ईरान के मामले में चीन ने ट्रंप को भेजा खाली हाथ?
प्रकाशित: 16-05-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे में लगभग वही हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी। ट्रंप का चीन दौरा मुख्य रूप से गर्मजोशी, प्रतीकात्मकता और तनाव कम करने के प्रयासों के रूप में सामने आया जिसमें ठोस आर्थिक समझौतों की बजाए दो घंटे से अधिक की हाई लेबल बैठक प्रमुख रही। ट्रंप ने इस दौरे के दौरान दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को संभालने का प्रयास किया जिसमें चीन ने ताइवान जैसे मुद्दे पर एक ओर जहां अपना रुख पहले की तरह ही सख्त रखा तो वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने ईरान के मुद्दे पर कुछ रियायतें पाने की कोशिश की। बातचीत का पूरा ब्यौरा सामने आने पर ही पता चलेगा कि ईरान के मुद्दे पर अमेरिका को कुछ हासिल हुआ या इस मामले में चीन ने अमेरिका को खाली हाथ वापस भेज दिया है। चीन ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए एक ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है जिसकी गूंज ग्रेट हाल आफ द पीपुल से कहीं अधिक दूर तक सुनाई देगी। इस दौरे में चीन को अमेरिका के साथ बराबरी का दर्जा दिया गया है। इससे भू-राजनीति में चीन का कद बढ़ता हुआ दिखाई देता है। पिछले कुछ समय से अमेरिका पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव में उलझा हुआ है। इसका फायदा उठाते हुए चीन खुद को एक स्थिरता लाने वाली ताकत और वैश्विक कूटनीति के एक मुख्य स्तंभ के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है ताकि दुनिया को यह लगे कि वह वैश्विक संकटों को दूर करने में जरूरी हिस्सेदार है। ट्रंप के साथ चीन गया व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल दिखाता है कि अमेरिका के कारोबारी हित चीन के बाजार और निर्माण इकोसिस्टम से गहरे जुड़े हुए हैं। अमेरिका चाहता है कि चीन अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोल दे। आज चीन व्यापार, निर्यात, ऊर्जा खपत, दुर्लभ खनिज और इलेक्ट्रानिक वाहनों के क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी है जबकि अमेरिका सैन्य खर्च, एआई, सेमीकंडक्टर और वैश्विक वित्त में अपना दबदबा बनाए हुए है। अपने विशाल बाजार के दम पर चीन को बढ़त हासिल है। कहा जाता है कि अमेरिका ने चीन को दबाने के लिए पहले वेनेजुएला में तख्ता पलट किया और फिर परमाणु हथियारों के मुद्दे पर ईरान को निशाना बनाया। इन दोनों ही देशों से चीन को सस्ता तेल मिलता था जो उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक था। चीन ने चुपचाप ईरान का समर्थन किया जिसके चलते अमेरिकी हवाई हमलों के बावजूद ट्रंप तेहरान को झुकने पर मजबूर करने में नाकामयाब रहे। ऐसे में ईरान की जमीन पर अमेरिकी सैनिक उतारने का खतरा मोल लेना आसान नहीं है। ईरान के साथ ज्यादा लंबा युद्ध उनके राजनीतिक हितों के भी खिलाफ हो सकता है। सीनेट भी उनके खिलाफ हो सकती है। इससे जाहिर है कि अमेरिका के लिए ईरान युद्ध पर चीन का समर्थन हासिल करना इस दौरे की उच्च प्राथमिकताओं में शामिल था। यही कारण है कि हमेशा आक्रामकता दिखाने वाले ट्रंप ने चीन दौरे के दौरान संयमित बयान दिए और खुद पर संयम बनाए रखा। उन्होंने कहा कि मैं अमेरिकी और चीनी लोगों के बीच समृद्ध और स्थायी संबंधों के लिए एक जाम उठाना चाहूंगा। यह एक बहुत ही खास रिश्ता है। यह बयान उस व्यक्ति की ओर से आया है जिसने चीन के साथ व्यापार युद्ध शुरू किया और उस पर टैरिफ लगाए लेकिन जब चीन ने जवाबी टैरिफ लगाए तो पीछे हट गया। ट्रंप अपने चीन दौरे को कामयाब बता सकते हैं लेकिन यदि चीन ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने में अमेरिका की मदद नहीं की तो यही कहा जाएगा कि चीन ने ट्रंप को