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हमला, अस्पताल और राजनीतिक आरोप: पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की परीक्षा

प्रकाशित: 01-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
हमला, अस्पताल और राजनीतिक आरोप: पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की परीक्षा
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर हिंसा और आरोप-प्रत्यारोप के चक्र में फंस गई है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी पर स्थानीय लोगों द्वारा अंडे, पत्थर और जूते फेंकने की घटना ने न केवल राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि अस्पतालों की निष्पक्षता और राजनीतिक सहिष्णुता पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है।
यह घटना उस समय हुई जब अभिषेक बनर्जी हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों के बाद कथित टीएमसी कार्यकर्ताओं पर हुए हमलों के शिकार परिवारों से मिलने पहुंचे थे। खासतौर पर टीएमसी कार्यकर्ता संजू कर्मकार की हत्या के मामले में पीड़ित परिवार से मुलाकात का कार्यक्रम था। वीडियो फुटेज में देखा गया कि उनके काफिले पर भीड़ ने हमला बोल दिया, नारे लगाए गए “चोर-चोर'' और सुरक्षा कर्मियों को उन्हें हेलमेट पहनाकर निकालना पड़ा। अभिषेक की शर्ट फटी हुई थी और वे भावुक नजर आए।
अभिषेक बनर्जी ने इसे “पूर्व नियोजित हमला'' करार दिया। उन्होंने दावा किया कि पत्थर उनकी आंख के पास से गुजरा और अगर हेलमेट न होता तो स्थिति गंभीर हो सकती थी। टीएमसी ने इसे बीजेपी समर्थकों द्वारा कराए गए हमले बताया और कहा कि नई सत्ता में विपक्ष को दबाने की कोशिश हो रही है।
दूसरी ओर, भाजपा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। पार्टी नेताओं ने कहा कि यह “जनता का गुस्सा'' था, जो 15 साल के तृणमूल शासन के दौरान कथित भ्रष्टाचार, हिंसा और तानाशाही से त्रस्त है। भाजपा का तर्क है कि टीएमसी चुनाव हारने के बाद पोस्ट-पोल हिंसा फैला रही है और ध्यान भटकाने के लिए इस घटना को राजनीतिक रंग दे रही है।
चुनावी परिवर्तन का संदर्भ इस घटना को समझने के लिए 2026 के विधानसभा चुनावों का परिप्रेक्ष्य जरूरी है। भाजपा ने भारी बहुमत हासिल किया - लगभग 207 सीटें, जबकि टीएमसी मात्र 80 सीटों पर सिमट गई। ममता बनर्जी सहित कई टीएमसी के मंत्री चुनाव हार गए। यह 15 साल के टीएमसी शासन का अंत था, जिसमें भ्रष्टाचार, सिंगूर-नंदीग्राम की यादें, संदेशखाली जैसे मामले और राजनीतिक हिंसा के आरोप लगते रहे। अब सत्ता में आने के बाद बीजेपी पर टीएमसी कार्यकर्ताओं पर हमलों के आरोप लग रहे हैं, जबकि टीएमसी पर पुराने मामलों का बदला लेने के आरोप।
बंगाल में राजनीतिक हिंसा दुर्भाग्यपूर्ण रूप से नई नहीं है। वामपंथी शासन, फिर टीएमसी और अब बीजेपी - हर बदलाव के साथ हिंसा के आरोप-प्रत्यारोप चले आए हैं।
अस्पताल विवाद: नई बहस घटना के बाद अभिषेक बनर्जी को कोलकाता के बेल व्यू और अन्य अस्पतालों में ले जाया गया। यहीं से विवाद और गहरा गया। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि अस्पतालों पर “ऊपर से दबाव'' था। उन्होंने दावा किया कि कुछ अस्पताल उन्हें भर्ती करने से हिचकिचा रहे थे, डॉक्टरों को धमकियां मिल रही थीं और प्राथमिक उपचार में देरी की जा रही थी। ममता ने कहा कि यह केवल हमला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ भी राजनीति है।
हालांकि, अस्पतालों की रिपोर्ट्स अलग कहानी बयां करती हैं। डॉक्टरों ने चोटों को “सतही'' बताया। छाती पर हल्की खरोंच के अलावा कोई गंभीर चोट नहीं पाई गई। अभिषेक पूरी तरह होश में थे, बोल रहे थे और भर्ती की जरूरत नहीं बताई गई। उन्हें बाद में डिस्चार्ज कर दिया गया। टीएमसी ने इन रिपोर्ट्स पर सवाल उठाए और कहा कि दबाव के कारण सही जांच नहीं हो पाई।
यह विवाद स्वास्थ्य संस्थाओं की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यदि राजनीतिक दबाव का आरोप सही है, तो यह चिंताजनक है। लेकिन यदि यह अतिरंजित है, तो अस्पतालों और डॉक्टरों की गरिमा पर हमला है।
राष्ट्रीय प्रतिक्रिया : राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं ने हमले की निंदा की और राजनीतिक हिंसा पर चिंता जताई। टीएमसी ने पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन की घोषणा की।
बीजेपी का पलटवार था कि टीएमसी जब सत्ता में थी, तब विपक्षी कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आम लोगों पर किस तरह अत्याचार हुए, उसकी जांच होनी चाहिए।
हिंसा का चक्र तोड़ना होगा
अभिषेक बनर्जी प्रकरण कई सवाल उठाता है:
* राजनीतिक मतभेदों को हिंसा में बदलने की संस्कृति कब खत्म होगी?
* सत्ता बदलने पर क्या हर बार बदले की भावना हावी हो जाएगी?
* अस्पताल, पुलिस और प्रशासन जैसी संस्थाएं राजनीति से ऊपर रहेंगी या नहीं?
बंगाल की जनता ने 2026 में बदलाव का फैसला किया। अब नई सरकार को कानून-व्यवस्था बहाल करने, पुरानी हिंसा की निष्पक्ष जांच कराने और विकास पर ध्यान देने का मौका मिला है। टीएमसी को विपक्ष की भूमिका में रचनात्मक आलोचना करनी चाहिए, न कि हर घटना को साजिश बताकर माहौल बिगाड़ना चाहिए।
राजनीतिक हिंसा किसी भी दल के लिए स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। इस मामले की स्वतंत्र जांच - हमले की, पोस्ट-पोल हिंसा की और अस्पताल दबाव के आरोपों की - होनी चाहिए। सीबीआई या न्यायिक आयोग जैसे तंत्र से ही सच्चाई सामने आएगी।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब संस्थाएं निष्पक्ष रहें और नेता हिंसा को हथियार न बनाएं। बंगाल को इस चक्र से बाहर निकलना होगा, वरना विकास और शांति सिर्फ सपना बनी रहेगी।
-आदित्य नरेन्द्र