घातक है कर्ज में डूबी सरकारों का सत्तामंत्र
प्रकाशित: 31-08-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. रवीन्द्र अरजरिया
लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवा के लिए होती है, जनता को अपने राजनीतिक अस्तित्व की कीमत पर खरीदने के लिए नहीं। देश की चुनावी राजनीति के कारण जनकल्याण और मुफ्तखोरी के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। हाल ही में संपन्न हुए रक्षाबंधन पर्व के भावनात्मक और सांस्कृतिक पर्व पर चुनावी धरातल तैयार करने की होड देखने को मिली। महिलाओं के खातों में रकम डालने, मुफ्त बस यात्रा कराने और नई आर्थिक घोषणाओं की बाढ़ सी आ गई। महिलाओं के सम्मान की आड़ में सरकारी खजानों को मतपेटी तक पहुंचने का साधन बनाया जाने लगा है। मध्य प्रदेश में लाड़ली बहिना योजना के तहत सामान्य 1500 रुपये की मासिक किस्त के अतिरिक्त 250 रुपये का शगुन देकर उन्हें 1750 रुपये दिए गए। बिहार में 5 लाख जीविका दीदियों के खातों में 600 करोड़ रुपये अंतरित किए गए और 10 हजार महिलाओं को 50 करोड़ रुपये का ऋण देने की घोषणा हुई। ओडिशा में सुभद्रा योजना के तहत पात्र महिलाओं को 10 हजार रुपये वार्षिक की सहायता दी जा रही है, जिसकी 5 हजार रुपये की किस्त रक्षाबंधन के अवसर पर जारी की गई। झारखंड में महिलाओं को 2500 रुपये की किस्त दी गई। पंजाब में 1 लाख 37 हजार सत्कार सखियों को 52 करोड 20 लाख रुपये की सम्मान राशि हस्तांतरित की गई। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश मों महिलाओं के लिए विशेष मुफ्त बस यात्रा की घोषणाएं हुईं। राजस्थान में महिलाओं को 48 घंटे तक रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई। यह सत्य है कि संविधान का अनुच्छेद 38 के द्वारा राज्य को ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश दिया गया है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को प्रेरित किया जा सके। अनुच्छेद 39 में आर्थिक संसाधनों के समान वितरण और आर्थिक विषमता कम करने की दिशा दिखाई गई है। अनुच्छेद 41 द्वरा काम, शिक्षा और आवश्यकता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता की बात की गई है तथा अनुच्छेद 47 द्वारा पोषण स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य को राज्य का प्राथमिक दायित्व मानता गया है लेकिन संविधान सरकार को यह अधिकार नहीं देता कि वह वित्तीय विवेक को ताक पर रखकर हर चुनाव से पहले सरकारी खजाना खोल दे। आज नागरिकों को मुफ्तखोरी की आदत डाली जा रही है। स्थायी रूप से सरकारी सहायता पर निर्भर बनाया जा रहा है। सहायता को अधिकार की श्रेणी में पहुंचाया जा रहा है। नागरिकों को दी जाने वाली नकद सहायता का कोई स्पष्ट सामाजिक - आर्थिक लक्ष्य निर्धारित न होने के कारण इसे चुनावी काल का मतदाता प्रलोभन कहना अतिशयोक्ति न होगा। वास्तविकता तो यह है कि राज्य सरकारें आज स्वयं भारी कर्ज के नीचे दबी हुई हैं। पीआरएस के अनुसार मार्च 2025 तक राज्यों की कुल बकाया देनदारी लगभग 27.5 प्रतिशत जीडीपी के बराबर थी, जो एफआरबीएम समीक्षा