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आयात के बढ़ते जाल में फंसती भारतीय अर्थव्यवस्था

प्रकाशित: 22-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
अवनीश कुमार गुप्ता
भारत की अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ विकास की चमक के पीछे आयात पर बढ़ती निर्भरता की गहरी चिंता भी लगातार उभर रही है। हाल के वर्षों में भारत ने दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाई है, लेकिन इसी विकास मॉडल ने विदेशी वस्तुओं और संसाधनों पर देश की निर्भरता को भी खतरनाक स्तर तक पहुँचा दिया है। पेट्रोलियम उत्पादों, खाद्य तेलों, सोना, उर्वरक और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आयात में लगातार बढ़ोतरी केवल व्यापारिक आँकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों का संकेत भी बनती जा रही है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से पेट्रोलियम खपत कम करने, अनावश्यक विदेशी यात्राओं से बचने और घरेलू उत्पादों को प्राथमिकता देने की अपील को केवल राजनीतिक बयान मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसके पीछे विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार घाटे और रुपये पर बढ़ते दबाव की वास्तविक चिंता छिपी हुई है।
भारत का व्यापार घाटा लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। आयात और निर्यात के बीच बढ़ता अंतर यह दर्शाता है कि देश जितना उत्पादन कर दुनिया को बेच पा रहा है, उससे कहीं अधिक वह विदेशों से खरीदने को मजबूर है। समस्या केवल आयात बढ़ने की नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों की है जिनमें आत्मनिर्भरता की सबसे अधिक आवश्यकता थी। खाद्य तेल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारत आज अपनी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा विदेशों से मँगाने को विवश है। पाम ऑयल से लेकर सोयाबीन तेल तक, घरेलू मांग का बड़ा भाग इंडोनेशिया, मलेशिया और अन्य देशों पर निर्भर है। यह स्थिति केवल आर्थिक कमजोरी नहीं, बल्कि नीति निर्माण की असफलता भी मानी जाएगी। दशकों से कृषि सुधारों और तेल बीज उत्पादन बढ़ाने की योजनाओं के बावजूद यदि देश खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया, तो यह विकास मॉडल पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
इसी प्रकार उर्वरकों का आयात भी चिंता का बड़ा कारण बन चुका है। वैश्विक तनाव, रूस-पोन युद्ध और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल आया है। भारत जैसे विशाल कृषि अर्थतंत्र के लिए इसका सीधा अर्थ है कि खेती की लागत बढ़ेगी और सरकार की सब्सिडी पर बोझ भी असाधारण रूप से बढ़ेगा। यदि सरकार किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी बढ़ाती है तो राजकोषीय घाटा प्रभावित होगा, और यदि राहत नहीं देती तो कृषि संकट गहराएगा। दोनों ही स्थितियाँ अर्थव्यवस्था के लिए जोखिमपूर्ण हैं। यह स्थिति बताती है कि आयात निर्भरता केवल व्यापार घाटे का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता से भी जुड़ा प्रश्न है।
सोने का आयात भारत की आर्थिक मानसिकता का अलग ही पक्ष उजागर करता है। आर्थिक अनिश्चितता के समय भारतीय समाज में सोना सुरक्षित निवेश माना जाता है। शेयर बाजार की अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक तनाव के कारण सोने की मांग में वृद्धि स्वाभाविक है, लेकिन इसका परिणाम विदेशी मुद्रा के बड़े बहिर्वाह के रूप में सामने आता है। भारत में सोना उत्पादन नगण्य है, इसलिए इसकी लगभग पूरी आवश्यकता आयात से पूरी होती है। यही कारण है कि सरकार समय-समय पर सोने पर आयात शुल्क बढ़ाती रही है, ताकि इसकी मांग नियंत्रित की जा सके। लेकिन वास्तविकता यह है कि केवल टैक्स बढ़ाने से मानसिकता नहीं बदलती। जब तक सुरक्षित निवेश के घरेलू विकल्पों पर जनता का भरोसा मजबूत नहीं होगा, तब तक सोने की मांग घटाना कठिन रहेगा।
सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और तकनीकी उपकरणों की है। मोबाइल फोन निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में भारत ने कुछ प्रगति अवश्य की है, लेकिन सच्चाई यह है कि अधिकांश महत्वपूर्ण पुर्जे अब भी विदेशों से आयात होते हैं। चीन पर निर्भरता कम करने के लिए शुरू की गई योजनाओं के बावजूद भारत अभी तक पूर्ण तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल नहीं कर पाया है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर और हाई-टेक उपकरणों के क्षेत्र में आयात तेजी से बढ़ रहा है। इसका अर्थ यह है कि भारत का डिजिटल और तकनीकी विस्तार विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर आधारित है। यदि वैश्विक तनाव बढ़ते हैं या आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत की औद्योगिक गति पर सीधा असर पड़ सकता है।
रुपये पर बढ़ता दबाव इस पूरी स्थिति का स्वाभाविक परिणाम है। जब किसी देश का आयात अधिक और निर्यात अपेक्षाकृत कमजोर होता है, तो विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है। इससे स्थानीय मुद्रा कमजोर होने लगती है। हाल के महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक को रुपये को स्थिर रखने के लिए लगातार हस्तक्षेप करना पड़ा है। विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर मुद्रा बाजार में संतुलन बनाए रखना अल्पकालिक समाधान हो सकता है, लेकिन दीर्घकाल में मजबूत उत्पादन और निर्यात क्षमता ही स्थायी समाधान प्रदान कर सकती है। यदि आयात निर्भरता इसी गति से बढ़ती रही, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव और अधिक गहराएगा।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विकास और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। वैश्वीकरण के दौर में पूर्ण आत्मनिर्भरता संभव नहीं है, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में अत्यधिक निर्भरता भी राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, उर्वरक और तकनीक जैसे क्षेत्रों में यदि देश बाहरी बाजारों के उतार-चढ़ाव पर निर्भर रहेगा, तो हर अंतरराष्ट्रीय संकट भारतीय अर्थव्यवस्था को झकझोरता रहेगा। इसलिए केवल उपभोक्ताओं से अपील करना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को दीर्घकालिक औद्योगिक और कृषि नीतियों पर गंभीरता से काम करना होगा।
कृषि क्षेत्र में तेल बीज उत्पादन को बढ़ावा देना, घरेलू उर्वरक उत्पादन क्षमता का विस्तार, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों में निवेश और इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण की संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला विकसित करना समय की आवश्यकता बन चुकी है। केवल “मेक इन इंडिया'' जैसे नारों से वास्तविक परिवर्तन नहीं आएगा, जब तक उद्योगों को तकनीकी अनुसंधान, सस्ती पूंजी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप ढाँचा उपलब्ध नहीं कराया जाता। भारत को उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अधिक आक्रामक ढंग से बढ़ना होगा। इसके साथ ही उपभोग की संस्कृति पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है। तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग विदेशी ब्रांडों और आयातित वस्तुओं की ओर आकर्षित हो रहा है। यह उपभोग आधारित विकास मॉडल अल्पकालिक आर्थिक गतिविधि तो बढ़ाता है, लेकिन दीर्घकाल में विदेशी निर्भरता को भी गहरा करता है। यदि घरेलू उद्योग गुणवत्ता और नवाचार के आधार पर वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे, तो आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित रह जाएगा।
भारत की अर्थव्यवस्था में क्षमता की कोई कमी नहीं है। विशाल बाजार, युवा आबादी और बढ़ती तकनीकी क्षमता देश को वैश्विक आर्थिक शक्ति बना सकती है। लेकिन इसके लिए केवल विकास दर के आंकड़ों पर गर्व करने से अधिक आवश्यक यह है कि विकास की बुनियाद मजबूत हो। यदि विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा लगातार आयात बिल चुकाने में खर्च होता रहेगा, तो आर्थिक शक्ति का सपना अधूरा रह सकता है। आने वाले वर्षों में भारत को यह तय करना होगा कि वह केवल दुनिया का बड़ा उपभोक्ता बाजार बनकर रहना चाहता है या वास्तव में आत्मनिर्भर और टिकाऊ आर्थिक महाशक्ति बनना चाहता है।
(लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार हैं।)