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क्या बंगाल में अब खत्म होगा हिंसा और भ्रष्टाचार का दौर?

प्रकाशित: 16-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
योगेश कुमार गोयल
पश्चिम बंगाल की जिस धरती ने दशकों तक वामपंथी ‘लाल सलाम' की गूंज और बाद में ममता बनर्जी के ‘मां-माटी-मानुष' के नारों को आत्मसात किया, वहां ‘जय श्री राम' और ‘सोनार बांग्ला' के उद्घोष के बीच शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री पद पर आरूढ़ होना भारतीय राजनीति के सबसे बड़े सत्ता-परिवर्तन के रूप में दर्ज हो गया है।
शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में सत्तारूढ़ होना केवल सरकार बदलने की घटना नहीं बल्कि बंगाल की वैचारिक दिशा, राजनीतिक संस्कृति और प्रशासनिक संरचना में एक बड़े परिवर्तन का संकेत है। वे ऐसे समय में सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं, जब पश्चिम बंगाल लंबे समय से राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक पक्षपात, भ्रष्टाचार, सिंडिकेट संस्कृति, आर्थिक संकट, अवैध घुसपैठ और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। नंदीग्राम आंदोलन से उभरे इस नेता के समक्ष अब केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं बल्कि पूरे राज्य की दिशा बदलने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। सत्ता परिवर्तन का उत्साह जितना विशाल है, चुनौतियों का पहाड़ उससे कहीं अधिक ऊंचा है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति दशकों से वैचारिक संघर्ष और राजनीतिक हिंसा की प्रयोगशाला रही है। वामपंथी शासनकाल में ‘कैडर संस्कृति' और तृणमूल शासन में राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों ने लोकतंत्र की निष्पक्षता पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाए। 2021 के चुनावों के बाद हुई हिंसा ने राष्ट्रीय स्तर पर बंगाल की छवि को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। ऐसे माहौल में शुभेंदु के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य को भय, हिंसा और प्रतिशोध की राजनीति से बाहर निकालने की है।
यदि नई सरकार भी राजनीतिक बदले की संस्कृति में उलझ जाती है तो जनता का विश्वास शीघ्र टूट सकता है। इसलिए शुभेंदु के लिए यह आवश्यक होगा कि वे पुलिस और प्रशासन को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर संवैधानिक निष्पक्षता की दिशा में आगे बढ़ाएं। वास्तव में बंगाल की जनता अब संघर्ष नहीं, स्थिरता चाहती है। लोग ऐसी सरकार की अपेक्षा कर रहे हैं, जो कानून-व्यवस्था को राजनीतिक विचारधारा से ऊपर रख सके। मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि क्या वे अपने कार्यकर्ताओं की आक्रामक राजनीतिक ऊर्जा को विकास और सुशासन की दिशा में मोड़ पाते हैं या नहीं।
नई सरकार के समक्ष दूसरी बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार और सिंडिकेट संस्कृति को समाप्त करने की है। वर्षों से बंगाल में निर्माण कार्यों, स्थानीय बाजारों, पंचायतों और सरकारी योजनाओं में बिचौलियों के प्रभाव को लेकर आरोप लगते रहे हैं। ‘कट-मनी' शब्द बंगाल की राजनीति का प्रतीक बन चुका था। भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था। अब सत्ता में आने के बाद जनता की अपेक्षा है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध केवल भाषण नहीं, ठोस कार्रवाई दिखाई दे। हालांकि यह काम उतना आसान नहीं होगा, जितना राजनीतिक मंचों से प्रतीत होता है।
प्रशासनिक तंत्र वर्षों से जिस राजनीतिक ढांचे में काम करता रहा है, उसे अचानक बदल देना सरल नहीं है। शुभेंदु स्वयं लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा रहे हैं, इसलिए वे उस व्यवस्था की कमजोरियों को निकट से जानते हैं। यही अनुभव उनके लिए ताकत भी बन सकता है और विरोधियों के लिए हमला करने का आधार भी। यदि वे डिजिटल पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक सुधारों को प्रभावी ढंग से लागू कर पाते हैं तो बंगाल वास्तव में ‘पोरिबर्तन' की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