समिति द्वारा सुझाए गए 20 प्रतिशत के स्तर से काफी अधिक है। केवल गुजरात, महाराष्ट्र और ओडिशा राज्य ही इस अनुशंसित ऋण स्तर की सीमा में पाये गये थे। अन्य राज्यों की कई सरकारें पहले ही अपनी आने वाली पीढ़ियों की आय का एक हिस्सा आज खर्च कर चुकी हैं। ऐसे में राज्यों के कर्ज को भी आंकड़ों के साथ रेखांकित करना आवश्यक है। सन् 2023-24 में राज्यों ने सामूहिक रूप से अपनी राजस्व आय का 62 प्रतिशत वेतन, पेंशन, ब्याज और सब्सिडी पर खर्च किया था। केवल सब्सिडी पर 24 राज्यों का खर्च 3.18 लाख करोड़ रुपये था, जो औसतन राजस्व आय का लगभग 9 प्रतिशत था। पंजाब में यह अनुपात 21 प्रतिशत, तमिलनाडु में 14 प्रतिशत, राजस्थान में 14 प्रतिशत तथा कर्नाटक में भी 14 प्रतिशत रहा। महिलाओं के लिए बिना शर्त नकद हस्तांतरण की राजनैतिक प्रतिस्पर्धायें चल रहीं है। सन् 2025-26 में 12 राज्य ऐसी योजनाएं चला रहे थे जिन पर अनुमानित सामूहिक खर्च 1.68 लाख करोड़ रुपये था। प्रश्न यह कि क्या महिलाओं को दी जाने वाली इस धनराशि से वे अपने स्थाई आर्थिक स्रोत पैदा कर रहीं है या फिर मुफ्त की थौली पर अहंकार का आवरण चढ़ा रहीं है। सरकारों की यह भेड़चाल नागरिकों के गले का फंदा बनती जा रही है। सरकारें कर्ज लेकर आज खाते में पैसा डाल रहीं है, मुफ्त यात्रा करवा रहीं है, बिना मेहनत के राशन की बोरियां - सामान भिजवा रहीं है, बिजली - पानी पर सब्सिडी दे रहीं है लेकिन कल उसी कर्ज का ब्याज ईमानदार करदाताओं की चमडी उधेड कर वसूला जायेगा। ब्याज बढ़ता है तो पूंजीगत व्यय के लिए पैसा कम होता है। सड़क, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल, रोजगार और उद्योग पर खर्च घटता है। फिर विकास की कमी को दूर करने के लिए नई योजनाओं की घोषणा होती है और उन्हें वित्त पोषित करने के लिए फिर नया कर्ज लिया जाता है। यही वह चक्रव्यूह है जिसमें देश फंसता जा रहा है। कथित योजनाओं के कथित पात्रों को अपने बैंक खातों में सरकारी पैसा आने की प्रतीक्षा रहती है। यहां बुन्देलखण्ड की यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है कि अल्लाह दे खाने को, तो कुतका जाये कमाने को। देश के नागरिकों को निकम्मा, कामचोर और आलसी बनाने की यह खेल अब गले की हड्डी बनाता जा रहा है। जीवकोपार्जन की चिन्ता छोड़कर लोग राजनैतिक आन्दोलनों का झंडा उठाने, आतंक का परचम फहराने और अपराधों का ग्राफ बढ़ाने में लगे हैं। ऐसे लोगों को ही डीप स्टेट के द्वारा जेन जी नाम देकर देश में अशान्ति का ठेका दिया जा रहा है। ऐसे में आम आवाम को यह जानने का पूरा हक है कि प्रत्येक राज्य अपने बजट में यह बताए कि प्रत्येक मुफ्त योजना की दस वर्ष की कुल लागत कितनी होगी, उसका वित्तीय स्रोत क्या है और उसके कारण पूंजीगत निवेश पर कितना प्रभाव पड़ेगा। राजनीतिक दलों को भी अपने घोषणा-पत्रों के साथ राजकोषीय उत्तरदायित्व पत्र भी जारी करना चाहिये ताकि उससे दलों के विवेक, दूरदर्शिता और योग्यता की बानगी मिल सके। हकीकत तो यह है कि सत्ता पाने के लिए उधार लेकर घी पीने - पिलाने का यह सत्तामंत्र जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसका आर्थिक अंत उतना ही भयावह है।