खाली हाथ वापस भेज दिया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन दौरे में लगभग वही हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी। ट्रंप का चीन दौरा मुख्य रूप से गर्मजोशी, प्रतीकात्मकता और तनाव कम करने के प्रयासों के रूप में सामने आया जिसमें ठोस आर्थिक समझौतों की बजाए दो घंटे से अधिक की हाई लेबल बैठक प्रमुख रही। ट्रंप ने इस दौरे के दौरान दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को संभालने का प्रयास किया जिसमें चीन ने ताइवान जैसे मुद्दे पर एक ओर जहां अपना रुख पहले की तरह ही सख्त रखा तो वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने ईरान के मुद्दे पर कुछ रियायतें पाने की कोशिश की। बातचीत का पूरा ब्यौरा सामने आने पर ही पता चलेगा कि ईरान के मुद्दे पर अमेरिका को कुछ हासिल हुआ या इस मामले में चीन ने अमेरिका को खाली हाथ वापस भेज दिया है। चीन ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाते हुए एक ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है जिसकी गूंज ग्रेट हाल आफ द पीपुल से कहीं अधिक दूर तक सुनाई देगी। इस दौरे में चीन को अमेरिका के साथ बराबरी का दर्जा दिया गया है। इससे भू-राजनीति में चीन का कद बढ़ता हुआ दिखाई देता है। पिछले कुछ समय से अमेरिका पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव में उलझा हुआ है। इसका फायदा उठाते हुए चीन खुद को एक स्थिरता लाने वाली ताकत और वैश्विक कूटनीति के एक मुख्य स्तंभ के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है ताकि दुनिया को यह लगे कि वह वैश्विक संकटों को दूर करने में जरूरी हिस्सेदार है। ट्रंप के साथ चीन गया व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल दिखाता है कि अमेरिका के कारोबारी हित चीन के बाजार और निर्माण इकोसिस्टम से गहरे जुड़े हुए हैं। अमेरिका चाहता है कि चीन अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोल दे। आज चीन व्यापार, निर्यात, ऊर्जा खपत, दुर्लभ खनिज और इलेक्ट्रानिक वाहनों के क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी है जबकि अमेरिका सैन्य खर्च, एआई, सेमीकंडक्टर और वैश्विक वित्त में अपना दबदबा बनाए हुए है। अपने विशाल बाजार के दम पर चीन को बढ़त हासिल है। कहा जाता है कि अमेरिका ने चीन को दबाने के लिए पहले वेनेजुएला में तख्ता पलट किया और फिर परमाणु हथियारों के मुद्दे पर ईरान को निशाना बनाया। इन दोनों ही देशों से चीन को सस्ता तेल मिलता था जो उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में सहायक था। चीन ने चुपचाप ईरान का समर्थन किया जिसके चलते अमेरिकी हवाई हमलों के बावजूद ट्रंप तेहरान को झुकने पर मजबूर करने में नाकामयाब रहे। ऐसे में ईरान की जमीन पर अमेरिकी सैनिक उतारने का खतरा मोल लेना आसान नहीं है। ईरान के साथ ज्यादा लंबा युद्ध उनके राजनीतिक हितों के भी खिलाफ हो सकता है। सीनेट भी उनके खिलाफ हो सकती है। इससे जाहिर है कि अमेरिका के लिए ईरान युद्ध पर चीन का समर्थन हासिल करना इस दौरे की उच्च प्राथमिकताओं में शामिल था। यही कारण है कि हमेशा आक्रामकता दिखाने वाले ट्रंप ने चीन दौरे के दौरान संयमित बयान दिए और खुद पर संयम बनाए रखा। उन्होंने कहा कि मैं अमेरिकी और चीनी लोगों के बीच समृद्ध और स्थायी संबंधों के लिए एक जाम उठाना चाहूंगा। यह एक बहुत ही खास रिश्ता है। यह बयान उस व्यक्ति की ओर से आया है जिसने चीन के साथ व्यापार युद्ध शुरू किया और उस पर टैरिफ लगाए लेकिन जब चीन ने जवाबी टैरिफ लगाए तो पीछे हट गया। ट्रंप अपने चीन दौरे को कामयाब बता सकते हैं लेकिन यदि चीन ने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने में अमेरिका की मदद नहीं की तो यही कहा जाएगा कि चीन ने ट्रंप को खाली हाथ वापस भेज दिया है।