ड्रग्स के दलदल में धंसती युवा पीढ़ी
प्रकाशित: 26-06-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
योगेश कुमार गोयल
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के सपनों, ऊर्जा और सृजनशीलता पर निर्भर करता है लेकिन जब यही युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आने लगे तो यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह जाती बल्कि राष्ट्रीय संकट का रूप धारण कर लेती है। आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के सामने यही चुनौती खड़ी है। युवाओं की प्रतिभा, उनकी सोच, उनकी रचनात्मकता और उनके भविष्य पर नशे का ऐसा ग्रहण लग रहा है, जो न केवल परिवारों को बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को भीतर से खोखला कर रहा है। इसी गंभीर चुनौती के प्रति वैश्विक जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 26 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय नशा एवं मादक पदार्थ निषेध दिवस' मनाया जाता है। यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं बल्कि पूरी मानवता को चेताने का अवसर है कि यदि नशे के बढ़ते दुष्चक्र को समय रहते नहीं रोका गया तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतने पड़ेंगे।
भारत में नशे की समस्या अब महानगरों तक सीमित नहीं रही। यह गांवों, कस्बों, छोटे शहरों और यहां तक कि स्कूलों तथा कॉलेजों तक पहुंच चुकी है। कभी माना जाता था कि नशीले पदार्थों का सेवन केवल संपन्न वर्ग या शहरी संस्कृति की समस्या है लेकिन आज वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयावह है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अफीम, चरस, गांजा, हेरोइन, सिंथेटिक ड्रग्स और इंजेक्शन के माध्यम से लिए जाने वाले नशीले पदार्थों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। यह स्थिति बताती है कि नशे का नेटवर्क अब समाज की हर परत तक पहुंच चुका है। आज का युवा अनेक प्रकार के दबावों से घिरा हुआ है। प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, सामाजिक अपेक्षाएं, पारिवारिक तनाव, मानसिक अवसाद, अकेलापन और त्वरित सफलता की चाह उसे भीतर से कमजोर बना रही है। ऐसे में नशे के सौदागर युवाओं की इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। कई बार मित्रों का दबाव, आधुनिक दिखने की चाह, रोमांच की तलाश या क्षणिक सुख का आकर्षण युवाओं को नशे की ओर धकेल देता है। शुरुआत अक्सर जिज्ञासा से होती है लेकिन धीरे-धीरे यही जिज्ञासा लत और फिर विनाश का कारण बन जाती है। इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने जहां ज्ञान के नए द्वार खोले हैं, वहीं नशे के कारोबार को भी नए साधन उपलब्ध कराए हैं। सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स और डार्क वेब के माध्यम से मादक पदार्थों की खरीद-फरोख्त पहले से कहीं अधिक आसान हो गई है। अब नशे का सौदा किसी सुनसान गली तक सीमित नहीं बल्कि स्मार्टफोन की स्क्रीन तक पहुंच चुका है। यही कारण है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नशे की पहुंच चिंताजनक रूप से बढ़ती जा रही है। आज देश के अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में नशीले पदार्थों की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। यह विडंबना ही है कि जिन परिसरों में देश के भविष्य का निर्माण होना चाहिए, वहां कुछ युवा अपने भविष्य को स्वयं नष्ट करने की राह पर बढ़ रहे हैं। आधुनिकता और स्वतंत्रता की गलत व्याख्या ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। कई युवाओं को यह भ्रम होता है कि नशा उन्हें अधिक आत्मविश्वासी, रचनात्मक और आधुनिक बनाता है, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। नशा व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। उसकी निर्णय लेने की शक्ति कमजोर हो जाती है, स्मरणशक्ति प्रभावित होती है, एकाग्रता घटती है और मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। जो युवा अपने जीवन में बड़े सपने लेकर आगे बढ़ता है, वही नशे की गिरफ्त में आकर अपनी प्रतिभा और संभावनाओं को स्वयं नष्ट कर देता है। यही कारण है कि नशे को केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि मानव संसाधन