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पुलिस की कार्रवाई सराहनीय

प्रकाशित: 26-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
दिल्ली पुलिस की हालिया कार्रवाई ने राजधानी में चल रहे एक संगठित बच्चा तस्करी रैकेट का पर्दाफाश किया है, जो अंतरराज्यीय स्तर पर सािढय था। इस गिरोह की मास्टरमाइंड डॉ. विवेकी बताई जा रही हैं, जिनके पास न तो एमबीबीएस की डिग्री थी और न ही एमडी, फिर भी वे रोहिणी के बेगमपुर इलाके में हीरा मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल चला रही थीं। पुलिस के अनुसार, गिरोह विभिन्न राज्यों से नवजात बच्चों को लाकर उन्हें अस्पताल में छुपाता था, फर्जी जन्म दस्तावेज और प्रमाण पत्र तैयार करता था, और फिर निसंतान दंपतियों को लाखों रुपये में बेच देता था। अब तक 13 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और पांच से छह बच्चों को बचाया गया है। इस मामले की गहराई चौंकाने वाली है। गिरोह का तरीका बेहद शातिराना था-बच्चों को 'फाइल्स' कहकर संदर्भित किया जाता था, पेमेंट कैश में होता था, और अस्पताल को कवर के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। विवेकी न केवल बच्चों को शेल्टर देती थीं बल्कि बायर्स की तलाश में भी मदद करती थीं, खासकर उन दंपतियों में जो इनफर्टिलिटी ट्रीटमेंट के लिए आते थे।
फर्जी दस्तावेजों के जरिए बच्चे को वैध जन्म प्रमाणित कर दिया जाता था, जिससे गोद लेने की प्रािढया कानूनी रूप से सही लगती। रोहिणी के एक अस्पताल और विवेकी के सरकारी डॉक्टर पति पर भी अब जांच का दायरा बढ़ाया गया है, जहां जुड़वां बच्चों के फर्जी रिकॉर्ड बनाए जाने के सबूत मिले हैं। यह घटना स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी निगरानी की कमियों को उजागर करती है। एक नकली डॉक्टर द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल में इतने लंबे समय तक यह धंधा कैसे चला? सरकारी अस्पतालों और प्राइवेट सेटअप के बीच डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन की प्रािढया कितनी ढीली है, यह सवाल उठता है। आदिवासी परिवारों से बच्चों की खरीद और फिर उन्हें शहरी निसंतान जोड़ों को बेचने का मॉडल मानव तस्करी की क्लासिक आपूर्ति-मांग श्रृंखला को दर्शाता है। आर्थिक असमानता, संतान की लालसा और कानूनी गोद लेने की जटिल प्रािढयाएं ऐसे रैकेट को पनपने का मौका देती हैं। पुलिस की तेज कार्रवाई सराहनीय है, जिसमें डिकॉय ऑपरेशन और सीसीटीवी फुटेज का इस्तेमाल शामिल रहा। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है। बड़े स्तर पर नेटवर्क को पूरी तरह तोड़ने, फर्जी दस्तावेज बनाने वाले अन्य अस्पतालों की जांच करने और बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त प्रोटोकॉल लागू करने की जरूरत है। समाज को भी जागरूक होना होगा-नवजात की सुरक्षा पर पैरेंट्स, अस्पताल स्टाफ और स्थानीय समुदायों की नजर होनी चाहिए। यह मामला न केवल अपराध का है बल्कि नैतिक पतन और सिस्टम फेलियर का भी, जिसे सुधारने के लिए तत्काल कदम उठाने पड़ेंगे ताकि मासूमों का भविष्य सुरक्षित रहे। दुख इस बात का है कि हम जिस गति से प्रगति करते जा रहे हैं हम उतनी ही तेज गति से अनैतिकता की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। नैतिक मूल्यों की गिरावट लगातार देखी जा रही है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।