अमेरिका की दोहरी नीति और भारत का भरोसा
प्रकाशित: 31-05-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत और पाकिस्तान को लेकर की गई टिप्पणियों ने भारतीय रणनीतिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक ओर भारत यात्रा के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि भारत लगातार पाकिस्तान की धरती से संचालित आतंकवादी संगठनों को लेकर चिंता जताता रहा है, वहीं दूसरी ओर वाशिंगटन में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार से मुलाकात के बाद उन्होंने पाकिस्तान की “आतंकवाद के खिलाफ साझेदारी'' और “क्षेत्रीय स्थिरता में भूमिका'' की सराहना की।
यह विरोधाभास केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या अमेरिका वास्तव में भारत के सुरक्षा हितों को समझता है, या उसकी विदेश नीति केवल सामरिक लाभ और बदलते वैश्विक समीकरणों पर आधारित है?
भारत वर्षों से यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जाता है। भारत ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और अन्य आतंकी संगठनों के खिलाफ सबूत पेश किए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने भी अतीत में कई बार माना कि पाकिस्तान में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो आतंकवाद को समर्थन देते हैं। हाल ही में नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए रुबियो ने कहा कि भारत की मुख्य चिंता पाकिस्तान की धरती से संचालित आतंकी समूहों को लेकर है।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद वाशिंगटन में पाकिस्तान के साथ बैठक के दौरान वही अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी भूमिका की सराहना करता हुआ दिखाई दिया। अमेरिकी और पाकिस्तानी अधिकारियों की बातचीत में “counterterrorism cooperation'' यानी आतंकवाद विरोधी सहयोग को प्रमुख मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया।
यही वह बिंदु है जहां भारत में अविश्वास की भावना पैदा होती है। भारतीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो पाकिस्तान लंबे समय से “अच्छे आतंकवादी'' और “बुरे आतंकवादी'' की नीति अपनाता रहा है। जो संगठन पाकिस्तान के भीतर हमला करते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है, लेकिन भारत विरोधी आतंकी ढांचे पर अक्सर ढीला रवैया देखा गया है। भारत के लिए यह केवल सीमा विवाद का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।
अमेरिका की नीति को समझने के लिए उसके वैश्विक रणनीतिक हितों को देखना जरूरी है। शीत युद्ध के दौर से ही पाकिस्तान अमेरिका के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। अफगानिस्तान युद्ध, मध्य एशिया तक पहुंच, चीन को संतुलित करने की रणनीति और अब पश्चिम एशिया में बदलते हालात-इन सभी कारणों से अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं करना चाहता।
हालिया घटनाओं में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है। रूबियो और इशाक डार की बैठक भी इसी व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ में हुई थी। अमेरिका के लिए इस समय पश्चिम एशिया में तनाव कम करना प्राथमिकता है और पाकिस्तान उस रणनीति में उपयोगी साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन भारतीय नजरिए से समस्या यह है कि अमेरिका अक्सर आतंकवाद के मुद्दे पर सिद्धांत और व्यवहार मंा अलग-अलग दिखाई देता है। जब भारत में आतंकी हमला होता है, तब अमेरिकी बयान भारत के समर्थन में आते हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही अमेरिका पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने लगता है। इससे भारत में यह धारणा मजबूत होती है कि अमेरिका की नीति स्थायी मित्रता नहीं बल्कि “स्थायी हितों'' पर आधारित है।
यह पहली बार नहीं है जब भारत-अमेरिका संबंधों में ऐसा विरोधाभास दिखाई दिया हो। 2025 में भी जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा था, तब अमेरिकी मध्यस्थता की चर्चा पर भारत ने स्पष्ट किया था कि वह किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करता। भारत लंबे समय से यह मानता रहा है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर पश्चिमी देशों ने हमेशा पर्याप्त कठोरता नहीं दिखाई।
फिर सवाल उठता है-क्या भारत अमेरिका पर भरोसा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह “हाँ'' या “नहीं'' में नहीं दिया जा सकता। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, व्यापार, तकनीक और चीन को लेकर रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। रूबियो ने भारत को अमेरिका का “सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार'' भी बताया। क्वाड जैसे मंचों पर दोनों देश साथ काम कर रहे हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है।
लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भावनाओं पर नहीं, हितों पर चलती हैं। अमेरिका भारत का मित्र हो सकता है, लेकिन वह अपने हितों के लिए पाकिस्तान से भी संबंध बनाए रखेगा। यही वास्तविकता भारत को समझनी होगी। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपनी सुरक्षा और विदेश नीति को किसी एक देश के भरोसे न छोड़े।
आज भारत पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर और कूटनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में है। रूस, अमेरिका, फ्रांस, खाड़ी देशों और वैश्विक दक्षिण-सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना भारत की रणनीतिक आवश्यकता है। यदि अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने संबंध बनाए रखता है, तो भारत को भी अपनी विदेश नीति को यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखना होगा।
रूबियो के बयानों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में नैतिकता से अधिक महत्व सामरिक हितों का होता है। अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ महत्वपूर्ण साझेदार मानता है, लेकिन पाकिस्तान को पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। यही दोहरी नीति भारतीय रणनीतिक समुदाय में संदेह पैदा करती है।
अंतत भारत और अमेरिका के संबंध मजबूत रह सकते हैं, लेकिन यह संबंध “पूर्ण विश्वास'' की बजाय “रणनीतिक सहयोग'' पर आधारित होंगे। भारत को अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ानी चाहिए, लेकिन साथ ही अपनी सुरक्षा, कूटनीति और राष्ट्रीय हितों को लेकर पूरी तरह सतर्क भी रहना होगा। यही आधुनिक वैश्विक राजनीति की वास्तविकता है।
-आदित्य नरेन्द्र
यह विरोधाभास केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या अमेरिका वास्तव में भारत के सुरक्षा हितों को समझता है, या उसकी विदेश नीति केवल सामरिक लाभ और बदलते वैश्विक समीकरणों पर आधारित है?
