खाड़ी में चल रही जंग से सबक सीखने की आवश्यकता
प्रकाशित: 31-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग ने जहां पूरे विश्व को प्रभावित किया है वहीं इसका प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक पड़ा है, मजबूर होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देशवासियों से अपील करनी पड़ी की संकट की घड़ी में पेट्रोल डीजल आदि की खबर को कम करें और देशवासियों ने प्रधानमंत्री की अपील पर सहयोग भी किया है, यहां तक की डीजल पेट्रोल सीएनजी गैस सभी के दामों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है पर देश में बढ़ती हुई महंगाई से त्रस्त जनता इसको चुपचाप सहन कर रही है और देश में किसी भी कोने में असंतोष पनपने जैसी बातें नहीं उठ रही है वरना इस देश में चुनाव महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर लड़े जाते रहे है यहां तक की वर्ष 2009 के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने 100 दिन के अंदर महंगाई पर रोक लगाने के नारे पर दोबारा जनमत प्राप्त कर लिया था।
यहां तक की 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने गैस सिलेंडर की कीमतें 400 रुपये के पास हो जाने के विरोध में मतदाताओं के सामने सिलेंडर लेकर विरोध किया था जहां तक की बात का कार्यकर्ता आटे की कीमत 25 रुपये प्रति किलो होने पर 100 रुपये रिहाडी कमाने वाला मजदूर अपने बच्चों को खिलाएगा कैसे और उनकी शिक्षा और चिकित्सा के बारे में कैसे सोचेगा इन नारों के प्रभाव
यह कारण विश्व को आर्थिक मंदी के दौरान देश को सफलतापूर्वक निकलने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार को वर्ष 2014 के चुनाव में पराजय का मुंह देखना पड़ा था। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का करिश्माई ही कहा जाएगा कि आज सिलेंडर की कीमत 1000 रुपये के पार पहुंच गई है, पेट्रोल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गई है और बाजार में सभी आवश्यक खाद्यान्न की कीमत बढ़ाने के पश्चात भी सत्ता धारी भारतीय जनता पार्टी विधानसभा के चुनाव लगातार जीत रही है क्योंकि देश की जनता यह जानती है कि खाड़ी में चल रहे युद्ध के कारण पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार वृद्धि के कारण महंगाई पर नियंत्रण मुश्किल हो गया है।
दिल्ली जैसे महानगरों में उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर काम करने वाले मजदूर 5 किग्रा क्षमता वाला मिनी गैस सिलेंडर ना मिल पाने के कारण सब कुछ छोड़-छाड़ कर अपने गांव भागने के लिए मजबूर हो गए है। आज इन महानगरों में रिहाडी पर काम करने वाले मजदूर मिलने बंद हो गए हैं। जबकि दो दशक पूर्व तक इनकी रसोई के ईंधन के रूप में मिट्टी का तेल और कोयला प्रयोग होता था, पर अब पर्यावरण की सुरक्षा के नाम पर मिट्टी का तेल और कोयले का उपयोग बंद हो गया है और यह मजदूर पूरी तरह से 5 किग्रा क्षमता वाले मिनी सिलेंडर गैस सिलेंडर पर निर्भर हो गए और जब यह नहीं मिल पा रहा है तो इनका शहर से पलायन करना आवश्यक हो गया है इसके कारण महानगरों में चल रहे विकास और निर्माण कार्य ठप्प पड़ गए है।
28 फरवरी को ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने से पहले कच्चा तेल 60 -70 डॉलर. प्रति बैरल था। और अब यह 50ज्ञ् तक उछाल ले चुका है, सरकारी कंपनियों के लिए विदेशी कच्चे माल का औसत खरीद मूल्य फरवरी में 69 रुपए डॉलर था, मार्च में यह 117.09 डॉलर प्रति बैरल हो गया, अप्रैल में 114.48 प्रति बैरल रहने के बाद मैं में अब इसका औसत मूल्य 107.84 प्रति बैरल पर है इसकी की अंतरराष्ट्रीय कीमत 50ज्ञ् से ज्यादा बढ़ी है और एलपीजी का दाम दुगने से ज्यादा हो चुका है। सरकारी तेल कंपनियों ने 15 मई के बाद चार बार पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि करके इनके दाम 7.5 प्रति लीटर बढ़ाए है। दाम न बढ़ने से तेल कंपनियों को प्रतिदिन 1000 करोड रुपए का घाटा हो रहा था और सरकार के कथन अनुसार अगर हालात ऐसे ही रहे तो 3 महीने में सरकारी तेल कंपनियों का मुनाफा समाप्त हो जाएगा, जैसा हम सभी जानते हैं यह तेल कंपनियां अपने लाभ का कुछ हिस्सा सरकार को देती हैं जिस देश के विकास के काम होते हैं, ऐसे हालात में देश का विकास अवरोध हो जाएगा।
