कुलपति नियुक्ति की जवाबदेही तय हो
प्रकाशित: 20-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
हरीश अहमद मिनहाज
भारत में कुलपति की नियुक्ति हमेशा विवादों में रहा है। क्योंकि कुलपति की नियुक्ति सीधे तौर पर राजपाल के द्वारा होता है। केंद्र की सत्ता में आज के मंत्री या पदाधिकारी कल के राज्यपाल होते हैं। राजनीतिक प्रभाव या दबाव और प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति कि धोर मंशा रहती है कि मैं आमुक विश्वविद्यालय का कुलपति बनुं। और कई राज्यपाल भी अपने प्रिय पात्र को कुलपति नियुक्त करते भी हैं। भले ही वे दक्षता या पात्रता नहीं रखते हों धन या शीर्ष राजनीतिक सिफारिशों से कुलपति नियुक्त हो भी जाते हैं। और यहीं से राज्य सरकार और राज्यपाल की शक्ति का टकराव जनमानस के पटल पर देखने को निरंतर मिलता रहता है। हालांकि कई राज्य सरकारों ने राज्यपाल को चांसलर के रूप में हटाने के लिए नए विश्वविद्यालय कानून बनाए हैं। राज्यपाल पर लोकतांत्रिक मानदंडों को दरकिनार करने और संघीय सिद्धांतों को कमजोर करने का आरोप लगाता रहा है। यही प्रकरण राज्य प्रशासन में राज्यपालों की भूमिका को लेकर केंद्र और राज्य के बीच लगातार टकराव को दर्शाता है और साथ ही इस बात पर बहस छिड़ी रहती है कि क्या राज्यपाल को कुलाधिपति के रूप में विश्वविद्यालय के मामलों पर स्वायत्त नियंत्रण रखना चाहिए? सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है कि कुलपतियों की नियुक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विनिमय 2018 के अनुसार ही होना चाहिए। जिसमें कहा गया है कि सर्वोच्च योग्यता सत्यनिष्ठा, नैतिकता और संस्थागत प्रतिबद्धता रखने वाले व्यक्ति को ही कुलपति के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए। यूजीसी विनियमों के अनुसार यदि राज्य का कानून यूजीसी के दिशा निर्देशों से मेल नहीं खाता है तो कुलपति की नियुक्ति अवैध मानी जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियमों के अनुसार कुलपति की नियुक्ति तीन सदस्यीय खोज सह चयन समिति के माध्यम से होना चाहिए। जिसमें एक सदस्य विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद दूसरा राज्यपाल या कुलाधिपति द्वारा तीसरा यूजीसी द्वारा नामित व्यक्ति के द्वारा ही होना चाहिए। अभी ताजा मामला सीजा थॉमस बनाम केरल सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केरल सरकार द्वारा नियुक्त कुलपति की नियुक्ति को अमान्य ठहराया क्योंकि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मानदंडों के अनुरूप नहीं थी। अकादमी पृष्ठभूमि के बिना कुलपतियों की नियुक्ति शिक्षण, अनुसंधान और विश्वविद्यालय प्रशासन में महत्वपूर्ण अनुभव रखने वाले सफल शिक्षाविद ही कुलपति बनने के योग रहे हैं। इस मानदंड से यह सुनिश्चित होता था कि संस्थानों का संचालन करने के लिए चुने गए व्यक्ति अकादमिक मूल्यों, संस्थागत प्रशासन और प्रोफेसरों और छात्रों के सामने आने वाली चुनौतियों को समझते हो। राधाकृष्णन आयोग (1948), कोठारी आयोग (1964 -1966) ज्ञानम समिति (1990) और रामलाल पारिख समिति (1993) की रिपोर्ट ने समय-समय पर आवश्यक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय की गुणवत्ता और प्रासंगिकता को बनाए रखने के साथ-साथ इसके विकास और प्रगति में कुलपति की भूमिका के महत्वपूर्ण तत्वों को उजागर किया है। रांची विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा लगातार विरोध कर रहा है झारखंड मुक्ति मोर्चा का आरोप है कि राज्य से बाहर के लोगों को लाकर राज्यपाल कुलपति की कुर्सी दे रहे हैं। राज्यपाल भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं। राज्यपाल भाजपा और आरएसएस के कार्यालय से ही उनके प्रेषित नामों को अनुमोदित कर कुलपति बना रहे हैं। अभी हाल ही में बिहार से केरल में बनाए गए राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अलेकर (अभी तमिलनाडू के राज्यपाल) ने राज्य सरकार से मंत्रणा लिए बगैर अपनी मनमर्जी से कई विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्त किया है। केरल के शिक्षा राज्य मंत्री इसे आलोकतांत्रिक बताते हुए सरकार के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप बताया है। केरल, 2021 में तत्कालीन राज्यपाल रहे आरिफ मोहम्मद खान ने कुलपति के पुनर्नियुक्ति का विरोध किया था। राज्य ने राज्यपाल के स्थान पर कुलाधिपति का पद संभालने के लिए एक विधेयक पारित किया है, जो राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। पश्चिम बंगाल, राज्यपाल द्वारा एकतरफा रूप से की गई अंतरिम कुलपति नियुक्तियों को लेकर विवादों के समाधान में सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित है। राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को कुलाधिपति बनाने के राज्य विधानसभा के प्रस्ताव को राज्यपाल की सहमति न मिलने के कारण रोक दिया गया है। कर्नाटक, प्रस्तावित विधायी सुधारो का उद्देश्य राज्यपाल को कुलाधिपति पद से हटाना है। विधेयक अनुमोदन की प्रतीक्षा में है। महाराष्ट्र, 2022 में नई सरकार के तहत कुलपति की नियुक्ति में राज्यपाल की भूमिका को सीमित करने के प्रयास भी अधर में है। तमिलनाडु, डीएमके के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा राज्यपाल की मंजूरी के बिना कुलपतियों की नियुक्ति के प्रयास अभी भी अवरुध्द है। अत ऐसे अनेको अनगिनत उदाहरण हैं जो शैक्षणिक ललाट पर कलंक है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा कुलपतियों की नियुक्ति संबंधी भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में शैक्षणिक स्वायत्ता और संस्थागत स्वतंत्रता के हनन को लेकर व्यापक चिंताएं उत्पन्न की गई है। शैक्षणिक निर्णय लेने में राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए भारतीय विश्वविद्यालयों को ऐतिहासिक रूप से एक निश्चित स्तर की स्वायत्तता प्राप्त रही है। इस स्वायत्तता के सबसे महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक कुलपतियों की नियुक्ति है, जो संस्थाओं के शैक्षणिक दिशा निर्देश और संचालन को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी नियुक्तियां अकादमिक वातावरण को खतरे में डाल सकती है। क्योंकि, उच्च शिक्षा के बारे में पर्याप्त ज्ञान न रखने वाले लोग प्रशासनिक या राजनीतिक उद्देश्यों को अकादमिक प्रदर्शन से ऊपर रख सकते हैं। विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में गिरावट के बारे में और भी अधिक चिंताएं पैदा करता है और देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और वैधता को खतरे में डाल सकता है। कुलपति के महत्वपूर्ण कार्यों में से एक विश्वविद्यालय के प्रशासन का प्रबंधन और संगठन करना है। इसमें छात्र प्रबंधन, मानव संसाधन, वित्त और अवसंरचना जैसे विभिन्न प्रशासनिक क्षेत्र का समन्वय शामिल है। कुलपति यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं कुशलतापूर्वक चले और कर्मचारियों को उचित सहयोग प्राप्त हो। कुलपति विश्वविद्यालय बोर्ड की ओर से कार्य करते हैं और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों के सर्वोच्च प्रमुख होते हैं। इस पद में विश्वविद्यालय के विकास और उनकी गतिविधियों की उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने की समग्र जिम्मेदारी कुलपति में निहित है। आयें दिन शिक्षा के मंदिरों में जिस तरह की घटनाएं देखने को मिल रही है यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं ना कहीं कुलपति चयन प्रािढया में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। पहले कुलपतियों पर इक्का-दुक्का आरोप ही देखने को मिलते थे तथा इन आरोपों के चलते नैतिकता के आधार पर कुलपति पद भी छोड़ देते थे लेकिन वर्तमान में विश्वविद्यालयों के अधिकतर कुलपतियों पर अनियमिताएं करने और भ्रष्टाचार एवं पक्षपातपूर्ण व्यवहार के आरोप लगना आम बात हो गई है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और विडंबना क्या होगी कि जिनके हाथों में शिक्षा के मंदिरों की कमान हैं उन्हें भ्रष्टाचार और अनियमिताओं के आरोप में जेल तक जाना पड़ रहा है। बिहार में नई सरकार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, नए राज्यपाल सैयद अता हसनैन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है। राज्यपाल अपने पद पर स्थापित होते ही राज्य के सभी कुलपतियों की नीतिगत फैसले पर रोक लगा दी। यह एक स्वागतयोग और बिहार में शिक्षा का आमूल चूल परिवर्तन की दिशा में धोर नितांत आवश्यकता थी। बिहार की कुल 892 महाविद्यालयों पर आधारित 21 विश्वविद्यालयों की शिक्षा का कायाकल्प करने की दिशा में यह एक स्वागतयोग कदम है। मगध विश्वविद्यालय अपने 64 वें वर्ष के क्रम में 31 कुलपतियों में से लगभग 25 पर वित्तीय अनियमितता का दोषी और भ्रष्ट पाए गए तो कई जेल और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजें तक पहुंचे। बिहार जो कभी शिक्षा का विश्व स्तंभ हुआ करता था, जो आर्यभट्ट ने दुनिया को शून्य दिया। नालंदा जो कभी विश्व में शिक्षा का केंद्र था, तो भगवान बुद्ध ने मगध की धरती से दुनिया को अहिंसा का मंत्र दिया, आज इसी बिहार में शिक्षा का स्तर निरंतर गिरा है। कई महीनों से बिहार के 15 विश्वविद्यालयों में प्रति कुलपति और चार विश्वविद्यालय में कुलपति का पद रिक्त है। मगध विश्वविद्यालय में भी कई महीनों से कुलपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद पुन सेवा विस्तार दिया गया है। शिक्षा की गुणवत्ता और उत्कृष्टा हेतु यह अति आवश्यक है कि किसी भी कुलपति को दोबारा पदस्थापित नहीं किया जाए। राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति को कदापि कुलपति के पद पर सुशोभित नहीं होना चाहिए। अकादमिक धरातल वाले कुलपति ही शिक्षा का अलख़ और ज्योत प्रकाशमय कर सकते हैं। अन्यथा, राजनीतिक इच्छाशक्ति से वशीभूत और परिपूर्ण लोग पी.एच.