भारत वर्षों से यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया जाता है। भारत ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और अन्य आतंकी संगठनों के खिलाफ सबूत पेश किए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने भी अतीत में कई बार माना कि पाकिस्तान में ऐसे तत्व मौजूद हैं जो आतंकवाद को समर्थन देते हैं। हाल ही में नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए रुबियो ने कहा कि भारत की मुख्य चिंता पाकिस्तान की धरती से संचालित आतंकी समूहों को लेकर है।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद वाशिंगटन में पाकिस्तान के साथ बैठक के दौरान वही अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी भूमिका की सराहना करता हुआ दिखाई दिया। अमेरिकी और पाकिस्तानी अधिकारियों की बातचीत में “counterterrorism cooperation'' यानी आतंकवाद विरोधी सहयोग को प्रमुख मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया।
यही वह बिंदु है जहां भारत में अविश्वास की भावना पैदा होती है। भारतीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो पाकिस्तान लंबे समय से “अच्छे आतंकवादी'' और “बुरे आतंकवादी'' की नीति अपनाता रहा है। जो संगठन पाकिस्तान के भीतर हमला करते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है, लेकिन भारत विरोधी आतंकी ढांचे पर अक्सर ढीला रवैया देखा गया है। भारत के लिए यह केवल सीमा विवाद का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।
अमेरिका की नीति को समझने के लिए उसके वैश्विक रणनीतिक हितों को देखना जरूरी है। शीत युद्ध के दौर से ही पाकिस्तान अमेरिका के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। अफगानिस्तान युद्ध, मध्य एशिया तक पहुंच, चीन को संतुलित करने की रणनीति और अब पश्चिम एशिया में बदलते हालात-इन सभी कारणों से अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं करना चाहता।
हालिया घटनाओं में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है। रूबियो और इशाक डार की बैठक भी इसी व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ में हुई थी। अमेरिका के लिए इस समय पश्चिम एशिया में तनाव कम करना प्राथमिकता है और पाकिस्तान उस रणनीति में उपयोगी साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन भारतीय नजरिए से समस्या यह है कि अमेरिका अक्सर आतंकवाद के मुद्दे पर सिद्धांत और व्यवहार मंा अलग-अलग दिखाई देता है। जब भारत में आतंकी हमला होता है, तब अमेरिकी बयान भारत के समर्थन में आते हैं। लेकिन कुछ समय बाद वही अमेरिका पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाने लगता है। इससे भारत में यह धारणा मजबूत होती है कि अमेरिका की नीति स्थायी मित्रता नहीं बल्कि “स्थायी हितों'' पर आधारित है।
यह पहली बार नहीं है जब भारत-अमेरिका संबंधों में ऐसा विरोधाभास दिखाई दिया हो। 2025 में भी जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा था, तब अमेरिकी मध्यस्थता की चर्चा पर भारत ने स्पष्ट किया था कि वह किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करता। भारत लंबे समय से यह मानता रहा है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर पश्चिमी देशों ने हमेशा पर्याप्त कठोरता नहीं दिखाई।
फिर सवाल उठता है-क्या भारत अमेरिका पर भरोसा कर सकता है? इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह “हाँ'' या “नहीं'' में नहीं दिया जा सकता। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा, व्यापार, तकनीक और चीन को लेकर रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है। रूबियो ने भारत को अमेरिका का “सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार'' भी बताया। क्वाड जैसे मंचों पर दोनों देश साथ काम कर रहे हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है।
लेकिन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भावनाओं पर नहीं, हितों पर चलती हैं। अमेरिका भारत का मित्र हो सकता है, लेकिन वह अपने हितों के लिए पाकिस्तान से भी संबंध बनाए रखेगा। यही वास्तविकता भारत को समझनी होगी। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपनी सुरक्षा और विदेश नीति को किसी एक देश के भरोसे न छोड़े।
आज भारत पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर और कूटनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में है। रूस, अमेरिका, फ्रांस, खाड़ी देशों और वैश्विक दक्षिण-सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना भारत की रणनीतिक आवश्यकता है। यदि अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने संबंध बनाए रखता है, तो भारत को भी अपनी विदेश नीति को यथार्थवादी दृष्टिकोण से देखना होगा।
रूबियो के बयानों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक राजनीति में नैतिकता से अधिक महत्व सामरिक हितों का होता है। अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ महत्वपूर्ण साझेदार मानता है, लेकिन पाकिस्तान को पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। यही दोहरी नीति भारतीय रणनीतिक समुदाय में संदेह पैदा करती है।
अंतत भारत और अमेरिका के संबंध मजबूत रह सकते हैं, लेकिन यह संबंध “पूर्ण विश्वास'' की बजाय “रणनीतिक सहयोग'' पर आधारित होंगे। भारत को अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ानी चाहिए, लेकिन साथ ही अपनी सुरक्षा, कूटनीति और राष्ट्रीय हितों को लेकर पूरी तरह सतर्क भी रहना होगा। यही आधुनिक वैश्विक राजनीति की वास्तविकता है।
-आदित्य नरेन्द्र