वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

फिर से कल सूरज उगेगा

प्रकाशित: 21-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
शिव शंकर द्विवेदी
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
उभयोरपि दृष्टो?न्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:।। श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय -2, श्लोक-16।।
अर्थ- असत् अर्थात् जो सत् नहीं है उसका अस्तित्व नहीं होता है और सत् अर्थात् जो अस्तित्व में है उसका अभाव नहीं होता है अर्थात् जो विद्यमान है, अस्तित्व में है उसे सत् समझना चाहिए असत् नहीं। तत्त्वदर्शियों ने इन दोनों अर्थात् सत् और असत् के विषय में उक्त प्रकार से अनुभव किया है।
श्रीकृष्ण ने उक्त के माध्यम से जगत् अर्थात् दृश्यमान् संसार के विषय में अपना स्पष्ट अभिमत समझाया है कि यह जगत् दृश्यमान और अस्तित्ववान् है अत एव इसे असत् नहीं समझना चाहिए। इसे असत् समझने की भूल से बचना चाहिए।
पुरुष सूक्त की दूसरी ऋचा में वर्तमान में विद्यमान् और दृश्यमान् को पुरूष अर्थात् परमतत्त्व के रूप में समझाया गया है किन्तु वहां यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि जो भूत हो चुका है वह भी यही पुरूष अर्थात् परमतत्त्व ही था और जो भविष्य में होगा वह भी यही पुरूष अर्थात् परमतत्त्व ही होगा-
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतंयच्चभाव्यम्....।
उक्त ऋचा में 'इदम् सर्वं पुरुष एव' कह कर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि वर्तमान में विद्यमान एवं दृश्यमान असत्, मिथ्या, भ्रम या किसी का विवर्त आदि कुछ भी नहीं है जिस रूप में प्रचारित किया गया है। वर्तमान में विद्यमान, दृश्यमान और अस्तित्ववान् जो कुछ भी है वह पुरुष ही है और इस कारण यह असत्, मिथ्या, भ्रम या विवर्त नहीं अपितु सत् है।
जो व्यतीत हो गया है वह भी कुछ ऐसा नहीं था जो वर्तमान से भिन्न था क्योंकि वह भी वर्तमान में दिख रहे की तरह ही था वह भी परमतत्त्व ही था।
उक्त ऋचा में भविष्य को भी लेकर स्थिति साफ की जा चुकी है कि भविष्य भी ऐसा कुछ नहीं होगा जिसे सपने दिखाकर लोगों को भ्रमित किया जा सके क्योंकि भविष्य भी यही वर्तमान में दिख रहा परमतत्त्व ही होगा।
उक्त रूप में उक्त ऋचा में दृश्यमान जगत् की तात्त्विक स्थिति स्पष्ट करते हुए जीवनप्रािढया की अन्तहीनता को ही प्रख्यापित किया गया है।
जब यह बोध हो जायगा कि जीवन प्रािढया से बाहर होना संभव ही नहीं है तब व्यक्ति को चरैवेति-चरैवेति का वास्तविक अर्थ बोध होगा और तब वह 'संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ' को अपने सोच और आचरण में उतारने का प्रयास करेगा। वह अग्निदेव से प्रार्थना करेगा कि -
संसमिद्युवसे बृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ
इडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर।
ऋग्वेद, मंडल -10, सूक्त -191, ऋचा -1।।
अर्थ- हे अभिलाषापूरक एवं स्वामी अग्नि! तुम सभी प्राणियों को भली प्रकार मिश्रित करते हो तुम यज्ञ वेदी पर प्रज्वलित होते हो तुम हमें धन दो।
मित्रों! आज हमें अग्नि को उस साधन या माध्यम के रूप में समझने की आवश्यकता है जो हमें धन आदि संसाधनों से भरपूर करने में मददगार होता हो। यहां जीवन के यशोमय आनन्द के लिए शुचिता पूर्ण संसाधन की याचना की जा रही है न कि इस दृश्यमान जगत् को असत्, मिथ्या, भ्रम जन्य या विवर्त समझकर यहां से पलायन की साधना पूर्ण करने की याचना की जा रही है।