के विनाश की समस्या माना जाता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के सपनों, ऊर्जा और सृजनशीलता पर निर्भर करता है लेकिन जब यही युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आने लगे तो यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह जाती बल्कि राष्ट्रीय संकट का रूप धारण कर लेती है। आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के सामने यही चुनौती खड़ी है। युवाओं की प्रतिभा, उनकी सोच, उनकी रचनात्मकता और उनके भविष्य पर नशे का ऐसा ग्रहण लग रहा है, जो न केवल परिवारों को बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को भीतर से खोखला कर रहा है। इसी गंभीर चुनौती के प्रति वैश्विक जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 26 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय नशा एवं मादक पदार्थ निषेध दिवस' मनाया जाता है। यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं बल्कि पूरी मानवता को चेताने का अवसर है कि यदि नशे के बढ़ते दुष्चक्र को समय रहते नहीं रोका गया तो इसके परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतने पड़ेंगे।
भारत में नशे की समस्या अब महानगरों तक सीमित नहीं रही। यह गांवों, कस्बों, छोटे शहरों और यहां तक कि स्कूलों तथा कॉलेजों तक पहुंच चुकी है। कभी माना जाता था कि नशीले पदार्थों का सेवन केवल संपन्न वर्ग या शहरी संस्कृति की समस्या है लेकिन आज वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयावह है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी अफीम, चरस, गांजा, हेरोइन, सिंथेटिक ड्रग्स और इंजेक्शन के माध्यम से लिए जाने वाले नशीले पदार्थों का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है। यह स्थिति बताती है कि नशे का नेटवर्क अब समाज की हर परत तक पहुंच चुका है। आज का युवा अनेक प्रकार के दबावों से घिरा हुआ है। प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, सामाजिक अपेक्षाएं, पारिवारिक तनाव, मानसिक अवसाद, अकेलापन और त्वरित सफलता की चाह उसे भीतर से कमजोर बना रही है। ऐसे में नशे के सौदागर युवाओं की इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। कई बार मित्रों का दबाव, आधुनिक दिखने की चाह, रोमांच की तलाश या क्षणिक सुख का आकर्षण युवाओं को नशे की ओर धकेल देता है। शुरुआत अक्सर जिज्ञासा से होती है लेकिन धीरे-धीरे यही जिज्ञासा लत और फिर विनाश का कारण बन जाती है। इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने जहां ज्ञान के नए द्वार खोले हैं, वहीं नशे के कारोबार को भी नए साधन उपलब्ध कराए हैं। सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स और डार्क वेब के माध्यम से मादक पदार्थों की खरीद-फरोख्त पहले से कहीं अधिक आसान हो गई है। अब नशे का सौदा किसी सुनसान गली तक सीमित नहीं बल्कि स्मार्टफोन की स्क्रीन तक पहुंच चुका है। यही कारण है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नशे की पहुंच चिंताजनक रूप से बढ़ती जा रही है। आज देश के अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में नशीले पदार्थों की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। यह विडंबना ही है कि जिन परिसरों में देश के भविष्य का निर्माण होना चाहिए, वहां कुछ युवा अपने भविष्य को स्वयं नष्ट करने की राह पर बढ़ रहे हैं। आधुनिकता और स्वतंत्रता की गलत व्याख्या ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। कई युवाओं को यह भ्रम होता है कि नशा उन्हें अधिक आत्मविश्वासी, रचनात्मक और आधुनिक बनाता है, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। नशा व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। उसकी निर्णय लेने की शक्ति कमजोर हो जाती है, स्मरणशक्ति प्रभावित होती है, एकाग्रता घटती है और मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। जो युवा अपने जीवन में बड़े सपने लेकर आगे बढ़ता है, वही नशे की गिरफ्त में आकर अपनी प्रतिभा और संभावनाओं को स्वयं नष्ट कर देता है। यही कारण है कि नशे को केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि मानव संसाधन के विनाश की समस्या माना जाता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)