आखिर इस खाटे का बोझ तो आम जनता पर ही पड़ेगा। रुपया डालर के मुकाबले पहले से तेजी से गिर रहा है और विदेशी निवेशकों का विश्वास डगमगाने लगा है और हालात ही रहे तो देश में महंगाई और बढ़ेगी तथा आम लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि हर सामान की ढूलाई पर आने वाला खर्च पेट्रोल और डीजल की कीमतों की वृद्धि होने के कारण बढ़ेगा जिसके कारण जीवन की आवश्यक चीजों के दाम बढ़ेंगे और यह स्थिति काफी लंबे समय तक बने रहने की संभावना है क्योंकि विश्व की दो बड़ी शक्तियां अमेरिका और रूस की विदेशऔर आर्थिक नीति में तेल की भूमिका निर्णायक होती है ऐसे में भारत को तेल पर अति निर्भरता को छोड़कर अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी होगी। कृषि और अन्य उद्योगों पर मशीनों के अलावा पशुओं का उपयोग बढ़ाना होगा और पशुओं पर आधारित खेती पर ध्यान देना होगा जैसा कि हम आर्थिक सुधार युग से पूर्व करते आ रहे थे परंतु आज यहां तक की ग्रामीण भारत में भी हर छोटे-बड़े काम के लिए हम डीजल और पेट्रोल पर हो गए हैं और हमारी पशुओं पर आधारित अर्थव्यवस्था समाप्त हो गई है और अब पशु पालतू जानवरों को आय का स्रोत मानने के बजाय बोझ समझा जाने लगा है। खेतों में घूमते और फसलों को नष्ट करते आवारा जानवर इसका उदाहरण है।
आज हम जिस स्थिति से गुजर रहे हैं ऐसी स्थिति को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में द्वितीय सर संघ चालक पुज्य गुरु गोलवलकर ने बहुत पहले ही भाप लिया था और स्वावलंबन और आत्मा पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर करना चाहिए यानी अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें निर्यात से कमाई हुई विदेशी मुद्रा से उसे आयात करें इसका तात्पर्य है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए आत्मपूर्ति की अवस्था में अपने देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन भी हमें किसी प्रकार की कमी न हो। आज हम पाते हैं कि भारत खाद्य निर्भरता से हटकर फिर से आयात पर निर्भर हो गया है कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से काम उत्पादक और जर्जर हो गई है गुरु जी ने उसे समय चेतावनी दी थी कि हमें अपने आर्थिक नीति को खाद्य पदार्थों के उत्पादन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के लिए जैविक खेती वन ऊर्जा और सरकारी प्रयास के रूप में पर्यावरण के अनुकूल माध्यम से करनी चाहिए। पूज्य गुरु जी के बातों का समर्थन करते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्राr डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्वब राष्ट्रीय पुनरुत्थान में कहते हैं कि आज भी देश की 75ज्ञ् गांव में लोग बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधियां चला रहे हैं आधुनिकता की मजबूरियों के बाद जो ट्रैक्टर छोटों छोटी खेतों के लिए उपयुक्त नहीं है उसे इस्तेमाल कर रहे है।अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध भूमि 14 एकड़ के आसपास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ-साथ प्रदूषण बढ़ता है इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टीन ने सर सीवी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा था भारत के लोगों को बताएं अगर भी जीवित जीवित रहना चाहते हैं और दुनिया को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो वे ट्रैक्टर को भूल जाए और प्राचीन परंपराओं को अपनाए एवं जुताई बैलों से करें।
खाड़ी देशों में छिड़ी जंग के कारण भारत आज बड़ी विकट आर्थिक स्थिति में फंस गया है क्योंकि आर्थिक सुधार युग के बाद हमने पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता बहुत अधिक बढ़ा दी है, इसलिए हमारे पूर्वजों पंडित दीनदयाल उपाध्याय और गुरु गोलवलकर के बताए हुए रास्ते पर चलकर अपनी पारंपरिक खेती को अपनाते हुए डीजल और पेट्रोल पर निर्भरता कम करनी चाहिए।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)
ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग ने जहां पूरे विश्व को प्रभावित किया है वहीं इसका प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक पड़ा है, मजबूर होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देशवासियों से अपील करनी पड़ी की संकट की घड़ी में पेट्रोल डीजल आदि की खबर को कम करें और देशवासियों ने प्रधानमंत्री की अपील पर सहयोग भी किया है, यहां तक की डीजल पेट्रोल सीएनजी गैस सभी के दामों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है पर देश में बढ़ती हुई महंगाई से त्रस्त जनता इसको चुपचाप सहन कर रही है और देश में किसी भी कोने में असंतोष पनपने जैसी बातें नहीं उठ रही है वरना इस देश में चुनाव महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर लड़े जाते रहे है यहां तक की वर्ष 2009 के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने 100 दिन के अंदर महंगाई पर रोक लगाने के नारे पर दोबारा जनमत प्राप्त कर लिया था।
यहां तक की 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने गैस सिलेंडर की कीमतें 400 रुपये के पास हो जाने के विरोध में मतदाताओं के सामने सिलेंडर लेकर विरोध किया था जहां तक की बात का कार्यकर्ता आटे की कीमत 25 रुपये प्रति किलो होने पर 100 रुपये रिहाडी कमाने वाला मजदूर अपने बच्चों को खिलाएगा कैसे और उनकी शिक्षा और चिकित्सा के बारे में कैसे सोचेगा इन नारों के प्रभाव
यह कारण विश्व को आर्थिक मंदी के दौरान देश को सफलतापूर्वक निकलने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार को वर्ष 2014 के चुनाव में पराजय का मुंह देखना पड़ा था। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का करिश्माई ही कहा जाएगा कि आज सिलेंडर की कीमत 1000 रुपये के पार पहुंच गई है, पेट्रोल की कीमत 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गई है और बाजार में सभी आवश्यक खाद्यान्न की कीमत बढ़ाने के पश्चात भी सत्ता धारी भारतीय जनता पार्टी विधानसभा के चुनाव लगातार जीत रही है क्योंकि देश की जनता यह जानती है कि खाड़ी में चल रहे युद्ध के कारण पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार वृद्धि के कारण महंगाई पर नियंत्रण मुश्किल हो गया है।
दिल्ली जैसे महानगरों में उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर काम करने वाले मजदूर 5 किग्रा क्षमता वाला मिनी गैस सिलेंडर ना मिल पाने के कारण सब कुछ छोड़-छाड़ कर अपने गांव भागने के लिए मजबूर हो गए है। आज इन महानगरों में रिहाडी पर काम करने वाले मजदूर मिलने बंद हो गए हैं। जबकि दो दशक पूर्व तक इनकी रसोई के ईंधन के रूप में मिट्टी का तेल और कोयला प्रयोग होता था, पर अब पर्यावरण की सुरक्षा के नाम पर मिट्टी का तेल और कोयले का उपयोग बंद हो गया है और यह मजदूर पूरी तरह से 5 किग्रा क्षमता वाले मिनी सिलेंडर गैस सिलेंडर पर निर्भर हो गए और जब यह नहीं मिल पा रहा है तो इनका शहर से पलायन करना आवश्यक हो गया है इसके कारण महानगरों में चल रहे विकास और निर्माण कार्य ठप्प पड़ गए है।
28 फरवरी को ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध शुरू होने से पहले कच्चा तेल 60 -70 डॉलर. प्रति बैरल था। और अब यह 50ज्ञ् तक उछाल ले चुका है, सरकारी कंपनियों के लिए विदेशी कच्चे माल का औसत खरीद मूल्य फरवरी में 69 रुपए डॉलर था, मार्च में यह 117.09 डॉलर प्रति बैरल हो गया, अप्रैल में 114.48 प्रति बैरल रहने के बाद मैं में अब इसका औसत मूल्य 107.84 प्रति बैरल पर है इसकी की अंतरराष्ट्रीय कीमत 50ज्ञ् से ज्यादा बढ़ी है और एलपीजी का दाम दुगने से ज्यादा हो चुका है। सरकारी तेल कंपनियों ने 15 मई के बाद चार बार पेट्रोल और डीजल के दामों में वृद्धि करके इनके दाम 7.5 प्रति लीटर बढ़ाए है। दाम न बढ़ने से तेल कंपनियों को प्रतिदिन 1000 करोड रुपए का घाटा हो रहा था और सरकार के कथन अनुसार अगर हालात ऐसे ही रहे तो 3 महीने में सरकारी तेल कंपनियों का मुनाफा समाप्त हो जाएगा, जैसा हम सभी जानते हैं यह तेल कंपनियां अपने लाभ का कुछ हिस्सा सरकार को देती हैं जिस देश के विकास के काम होते हैं, ऐसे हालात में देश का विकास अवरोध हो जाएगा।
