एम्बुलेंस न मिलने से गर्भवती महिला का अजन्मा बच्चा मरा: परिवार, मंत्री ने जांच का वादा किया
प्रकाशित: 29-05-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
मुंबई, (भाषा)। महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में एक गर्भवती महिला के परिजनों ने बृहस्पतिवार को आरोप लगाया कि डीजल की कथित कमी के कारण सरकारी एम्बुलेंस मिलने में देरी की वजह से उसके (महिला के) अजन्मे बच्चे की मौत हो गई।
इस आरोप के कारण उत्पन्न आक्रोश के बीच, राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश अबितकर ने मामले की जांच का वादा किया। महिला के परिवार का कहना है कि ज्वाला बाजार में प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद उसने सरकारी एम्बुलेंस के लिए लगभग दो घंटे इंतजार किया, लेकिन कथित तौर पर उसे यह बताया गया कि डीजल की कमी के कारण एम्बुलेंस नहीं भेजा जा सकता है। महिला के रिश्तेदारों ने कहा कि उन लोगों ने एक निजी वाहन की व्यवस्था की और उसे (महिला को) हिंगोली के सरकारी मेडिकल कॉलेज ले गए, जहां चिकित्सकों ने ऑपरेशन द्वारा प्रसव (सी-सेक्शन) कराया, लेकिन वे उसके बच्चे को नहीं बचा सके। मंत्री अबितकर ने नांदेड़ में कहा कि यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि डीजल की अनुपलब्धता के कारण इलाज नहीं हो सका, लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि घटना की जांच की जाएगी। उन्होंने पत्रकारों से कहा, wअगर ऐसी कोई घटना घटी है, तो हम जांच करेंगे। एम्बुलेंस के लिए डीजल का बजट में प्रावधान है और कर्मचारी भी तैनात किए गए हैं। अगर (सरकार द्वारा निर्मित) बुनियादी ढांचे का समाज के लिए "ाrक से उपयोग नहीं किया गया है, तो जांच का आदेश दिया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्वाई की जाएगी।w राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शप) की महिला शाखा की प्रदेश अध्यक्ष रोहिणी खडसे ने महाराष्ट्र में ईंधन की कमी न होने के राज्य सरकार के दावे पर सवाल उ"ाया और पूछा, इसके लिए किसे जिम्मेदार "हराया जाना चाहिए: स्वास्थ्य प्रशासन, एम्बुलेंस कर्मचारी या सरकार? परिजनों ने बताया कि संबंधित महिला की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, ऐसे में उन्होंने मदद के लिए 108 और 102 आपातकालीन एम्बुलेंस सेवाओं को फोन किया। उन्होंने दावा किया कि एम्बुलेंस कर्मचारियों ने उनसे कहा कि वे दोबारा फोन न करें, क्योंकि वाहन में डीजल नहीं है। परिवार ने बताया कि उनके इलाके के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर 102 नंबर की एक एम्बुलेंस खड़ी थी, लेकिन बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, कथित तौर पर उन्हें वह उपलब्ध नहीं कराई गई।
महिला की मां ने कहा, हम गरीब लोग हैं। ऐसी आपात स्थिति में हम तुरंत निजी वाहन का इंतजाम कैसे कर सकते थे? उन्होंने यह कहते हुए साफ तौर पर एम्बुलेंस देने से इनकार कर दिया कि डीजल नहीं है। अगर मेरी बेटी को भी कुछ हो जाता, तो कौन जिम्मेदार होता?w रिश्तेदारों ने कहा कि घंटों इंतजार करने के बाद उन्होंने पैसे इकट्"ा करके एक निजी वाहन किराये पर लिया और महिला को हिंगोली स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज ले गए। एक रिश्तेदार ने आरोप लगाया कि जब तक महिला अस्पताल पहुंची, तबतक हुई देरी अजन्मे बच्चे के लिए घातक साबित हुई। घटना के सामने आने के बाद, लोगों ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की आलोचना की और ग्रामीण महाराष्ट्र में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं पर सवाल उ"ाए।
इस आरोप के कारण उत्पन्न आक्रोश के बीच, राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश अबितकर ने मामले की जांच का वादा किया। महिला के परिवार का कहना है कि ज्वाला बाजार में प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद उसने सरकारी एम्बुलेंस के लिए लगभग दो घंटे इंतजार किया, लेकिन कथित तौर पर उसे यह बताया गया कि डीजल की कमी के कारण एम्बुलेंस नहीं भेजा जा सकता है। महिला के रिश्तेदारों ने कहा कि उन लोगों ने एक निजी वाहन की व्यवस्था की और उसे (महिला को) हिंगोली के सरकारी मेडिकल कॉलेज ले गए, जहां चिकित्सकों ने ऑपरेशन द्वारा प्रसव (सी-सेक्शन) कराया, लेकिन वे उसके बच्चे को नहीं बचा सके। मंत्री अबितकर ने नांदेड़ में कहा कि यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि डीजल की अनुपलब्धता के कारण इलाज नहीं हो सका, लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि घटना की जांच की जाएगी। उन्होंने पत्रकारों से कहा, wअगर ऐसी कोई घटना घटी है, तो हम जांच करेंगे। एम्बुलेंस के लिए डीजल का बजट में प्रावधान है और कर्मचारी भी तैनात किए गए हैं। अगर (सरकार द्वारा निर्मित) बुनियादी ढांचे का समाज के लिए "ाrक से उपयोग नहीं किया गया है, तो जांच का आदेश दिया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्वाई की जाएगी।w राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शप) की महिला शाखा की प्रदेश अध्यक्ष रोहिणी खडसे ने महाराष्ट्र में ईंधन की कमी न होने के राज्य सरकार के दावे पर सवाल उ"ाया और पूछा, इसके लिए किसे जिम्मेदार "हराया जाना चाहिए: स्वास्थ्य प्रशासन, एम्बुलेंस कर्मचारी या सरकार? परिजनों ने बताया कि संबंधित महिला की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, ऐसे में उन्होंने मदद के लिए 108 और 102 आपातकालीन एम्बुलेंस सेवाओं को फोन किया। उन्होंने दावा किया कि एम्बुलेंस कर्मचारियों ने उनसे कहा कि वे दोबारा फोन न करें, क्योंकि वाहन में डीजल नहीं है। परिवार ने बताया कि उनके इलाके के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर 102 नंबर की एक एम्बुलेंस खड़ी थी, लेकिन बार-बार अनुरोध करने के बावजूद, कथित तौर पर उन्हें वह उपलब्ध नहीं कराई गई।
महिला की मां ने कहा, हम गरीब लोग हैं। ऐसी आपात स्थिति में हम तुरंत निजी वाहन का इंतजाम कैसे कर सकते थे? उन्होंने यह कहते हुए साफ तौर पर एम्बुलेंस देने से इनकार कर दिया कि डीजल नहीं है। अगर मेरी बेटी को भी कुछ हो जाता, तो कौन जिम्मेदार होता?w रिश्तेदारों ने कहा कि घंटों इंतजार करने के बाद उन्होंने पैसे इकट्"ा करके एक निजी वाहन किराये पर लिया और महिला को हिंगोली स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेज ले गए। एक रिश्तेदार ने आरोप लगाया कि जब तक महिला अस्पताल पहुंची, तबतक हुई देरी अजन्मे बच्चे के लिए घातक साबित हुई। घटना के सामने आने के बाद, लोगों ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की आलोचना की और ग्रामीण महाराष्ट्र में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं पर सवाल उ"ाए।