कर्माभूमि के प्रति वफादार रहो, मानवता एक है-न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का आह्वान
प्रकाशित: 31-08-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने प्रवासी भारतीयों को स्पष्ट संदेश दिया कि निष्ठा उस भूमि के प्रति हो जहां वे रहते और कमाते हैं, और दृष्टि समूची मानवता की हो। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन' में उन्होंने कहा, “हम अमेरिका में हैं, हम अमेरिका में रहते हैं और हम अमेरिका में कमाते हैं। इसलिए हम अमेरिकी हैं। हमें अमेरिका के प्रति सच्चा व्यवहार करना चाहिए। भारतीय प्रवासियों का कर्तव्य अपनी कर्माभूमि के प्रति है। उन्हें उसे पूरा करना चाहिए। उन्हें अपनी कर्माभूमि के प्रति वफादार रहना चाहिए।''
भागवत ने जन्मभूमि और कर्माभूमि का अंतर साफ किया। भारत प्रवासियों की जन्मभूमि है। यदि उनमें भारत के लिए कुछ करने की इच्छा है तो कर्माभूमि का कर्तव्य निभाने के बाद वह संभव है, निषिद्ध नहीं। भारत उनसे यह अपेक्षा नहीं करता कि वे भारत के लिए काम करें। अपेक्षा यह है कि वे उसी जीवन-दृष्टि से जिएं जो भारत ने दी है।
मानवता की बेहतरी पर उनका स्वर और व्यापक था। स्वामी विवेकानंद का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी नियति होती है। भारत की नियति विविधता में एकता को स्वयं साकार करना और समय-समय पर विश्व को यह सत्य समझाना है। हम एक हैं; विविधता उस एकता का अलंकार है, उसे मनाना चाहिए। अमेरिका की चर्चा में बहुलवाद आता है, भारत की चर्चा में विविधता में एकता। भारतीयों के लिए दोनों उनके डीएनए में हैं। विविधता प्रकृति का नियम है, एकता उसके पीछे का सत्य। जैसे व्यक्ति अपनी पहचान की रक्षा करता है, वैसे ही दूसरों की पहचान की भी रक्षा करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है, केवल वर्णन करने वाले के अनुसार उसके रूप भिन्न होते हैं। मनुष्य उस सोच का बंदी है जो उसके मस्तिष्क में बैठा दी गई है। उन्होंने दोहराया, “यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। हिंदू कहलाने के लिए यह मानना आवश्यक है कि सभी मार्ग एक ही ईश्वर की ओर जाते हैं और हर मनुष्य की गरिमा समान है।'' मनुष्य माला के मनके हैं; आत्मा वह धागा है जो सबको जोड़ता है और स्थायी सुख का स्रोत है।
भौतिक सुख को उन्होंने अस्थायी बताया। न्यूयॉर्क के डोनट का उदाहरण देकर कहा कि एक बैठक में कितने भी खा लो, अंत में वही वस्तु अरुचिकर लगने लगती है, फिर भी अगले दिन फिर इच्छा जागती है। इसलिए कितना कमाया, यह महत्वपूर्ण नहीं; कितना बांटा, यह महत्वपूर्ण है। करियर केवल धन या भौतिक सुख नहीं। व्यक्ति, समाज और पर्यावरण साथ-साथ आगे बढ़ें। समाज की प्रगति व्यक्ति को दबाकर नहीं होती।
एक सरल परीक्षा उन्होंने रखी-भूखे व्यक्ति की निगाहें अपनी थाली पर टिकी हों तो बिना उसे दिया खा पाना मनुष्य के लिए कठिन है, क्योंकि हम मनुष्य हैं। सही दिशा में सोचो तो ईश्वर के निकट पहुंचते हो, गलत दिशा में पशुता के। पर्यावरण के प्रति कर्तव्य भी उन्होंने याद दिलाया। भारत में पौधों की पूजा इसलिए होती है कि हम कर्तव्य को स्मरण रखें, जैसे मदर्स डे या फादर्स डे पर परिवार के प्रति।
