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केरलम में बंगाल फार्मूला

प्रकाशित: 22-05-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
केरलम में बंगाल फार्मूला
केरलम में चुनाव परिणाम यूडीएफ यानि कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को मिला जबकि दस वर्षें से शासन में रही एलडीएफ यानि सीपीएम के नेतृत्व वाले गठबंधन को पराजय का सामना करना पड़ा। केरलम विधानसभा की कुल 140 सीटों में से यूडीएफ को 102 सीटें मिलीं जबकि एलडीएफ को 34 सीटें। यूडीएफ के विधायक दल के नेता ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली जबकि विपक्षी गठबंधन के विधायक दल के नेता को विधानसभा अध्यक्ष विपक्ष का नेता नियुक्त करेंगे। लेकिन तीसरी पाटी है भारतीय जनता पाटी (भाजपा) जिसके मात्र तीन ही विधायक हैं जिनका नाम है-पूर्व केन्द्राrय मंत्री राजीव चन्द्रशेखर, वी मुरलीधरन और बी गोपकुमार। इन्हीं तीन विधायकों के बल पर भाजपा ने विधानसभा के अध्यक्ष के पद हेतु चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। भाजपा के इस फैसले की खिल्ली भी उड़ाई जा रही है और यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए दूसरे दलों में फूट भी डलवाएगी। लेकिन सच तो यह है कि भाजपा ने केरलम में अपनी मजबूत उपस्थिति के लिए अब चुनावी रणनीति को सही दिशा और स्पष्ट नीति के अनुसार आजमाने जा रही है। भाजपा राज्य की जनसांख्यिकी बनावट से भलीभांति परिचित है और उसे अपनी चिरपरिचित हिन्दुत्व की राजनीति पर पूरा भरोसा है। राज्य में भले ही मुस्लिम वोटरों की हराने-जिताने में सबसे ज्यादा भूमिका रहती है किन्तु वास्तविकता यह है कि मुस्लिम मात्र 26.6 प्रतिशत हैं जबकि ईसाई 18.4 प्रतिशत। मतलब कि दोनों को मिला दें तब भी 45 प्रतिशत होते हैं जबकि हिन्दू 54.7 प्रतिशत हैं। मजे की बात तो यह है कि जबसे केरलम में कैथलिक ईसाई खुलकर मुस्लिम जेहादियों से अपने अस्तित्व के लिए खतरे की बात करने लगे हैं और उन्हें लगता है कि कांग्रेस तो मुस्लिम लीग की सहयोगी है जबकि सीपीएम मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण ईसाई समुदाय के साथ न्याय नहीं कर पाती तभी से उन्होंने तय कर लिया है कि यदि बहुसंख्यक हिन्दुओं को यह विश्वास दिलाया जा सके कि उनके हितों की रक्षा के लिए भाजपा सक्षम है तो आज जो हिन्दू विभाजित हैं, वे एक जुटता से उसके साथ जुड़ जाएंगे। 2021 में जो ईसाई मतदाता परम्परागत रूप से कांग्रेस को वोट देते थे, उन्होंने मुस्लिम लीग और मुस्लिम कट्टरता से डर कर एलडीएफ को वोट डाल दिया। इस तरह बड़ी आसानी से एलडीएफ सत्ता में दोबारा आ गई थी। लेकिन 2026 के चुनाव में ईसाई वोटरों ने भाजपा को भी वोट दिया। इस तरह ईसाई वोटों में विभाजन का लाभ यूडीएफ को मिला। भाजपा को भले ही तीन सीटें ही मिलीं किन्तु उसे वोट कम नहीं मिले हैं। राज्य में भाजपा का कैडर लगातार मजबूत हो रहा है जबकि संगठन में ईसाई नेताओं की सक्रियता बढ़ती जा रही है। कई जिला इकाइयों के अध्यक्ष और महामंत्री ईसाई समुदाय से होने के कारण अब भाजपा इस समुदाय के लिए अछूत नहीं रह गई है। भाजपा ने ठीक यही रणनीति पश्चिम बंगाल में भी अपनाई थी जिसका उसे लाभ भी मिला।
सच तो यह है कि भाजपा अपने प्रभाव को जनमानस में स्थाई भाव के रूप में बैठाना चाहती है। अभी तक कार्यकर्ता तो भाजपा के बड़ी संख्या में हुआ करते थे किन्तु उनके अन्दर न तो आशावाद था न किसी तरह का उत्साह। यह पहली बार है जब भाजपा केरलम में अपनी जड़ों को जमाने के लिए संकल्पबद्ध दिखी।
बहरहाल केरलम में भाजपा के लिए दोनों गठबंधन में से किसी के साथ भी जुड़ना असंभव है इसलिए उसे हर हाल में अकेले ही राजनीतिक स्थान बनाना पड़ेगा। इसीलिए भाजपा पाटी के जुझारू चरित्र का ज्यादा से ज्यादा प्रचार और मतदाताओं के दिल व दिमाग में पाटी की मजबूती को बैठाना और इस बात का संकेत देना कि भाजपा मात्र वोट काटने के लिए ही चुनाव नहीं लड़ती बल्कि वह चुनाव जीतने के लिए केरलम में जमी है। भाजपा में चुनौतियों को स्वीकार करने का अपना तरीका है। यह पाटी तीन सीटों से आगे बढ़ने के लिए प्रदेश की जनता में अपने प्रति भरोसा और विश्वास पैदा करने की कोशिश कर रही है और अब जो विधानसभा अध्यक्ष के पद का चुनाव लड़ने जा रही है उसका सांकेतिक महत्व यही है कि वह दोनों गठबंधनों से अलग रहते हुए वह हर चुनाव लड़ेगी।