लोकतंत्र में सरकार जनता की सेवा के लिए होती है, जनता को अपने राजनीतिक अस्तित्व की कीमत पर खरीदने के लिए नहीं। देश की चुनावी राजनीति के कारण जनकल्याण और मुफ्तखोरी के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। हाल ही में संपन्न हुए रक्षाबंधन पर्व के भावनात्मक और सांस्कृतिक पर्व पर चुनावी धरातल तैयार करने की होड देखने को मिली। महिलाओं के खातों में रकम डालने, मुफ्त बस यात्रा कराने और नई आर्थिक घोषणाओं की बाढ़ सी आ गई। महिलाओं के सम्मान की आड़ में सरकारी खजानों को मतपेटी तक पहुंचने का साधन बनाया जाने लगा है। मध्य प्रदेश में लाड़ली बहिना योजना के तहत सामान्य 1500 रुपये की मासिक किस्त के अतिरिक्त 250 रुपये का शगुन देकर उन्हें 1750 रुपये दिए गए। बिहार में 5 लाख जीविका दीदियों के खातों में 600 करोड़ रुपये अंतरित किए गए और 10 हजार महिलाओं को 50 करोड़ रुपये का ऋण देने की घोषणा हुई। ओडिशा में सुभद्रा योजना के तहत पात्र महिलाओं को 10 हजार रुपये वार्षिक की सहायता दी जा रही है, जिसकी 5 हजार रुपये की किस्त रक्षाबंधन के अवसर पर जारी की गई। झारखंड में महिलाओं को 2500 रुपये की किस्त दी गई। पंजाब में 1 लाख 37 हजार सत्कार सखियों को 52 करोड 20 लाख रुपये की सम्मान राशि हस्तांतरित की गई। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश मों महिलाओं के लिए विशेष मुफ्त बस यात्रा की घोषणाएं हुईं। राजस्थान में महिलाओं को 48 घंटे तक रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गई। यह सत्य है कि संविधान का अनुच्छेद 38 के द्वारा राज्य को ऐसी सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने का निर्देश दिया गया है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को प्रेरित किया जा सके। अनुच्छेद 39 में आर्थिक संसाधनों के समान वितरण और आर्थिक विषमता कम करने की दिशा दिखाई गई है। अनुच्छेद 41 द्वरा काम, शिक्षा और आवश्यकता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता की बात की गई है तथा अनुच्छेद 47 द्वारा पोषण स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य को राज्य का प्राथमिक दायित्व मानता गया है लेकिन संविधान सरकार को यह अधिकार नहीं देता कि वह वित्तीय विवेक को ताक पर रखकर हर चुनाव से पहले सरकारी खजाना खोल दे। आज नागरिकों को मुफ्तखोरी की आदत डाली जा रही है। स्थायी रूप से सरकारी सहायता पर निर्भर बनाया जा रहा है। सहायता को अधिकार की श्रेणी में पहुंचाया जा रहा है। नागरिकों को दी जाने वाली नकद सहायता का कोई स्पष्ट सामाजिक - आर्थिक लक्ष्य निर्धारित न होने के कारण इसे चुनावी काल का मतदाता प्रलोभन कहना अतिशयोक्ति न होगा। वास्तविकता तो यह है कि राज्य सरकारें आज स्वयं भारी कर्ज के नीचे दबी हुई हैं। पीआरएस के अनुसार मार्च 2025 तक राज्यों की कुल बकाया देनदारी लगभग 27.5 प्रतिशत जीडीपी के बराबर थी, जो एफआरबीएम समीक्षा समिति द्वारा सुझाए गए 20 प्रतिशत के स्तर से काफी अधिक है। केवल