राजनीति को उन्होंने स्वार्थ का खेल बताया। जहां ‘मैं और मेरा' है, वहां समाधान नहीं निकलता, ‘हम और हमारा' ही मार्ग है। युद्ध रोकने और नीति को प्रभावित करने की इच्छा हो सकती है, पर शुरुआत समाज से करनी होगी-संवाद और सेवा से। उन्होंने पंच परिवर्तन का संकल्प दोहराया: अब तक जो हुआ सो हुआ; अब एक छोटा कदम एक समय में उठाओ, पहले स्वयं जियो, फिर समाज तक ले जाओ। न्यूयॉर्क के इस मंच से भागवत का संदेश एक ही सूत्र में बंधता है-निष्ठा कर्माभूमि की, दृष्टि मानवता की, जीवन बांटने और एकता को सजाने का।
-आदित्य नरेन्द्र
भागवत ने जन्मभूमि और कर्माभूमि का अंतर साफ किया। भारत प्रवासियों की जन्मभूमि है। यदि उनमें भारत के लिए कुछ करने की इच्छा है तो कर्माभूमि का कर्तव्य निभाने के बाद वह संभव है, निषिद्ध नहीं। भारत उनसे यह अपेक्षा नहीं करता कि वे भारत के लिए काम करें। अपेक्षा यह है कि वे उसी जीवन-दृष्टि से जिएं जो भारत ने दी है।
मानवता की बेहतरी पर उनका स्वर और व्यापक था। स्वामी विवेकानंद का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी नियति होती है। भारत की नियति विविधता में एकता को स्वयं साकार करना और समय-समय पर विश्व को यह सत्य समझाना है। हम एक हैं; विविधता उस एकता का अलंकार है, उसे मनाना चाहिए। अमेरिका की चर्चा में बहुलवाद आता है, भारत की चर्चा में विविधता में एकता। भारतीयों के लिए दोनों उनके डीएनए में हैं। विविधता प्रकृति का नियम है, एकता उसके पीछे का सत्य। जैसे व्यक्ति अपनी पहचान की रक्षा करता है, वैसे ही दूसरों की पहचान की भी रक्षा करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है, केवल वर्णन करने वाले के अनुसार उसके रूप भिन्न होते हैं। मनुष्य उस सोच का बंदी है जो उसके मस्तिष्क में बैठा दी गई है। उन्होंने दोहराया, “यदि कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह सकता। हिंदू कहलाने के लिए यह मानना आवश्यक है कि सभी मार्ग एक ही ईश्वर की ओर जाते हैं और हर मनुष्य की गरिमा समान है।'' मनुष्य माला के मनके हैं; आत्मा वह धागा है जो सबको जोड़ता है और स्थायी सुख का स्रोत है।
भौतिक सुख को उन्होंने अस्थायी बताया। न्यूयॉर्क के डोनट का उदाहरण देकर कहा कि एक बैठक में कितने भी खा लो, अंत में वही वस्तु अरुचिकर लगने लगती है, फिर भी अगले दिन फिर इच्छा जागती है। इसलिए कितना कमाया, यह महत्वपूर्ण नहीं; कितना बांटा, यह महत्वपूर्ण है। करियर केवल धन या भौतिक सुख नहीं। व्यक्ति, समाज और पर्यावरण साथ-साथ आगे बढ़ें। समाज की प्रगति व्यक्ति को दबाकर नहीं होती।
एक सरल परीक्षा उन्होंने रखी-भूखे व्यक्ति की निगाहें अपनी थाली पर टिकी हों तो बिना उसे दिया खा पाना मनुष्य के लिए कठिन है, क्योंकि हम मनुष्य हैं। सही दिशा में सोचो तो ईश्वर के निकट पहुंचते हो, गलत दिशा में पशुता के। पर्यावरण के प्रति कर्तव्य भी उन्होंने याद दिलाया। भारत में पौधों की पूजा इसलिए होती है कि हम कर्तव्य को स्मरण रखें, जैसे मदर्स डे या फादर्स डे पर परिवार के प्रति।
राजनीति को उन्होंने स्वार्थ का खेल बताया। जहां ‘मैं और मेरा' है, वहां समाधान नहीं निकलता, ‘हम और हमारा' ही मार्ग है। युद्ध रोकने और नीति को प्रभावित करने की इच्छा हो सकती है, पर शुरुआत समाज से करनी होगी-संवाद और सेवा से। उन्होंने पंच परिवर्तन का संकल्प दोहराया: अब तक जो हुआ सो हुआ; अब एक छोटा कदम एक समय में उठाओ, पहले स्वयं जियो, फिर समाज तक ले जाओ। न्यूयॉर्क के इस मंच से भागवत का संदेश एक ही सूत्र में बंधता है-निष्ठा कर्माभूमि की, दृष्टि मानवता की, जीवन बांटने और एकता को सजाने का।
-आदित्य नरेन्द्र