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आधार केवल पहचान का माध्यम बने नागरिकता का प्रमाण नहीं

प्रकाशित: 18-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
भारत में आधार कार्ड आज सबसे व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले पहचान पत्रों में शामिल है। देश की बड़ी आबादी किसी न किसी सरकारी या निजी सेवा के लिए आधार का उपयोग करती है। बैंक खाता खोलने से लेकर मोबाइल सिम लेने तक और सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने से लेकर विभिन्न संस्थानों में पहचान साबित करने तक आधार एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन चुका है। लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका और उस पर हुई सुनवाई ने आधार की वैधानिक सीमाओं तथा उसके वास्तविक उद्देश्य को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों केंद्रशासित प्रदेशों चुनाव आयोग और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि आधार का उपयोग केवल पहचान के प्रमाण के रूप में हो और उसे नागरिकता निवास जन्मतिथि अथवा पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार न किया जाए।
यह मामला केवल एक कानूनी तकनीकी प्रश्न नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा प्रशासनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों से जुड़ा हुआ विषय भी है। याचिका में आधार अधिनियम 2016 की धारा 9 का उल्लेख किया गया है जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आधार संख्या नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं है। इसके बावजूद व्यवहार में अनेक सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों द्वारा आधार को नागरिकता और निवास के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। यही स्थिति अब न्यायिक जांच के दायरे में आई है। आधार की मूल अवधारणा प्रत्येक व्यक्ति को एक विशिष्ट पहचान संख्या उपलब्ध कराना थी ताकि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता लाई जा सके और फर्जी लाभार्थियों को रोका जा सके। आधार संख्या किसी व्यक्ति की बायोमेट्रिक और जनसांख्यिकीय जानकारी से जुड़ी होती है। इसका उद्देश्य व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित करना है न कि उसकी राष्ट्रीयता निर्धारित करना।
-कांतिलाल मांडोत,
सूरत, गुजरात।