अवैध घुसपैठ और सीमा सुरक्षा नई सरकार के सामने सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है। बांग्लादेश से लगती पश्चिम बंगाल की लंबी और पोरस सीमा लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से चिंता का विषय रही है। भाजपा लगातार आरोप लगाती रही है कि अवैध घुसपैठ ने राज्य की जनसांख्यिकी और राजनीतिक संतुलन को प्रभावित किया है। अब जब केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार है, तब जनता की अपेक्षाएं और बढ़ गई हैं। शुभेंदु अधिकारी के सामने चुनौती केवल सीमा सील करने या तस्करी रोकने की नहीं है बल्कि सीमावर्ती जिलों में विश्वास और स्थिरता स्थापित करने की भी है। गौ-तस्करी, नकली मुद्रा, हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे संगठित अपराध लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय रहे हैं। यदि नई सरकार आधुनिक तकनीक, बेहतर निगरानी और केंद्र-राज्य समन्वय के माध्यम से प्रभावी रणनीति बनाती है तो सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा की स्थिति बेहतर हो सकती है लेकिन इस मुद्दे का राजनीतिक और सामाजिक संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होगा क्योंकि कठोर कार्रवाई और सांप्रदायिक तनाव के बीच की रेखा बेहद पतली है।
आर्थिक मोर्चे पर स्थिति और भी जटिल है। पश्चिम बंगाल इस समय भारी कर्ज के बोझ तले दबा है। राज्य पर लाखों करोड़ रुपये का ऋण है और राजस्व संसाधन सीमित हैं। दूसरी ओर भाजपा ने चुनावों के दौरान महिलाओं को प्रतिमाह आर्थिक सहायता, युवाओं को रोजगार और कई लोकलुभावन योजनाओं के वादे किए हैं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि खाली खजाने के साथ इन वादों को पूरा कैसे किया जाएगा। शुभेंदु के सामने सबसे कठिन चुनौती विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन स्थापित करने की होगी। यदि सरकार केवल लोकलुभावन योजनाओं पर निर्भर रहती है तो राज्य की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है। इसलिए बंगाल को फिर से औद्योगिक और निवेश केंद्र बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास आवश्यक होंगे। कभी देश के प्रमुख औद्योगिक राज्यों में शामिल रहा बंगाल आज उद्योगों के पलायन का दर्द झेल रहा है। सिंगूर और नंदीग्राम की घटनाओं ने निवेशकों के मन में असुरक्षा पैदा की थी। विडंबना यह है कि जिस नंदीग्राम आंदोलन ने शुभेंदु अधिकारी को राजनीतिक पहचान दी, अब वही उनके सामने औद्योगिक पुनर्निर्माण की चुनौती बनकर खड़ा है।
राजनीतिक विजय के बाद प्रशासनिक परिपक्वता की सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि सरकार अपने विरोधियों और अल्पसंख्यकों का विश्वास भी जीत सके। यदि बंगाल सांप्रदायिक तनाव की ओर बढ़ता है तो उसका सबसे बड़ा नुकसान विकास और निवेश को होगा। इसलिए शुभेंदु अधिकारी को ऐसी राजनीति से बचना होगा, जो अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती है लेकिन दीर्घकालिक सामाजिक अस्थिरता पैदा कर सकती है। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी अनुभव और संगठन क्षमता है। वे बंगाल की ग्रामीण राजनीति, पंचायत ढांचे और प्रशासनिक वास्तविकताओं को निकट से समझते हैं लेकिन सत्ता में आने के बाद संघर्ष की राजनीति पर्याप्त नहीं होती, वहां संतुलन, धैर्य और दूरदृष्टि की आवश्यकता होती है। बंगाल की जनता अब केवल नारे नहीं बल्कि परिणाम चाहती है।
आज बंगाल एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। दशकों तक ‘लाल सलाम' और फिर ‘मां-माटी-मानुष' की राजनीति देखने वाला यह राज्य अब ‘जय श्रीराम' के नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है लेकिन किसी भी सरकार की वास्तविक सफलता नारों से नहीं, जनता के जीवन में आए बदलाव से तय होती है। शुभेंदु अधिकारी के सामने अवसर भी ऐतिहासिक है और जोखिम भी उतना ही बड़ा।
यदि वे हिंसा, भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट और सामाजिक अविश्वास से जूझते बंगाल को विकास, उद्योग, शिक्षा और सामाजिक समरसता की राह पर आगे बढ़ाने में सफल होते हैं तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बंगाल के पुनर्जागरण की शुरुआत होगी लेकिन यदि राजनीतिक टकराव, वैचारिक कट्टरता और प्रशासनिक अस्थिरता हावी रही तो यह परिवर्तन भी इतिहास के एक और अधूरे अध्याय में बदल सकता है। बंगाल की जनता अब यह देखना चाहती है कि क्या वास्तव में ‘पोरिबर्तन' केवल चुनावी नारा था या फिर एक नए युग की वास्तविक शुरुआत।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)