वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

मात्र समझौते के लिए न हो समझौता

प्रकाशित: 26-06-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
मात्र समझौते के लिए न हो समझौता
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता अपने अन्तिम चरण में पहुंच गया है किन्तु वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा यह शर्त रखे जाने कि जब तक भारतीय निर्यातकों को दूसरे प्रतिस्पधी देशों के मुकाबले तुलनात्मक टैरिफ लाभ देने वाला ढांचा तैयार नहीं हो जाता, तब तक भारत अमेरिका के साथ टेड डील पर हस्ताक्षर नहीं करेगा। यह इस बात का परिचायक है कि दोनों पक्ष अभी भी अपने-अपने लक्ष्यों को लेकर अड़े हुए हैं। यद्यपि यह बात वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने ही कही कि इस वर्ष की शुरुआत में 6 फरवरी को दोनों देशों के बीच समझौते में शामिल बिन्दुओं पर सहमति बन गई थी किन्तु उसके बाद दोनों देशों के वाणिज्य विभाग की टीमें लगातार समझौते के प्रावधानों की बारीकियों पर बातचीत कर रही हैं। जिस तरह अमेरिकी वाणिज्य विभाग के अधिकारी अपने व्यापारियों और उपभोक्ताओं के हितों की चिन्ता कर रहे हैं, ठीक उसी तरह भारतीय वाणिज्य मंत्रालय की टीम भारतीय व्यापारियों और उपभोक्ताओं के हितों के लिए चिन्तित हैं। दोनों देश अपने-अपने हितों के टकराव को टालने के लिए बारीकी से प्रस्ताव के प्रारूप की समीक्षा कर रहे हैं तो इसमें कोई गलत बात नहीं है किन्तु यदि दबाव डालकर टेड डील के प्रारूप पर अमेरिका ने प्रयास किया तो निश्चित रूप से भारत टेड डील को मानने से इंकार कर देगा।
सच तो यह है कि कोई भी समझौता तभी संपन्न होता है जब दोनों पक्ष कुछ छोड़ने के लिए तैयार रहे। समझौते का तो स्थाई भाव ही ‘समर्पण' है। अकड़ से कोई समझौता संपन्न हो ही नहीं सकता। यह भी सच है कि अकड़ में हमेशा वह देश रहता है जिसके पक्ष में व्यापार संतुलन का तराजू झुका होता है। मतलब जिस देश का निर्यात ज्यादा और आयात कम होता है। उसको लगता है कि उसके देश के उपभोक्ताओं को दूसरे पक्ष के उत्पाद की जरूरत ज्यादा नहीं है। लेकिन भारत के साथ अमेरिका अपनी अकड़ नहीं दिखा सकता। कारण कि भारत की जनसंख्या में मध्यम वर्ग की आबादी 31 प्रतिशत से 43 प्रतिशत तक है जबकि उच्च आय और उच्च मध्यम वर्ग में 1 करोड़ से 1.5 करोड़ लोग आते हैं। मतलब कि 3 प्रतिशत से 5 प्रतिशत के बीच भारत में संपन्न वर्ग के लोग रहते हैं। अमेरिकी नीति निर्धारकों को हमेशा इस बात की गलतफहमी रहती है कि भारत में उपभोक्ताओं के पास क्रय शक्ति का अभाव है। इसी अज्ञानता के वशीभूत अमेरिकी अधिकारी यह नहीं समझ पाते कि भारत में जितने मध्यम वर्ग के लोग हैं, उससे कम तो यूरोप के कई देशों की कुल आबादी है।
बहरहाल टेड डील होने में भले ही विलम्ब हो, किन्तु संदेह का निराकरण होना आवश्यक होता है। समझौते का स्थायित्व ही आपसी समझ पर निर्भर होता है। भारत की शर्त ऐसी नहीं है जिसे पूरा न किया जा सके। इसीलिए भारत समझौते के लिए समझौता नहीं करना चाहता बल्कि अपने व्यापारियों के लिए टैरिफ लाभ चाहता है जो कि आवश्यक भी है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत और अमेरिका दोनों ही लोकतांत्रिक देश हैं, इसलिए जो भी देश घाटे का सौदा करेगा, उस देश की सरकार को विपक्ष की आलोचना का पात्र और जनता का कोपभाजन बनना पड़ेगा। इसलिए समझौते के प्रारूप की बारीकियों का अध्ययन करके ही भारत और अमेरिका समझौते पर हस्ताक्षर करें तो दोनों के लिए अच्छा रहेगा।