जब इस दृश्यमान जगत् को सत् समझा जायगा जैसा कि उक्त ऋचा में समझा गया है, उपनिषदों में 'सर्वंखल्विदं ब्रह्म 'के माध्यम से समझाने का प्रयास है और 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ' के माध्यम से श्रीकृष्ण ने समझाने का प्रयास किया है तब तो यही प्रार्थना होगी ही कि -
समानो मत्र: समिति: समानी
समानं मन: सह चित्तमेषाम्।
समानं मत्रमभि मत्रये व:
समानेन वो हविषा जुहोमि।।
ऋग्वेद, मंडल-10, सूक्त, -191, ऋचा -3।।
अर्थ- पुरोहितों की स्तुतियां समान हों। ये लोग यज्ञ में एक साथ आयें। उनके मत्र और चित्त भी समान हों। हे पुरोहितों! मैं एक ही मत्र से तुम सबको अभिमत्रित करता हूं और एक ही प्रकार की हवि से तुम्हारा हवन करता हूं।
मित्रों! उक्त मत्र में जीवन प्रािढया की अन्तहीनता को स्वीकार करते हुए ही समाज में व्याप्त विविधता की स्थिति में भी एक समान उद्देश्य के प्रति एक मत होने का आह्वान है और वह मत्र सर्वकल्याण की सोच ही है। यही सर्वकल्याण श्रीकृष्ण के मत में यज्ञार्थकर्म हो जाता है यही लोकहित हो जाता है। आज भी हमारी सोच में लोकहित के लिए एक मत होने की कामना को ही प्रमुखता प्राप्त है। यही हमारे आचरण की मार्गदर्शी सोच है।
ऋग्वेद की अन्तिम ऋचा में जो कुछ भी कहा गया है वह जीवन प्रािढया की अन्तहीनता और यथार्थता को ध्यान में ही रखकर कहा गया है -
समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।।
ऋग्वेद, मंडल -10, सूक्त -191, ऋचा -4।।
अर्थ- हे यजमानों!व पुरोहितों! तुम्हारा व्यवसाय समान हों तुम्हारे हृदय समान हों तुम लोग एक रूप में संगठित बनो।
उक्त ऋचा में भी यजमान और पुरोहित से जीवन के प्रति समान सोच और आचरण के साथ रहने की कामना की गयी है क्योंकि जीवनप्रक्रिया को वास्तविक और अन्तहीन समझा गया है। एक प्रगतिशील समाज की अभ्युन्नति के लिए पुरोहित अर्थात् व्यवस्थापक एवं यजमान अर्थात् आम जन के वैचारिक साम्य और आचरण साम्य की कामना की गयी है क्योंकि व्यवस्थापक का दायित्व है कि वह व्यवस्था को लोकहित के लिए निर्धारित करे न कि निजी हित के लिए और आम जन से भी अपेक्षा है कि वे व्यवस्थापक के लिए अपने निजीहित से ऊपर उठकर सोचने और व्यवस्था करने का अवसर दें।
उक्त रूप में हम समझ सकते हैं कि हमारे सनातन चिन्तन में जीवन के प्रति कितनी जागरूकता रही है। हमने जीवन प्रािढया से पलायन को कभी भी लक्ष्य के रूप में नहीं समझा था वास्तविकता तो यह है कि भाष्य के स्तर पर जीवन बोझ समझा जाने लगा है आज हम इसी भाष्य की सोच को सनातनसोच समझकर यह समझने के लिए विवश हो रहे हैं कि जीवन प्रक्रिया से बाहर होना ही हमारे जीवन का पुरूषार्थ है जबकि वास्तविकता ऊपर स्पष्ट की जा चुकी है।
अन्त में यही अनुरोध है कि हमें किसी के टीका भाष्य या उपदेशों से भ्रमित होकर अपने लक्ष्य के निर्धारण में भ्रमित नहीं होना चाहिए और जिस वास्तविकता को ऋचाओं में बताया गया है उसे जीवन में घटित हो रही घटनाओं के माध्यम से सत्यापित करते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए। उल्लेखनीय है कि भाष्य स्तर पर दावा किया जाता है कि उनके भाष्य ऋचाओं की ही व्याख्या हैं ऐसे में भाष्य के स्थान पर ऋचाओं को अपनी भाषा में अनुवाद कर के स्वयं निर्णय लें कि भाष्य मूल से कहां असंगतिपूर्ण निष्कर्ष दे रहे हैं?
अपनी बात को अपनी सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह जीवन के स्वर की निम्न पंक्तियों के माध्यम से विराम देता हूं -
कल वही था आज जो है,
आज ही कल भी रहेगा।
जो भी चाहो सोच लो पर,
फिर से कल सूरज उगेगा।।
(लेखक पूर्व संयुक्त सचिव उत्तर प्रदेश शासन हैं।)