गुजरात, महाराष्ट्र और ओडिशा राज्य ही इस अनुशंसित ऋण स्तर की सीमा में पाये गये थे। अन्य राज्यों की कई सरकारें पहले ही अपनी आने वाली पीढ़ियों की आय का एक हिस्सा आज खर्च कर चुकी हैं। ऐसे में राज्यों के कर्ज को भी आंकड़ों के साथ रेखांकित करना आवश्यक है। सन् 2023-24 में राज्यों ने सामूहिक रूप से अपनी राजस्व आय का 62 प्रतिशत वेतन, पेंशन, ब्याज और सब्सिडी पर खर्च किया था। केवल सब्सिडी पर 24 राज्यों का खर्च 3.18 लाख करोड़ रुपये था, जो औसतन राजस्व आय का लगभग 9 प्रतिशत था। पंजाब में यह अनुपात 21 प्रतिशत, तमिलनाडु में 14 प्रतिशत, राजस्थान में 14 प्रतिशत तथा कर्नाटक में भी 14 प्रतिशत रहा। महिलाओं के लिए बिना शर्त नकद हस्तांतरण की राजनैतिक प्रतिस्पर्धायें चल रहीं है। सन् 2025-26 में 12 राज्य ऐसी योजनाएं चला रहे थे जिन पर अनुमानित सामूहिक खर्च 1.68 लाख करोड़ रुपये था। प्रश्न यह कि क्या महिलाओं को दी जाने वाली इस धनराशि से वे अपने स्थाई आर्थिक स्रोत पैदा कर रहीं है या फिर मुफ्त की थौली पर अहंकार का आवरण चढ़ा रहीं है। सरकारों की यह भेड़चाल नागरिकों के गले का फंदा बनती जा रही है। सरकारें कर्ज लेकर आज खाते में पैसा डाल रहीं है, मुफ्त यात्रा करवा रहीं है, बिना मेहनत के राशन की बोरियां - सामान भिजवा रहीं है, बिजली - पानी पर सब्सिडी दे रहीं है लेकिन कल उसी कर्ज का ब्याज ईमानदार करदाताओं की चमडी उधेड कर वसूला जायेगा। ब्याज बढ़ता है तो पूंजीगत व्यय के लिए पैसा कम होता है। सड़क, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल, रोजगार और उद्योग पर खर्च घटता है। फिर विकास की कमी को दूर करने के लिए नई योजनाओं की घोषणा होती है और उन्हें वित्त पोषित करने के लिए फिर नया कर्ज लिया जाता है। यही वह चक्रव्यूह है जिसमें देश फंसता जा रहा है। कथित योजनाओं के कथित पात्रों को अपने बैंक खातों में सरकारी पैसा आने की प्रतीक्षा रहती है। यहां बुन्देलखण्ड की यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है कि अल्लाह दे खाने को, तो कुतका जाये कमाने को। देश के नागरिकों को निकम्मा, कामचोर और आलसी बनाने की यह खेल अब गले की हड्डी बनाता जा रहा है। जीवकोपार्जन की चिन्ता छोड़कर लोग राजनैतिक आन्दोलनों का झंडा उठाने, आतंक का परचम फहराने और अपराधों का ग्राफ बढ़ाने में लगे हैं। ऐसे लोगों को ही डीप स्टेट के द्वारा जेन जी नाम देकर देश में अशान्ति का ठेका दिया जा रहा है। ऐसे में आम आवाम को यह जानने का पूरा हक है कि प्रत्येक राज्य अपने बजट में यह बताए कि प्रत्येक मुफ्त योजना की दस वर्ष की कुल लागत कितनी होगी, उसका वित्तीय स्रोत क्या है और उसके कारण पूंजीगत निवेश पर कितना प्रभाव पड़ेगा। राजनीतिक दलों को भी अपने घोषणा-पत्रों के साथ राजकोषीय उत्तरदायित्व पत्र भी जारी करना चाहिये ताकि उससे दलों के विवेक, दूरदर्शिता और योग्यता की बानगी मिल सके। हकीकत तो यह है कि सत्ता पाने के लिए उधार लेकर घी पीने - पिलाने का यह सत्तामंत्र जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसका आर्थिक अंत उतना ही भयावह है।