीके शिवकुमार करेंगे ताकि मई 2026 से मई 2028 तक पार्टी को इतना लोकप्रिय बना दें कि एक बार फिर 2028 में पार्टी चुनाव जीत जाएं।
बहरहाल, कांग्रेस नेतृत्व राजस्थान दोहराने की दोबारा गलती नहीं करना चाहती थी। यही कारण है कि जिस तरह अशोक गहलोत के सामने झुक कर सचिन पायलट की उपेक्षा की और पायलट के समर्थकों को जलील होना पड़ा, वह गलती कर्नाटक में कांग्रेस ने दोहराने की गलती नहीं की। सच तो यह भी है कि तीन साल के शासनकाल में सिद्धरमैया शासन के खिलाफ लोगों में नाराजगी होना स्वाभाविक है किन्तु जब वह पद से हट जाएंगे और नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार बनेंगे तो सत्ता विरोधी रूझान का असर कम ही रहेगा। पार्टियां अगले चुनाव में सफलता हासिल करने के लिए भी यही तरीका अपनाती हैं। चुनाव की आहट होते ही किसी नए को मुख्यमंत्री बना देती हैं ताकि पुराने चेहरे को भूल कर वोटर नए चेहरे पर भरोसा करके वोट दे दें। लब्बोलुआब यह है कि कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन सामान्य घटना है। इससे पार्टी के अन्दर स्थिरता और सत्ता में वापसी दोनों की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
दरअसल मई 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला तो पार्टी ने सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनने का अवसर दिया। दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने चुनाव परिणाम घोषित होते ही मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा ठोंक दिया था। शिव कुमार का तर्क था कि उन्होंने चुनाव में पार्टी के लिए संसाधन जुटाए और कार्यकर्ता भी उन्हें ही मुख्यमंत्री पद पर देखना चाहते हैं। उस वक्त तो जैसे तैसे डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी नेतृत्व ने सहमत कर लिया था किन्तु सिद्धरमैया को कांग्रेस द्वारा दो टूक कह दिया गया था कि दावा तो डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री पद का बनता है फिर भी अभी तो आप बन जाइए किन्तु जब कभी भी त्यागपत्र देने के लिए कहा जाए, शीर्ष नेतृत्व के निर्देश का पालन करके पद छोड़ देना होगा। माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का एहसास हो गया कि 2028 में होने वाले चुनाव में डीके शिवकुमार के सहयोग के बिना सिद्धरमैया कांग्रेस को दोबारा चुनाव नहीं जिता पाएंगे। कांग्रेस नेतृत्व को डीके शिवकुमार ने एहसास दिला दिया कि यदि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में वह मदद नहीं करेंगे। यह सच है कि शिवकुमार बड़े व्यवसायी हैं और व्यवसायियों में उनकी गहरी पैठ है। इसलिए कांग्रेस को सहयोग राशि का प्रबंध कराने में उन जैसा कोई अन्य नेता कांग्रेस में है ही नहीं। यही कारण कि जब तक शिवकुमार को पार्टी नेतृत्व मना पाया तब तक मनाया, लेकिन जब देखा कि अब और अधिक वह मानने वाले नहीं हैं तब विवश होकर सिद्धरमैया को त्यागपत्र का निर्देश देना ही पड़ा। अब विधानसभा की शेष दो वर्ष की अवधि बची है जिसका उपयोग डीके शिवकुमार करेंगे ताकि मई 2026 से मई 2028 तक पार्टी को इतना लोकप्रिय बना दें कि एक बार फिर 2028 में पार्टी चुनाव जीत जाएं।
बहरहाल, कांग्रेस नेतृत्व राजस्थान दोहराने की दोबारा गलती नहीं करना चाहती थी। यही कारण है कि जिस तरह अशोक गहलोत के सामने झुक कर सचिन पायलट की उपेक्षा की और पायलट के समर्थकों को जलील होना पड़ा, वह गलती कर्नाटक में कांग्रेस ने दोहराने की गलती नहीं की। सच तो यह भी है कि तीन साल के शासनकाल में सिद्धरमैया शासन के खिलाफ लोगों में नाराजगी होना स्वाभाविक है किन्तु जब वह पद से हट जाएंगे और नए मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार बनेंगे तो सत्ता विरोधी रूझान का असर कम ही रहेगा। पार्टियां अगले चुनाव में सफलता हासिल करने के लिए भी यही तरीका अपनाती हैं। चुनाव की आहट होते ही किसी नए को मुख्यमंत्री बना देती हैं ताकि पुराने चेहरे को भूल कर वोटर नए चेहरे पर भरोसा करके वोट दे दें। लब्बोलुआब यह है कि कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन सामान्य घटना है। इससे पार्टी के अन्दर स्थिरता और सत्ता में वापसी दोनों की संभावनाएं बढ़ गई हैं।