आखिर इस खाटे का बोझ तो आम जनता पर ही पड़ेगा। रुपया डालर के मुकाबले पहले से तेजी से गिर रहा है और विदेशी निवेशकों का विश्वास डगमगाने लगा है और हालात ही रहे तो देश में महंगाई और बढ़ेगी तथा आम लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि हर सामान की ढूलाई पर आने वाला खर्च पेट्रोल और डीजल की कीमतों की वृद्धि होने के कारण बढ़ेगा जिसके कारण जीवन की आवश्यक चीजों के दाम बढ़ेंगे और यह स्थिति काफी लंबे समय तक बने रहने की संभावना है क्योंकि विश्व की दो बड़ी शक्तियां अमेरिका और रूस की विदेशऔर आर्थिक नीति में तेल की भूमिका निर्णायक होती है ऐसे में भारत को तेल पर अति निर्भरता को छोड़कर अपने परंपरागत ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी होगी। कृषि और अन्य उद्योगों पर मशीनों के अलावा पशुओं का उपयोग बढ़ाना होगा और पशुओं पर आधारित खेती पर ध्यान देना होगा जैसा कि हम आर्थिक सुधार युग से पूर्व करते आ रहे थे परंतु आज यहां तक की ग्रामीण भारत में भी हर छोटे-बड़े काम के लिए हम डीजल और पेट्रोल पर हो गए हैं और हमारी पशुओं पर आधारित अर्थव्यवस्था समाप्त हो गई है और अब पशु पालतू जानवरों को आय का स्रोत मानने के बजाय बोझ समझा जाने लगा है। खेतों में घूमते और फसलों को नष्ट करते आवारा जानवर इसका उदाहरण है।
आज हम जिस स्थिति से गुजर रहे हैं ऐसी स्थिति को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में द्वितीय सर संघ चालक पुज्य गुरु गोलवलकर ने बहुत पहले ही भाप लिया था और स्वावलंबन और आत्मा पूर्ति के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि हमें स्वयं के संसाधनों पर निर्भर करना चाहिए यानी अगर किसी वस्तु की कमी है तो हमें निर्यात से कमाई हुई विदेशी मुद्रा से उसे आयात करें इसका तात्पर्य है कि हमें अपने संसाधनों पर निर्भर रहना चाहिए आत्मपूर्ति की अवस्था में अपने देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन भी हमें किसी प्रकार की कमी न हो। आज हम पाते हैं कि भारत खाद्य निर्भरता से हटकर फिर से आयात पर निर्भर हो गया है कृषि भूमि रसायन और विदेशी बीजों के प्रयोग से काम उत्पादक और जर्जर हो गई है गुरु जी ने उसे समय चेतावनी दी थी कि हमें अपने आर्थिक नीति को खाद्य पदार्थों के उत्पादन के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के लिए जैविक खेती वन ऊर्जा और सरकारी प्रयास के रूप में पर्यावरण के अनुकूल माध्यम से करनी चाहिए। पूज्य गुरु जी के बातों का समर्थन करते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्राr डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अपनी पुस्तक हिंदुत्वब राष्ट्रीय पुनरुत्थान में कहते हैं कि आज भी देश की 75ज्ञ् गांव में लोग बैलों से अपनी आर्थिक गतिविधियां चला रहे हैं आधुनिकता की मजबूरियों के बाद जो ट्रैक्टर छोटों छोटी खेतों के लिए उपयुक्त नहीं है उसे इस्तेमाल कर रहे है।अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध भूमि 14 एकड़ के आसपास है जो भारत में मात्र 0.70 एकड़ है ट्रैक्टर डीजल की खपत के साथ-साथ प्रदूषण बढ़ता है इसीलिए अल्बर्ट आइंस्टीन ने सर सीवी रमन को एक पत्र के माध्यम से कहा था भारत के लोगों को बताएं अगर भी जीवित जीवित रहना चाहते हैं और दुनिया को जीवित रहने का मार्ग दिखाना चाहते हैं तो वे ट्रैक्टर को भूल जाए और प्राचीन परंपराओं को अपनाए एवं जुताई बैलों से करें।
खाड़ी देशों में छिड़ी जंग के कारण भारत आज बड़ी विकट आर्थिक स्थिति में फंस गया है क्योंकि आर्थिक सुधार युग के बाद हमने पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता बहुत अधिक बढ़ा दी है, इसलिए हमारे पूर्वजों पंडित दीनदयाल उपाध्याय और गुरु गोलवलकर के बताए हुए रास्ते पर चलकर अपनी पारंपरिक खेती को अपनाते हुए डीजल और पेट्रोल पर निर्भरता कम करनी चाहिए।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)