डी. के नाम पर शिक्षा का बाजारीकरण करने मे लेश मात्र भी संकोच और लज्जित नहीं हो पाऐगें। समाचार पत्रों में खुद को प्रायोजित करने में, सरकारी गलियारों में स्वयं को स्थापित करने में, दलगत राजनीति का परिक्रमा करने में, धार्मिक अनुष्ठान की बैशाखी तलें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दुरुपयोग मात्र अपने हित में प्रयोग करने मे बाज़ नहीं आऐगें। समय की मांग है कि विश्वविद्यालयों में ऐसे कुलपति नियुक्त हों जो वास्तव में पारदर्शिता, निष्पक्षता, ईमानदारी एवं सर्वोच्च नैतिकता के साथ आचरण करें एवं विश्वविद्यालय के सर्वोत्तम हित में निर्णय लें। कुलपति को पारदर्शिता, निष्पक्षिता, ईमानदारी, सर्वोच्च नैतिकता के साथ आचरण करने एवं विश्वविद्यालय के सर्वोत्तम हित में निर्णय लेने के लिए है। कुलपति का चयन करते समय अकादमिक उपलब्धियां के साथ-साथ संबंधित संस्था से ईमानदारी, नैतिकता एवं संवेदनशीलता के संबंध में गोपनीय जानकारी भी हासिल की जानी चाहिए। क्योंकि, किसी भी शिक्षक के बारे में सही जानकारी उनके छात्र एवं वह लोग ही दे सकते हैं जो वर्षों से उनके साथ कार्य कर रहे हैं। जब तक की चयन करने वाले लोगों एवं संस्थाओं को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा तब तक शिक्षा में गुणवत्ता नहीं हो सकती। उदारणस्वरूप जिस तरह मोटर वाहन अधिनियम 2019 में नाबालिक द्वारा वाहन चलाने पर अभिभावक को दोषी माना जाएगा ठीक इसी तरह कुलपति बनाने वालों की, तीन सदस्यीय खोज सह चयन समिति अनुशंसा करनें वालों पर जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
(लेखक सामाजिक और राजनीतिक शोधकर्ता हैं।)
भारत में कुलपति की नियुक्ति हमेशा विवादों में रहा है। क्योंकि कुलपति की नियुक्ति सीधे तौर पर राजपाल के द्वारा होता है। केंद्र की सत्ता में आज के मंत्री या पदाधिकारी कल के राज्यपाल होते हैं। राजनीतिक प्रभाव या दबाव और प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति के पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति कि धोर मंशा रहती है कि मैं आमुक विश्वविद्यालय का कुलपति बनुं। और कई राज्यपाल भी अपने प्रिय पात्र को कुलपति नियुक्त करते भी हैं। भले ही वे दक्षता या पात्रता नहीं रखते हों धन या शीर्ष राजनीतिक सिफारिशों से कुलपति नियुक्त हो भी जाते हैं। और यहीं से राज्य सरकार और राज्यपाल की शक्ति का टकराव जनमानस के पटल पर देखने को निरंतर मिलता रहता है। हालांकि कई राज्य सरकारों ने राज्यपाल को चांसलर के रूप में हटाने के लिए नए विश्वविद्यालय कानून बनाए हैं। राज्यपाल पर लोकतांत्रिक मानदंडों को दरकिनार करने और संघीय सिद्धांतों को कमजोर करने का आरोप लगाता रहा है। यही प्रकरण राज्य प्रशासन में राज्यपालों की भूमिका को लेकर केंद्र और राज्य के बीच लगातार टकराव को दर्शाता है और साथ ही इस बात पर बहस छिड़ी रहती है कि क्या राज्यपाल को कुलाधिपति के रूप में विश्वविद्यालय के मामलों पर स्वायत्त नियंत्रण रखना चाहिए? सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है कि कुलपतियों की नियुक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विनिमय 2018 के अनुसार ही होना चाहिए। जिसमें कहा गया है कि सर्वोच्च योग्यता सत्यनिष्ठा, नैतिकता और संस्थागत प्रतिबद्धता रखने वाले व्यक्ति को ही कुलपति के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए। यूजीसी विनियमों के अनुसार यदि राज्य का कानून यूजीसी के दिशा निर्देशों से मेल नहीं खाता है तो कुलपति की नियुक्ति अवैध मानी जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियमों के अनुसार कुलपति की नियुक्ति तीन सदस्यीय खोज सह चयन समिति के माध्यम से होना चाहिए। जिसमें एक सदस्य विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद दूसरा राज्यपाल या कुलाधिपति द्वारा तीसरा यूजीसी द्वारा नामित व्यक्ति के द्वारा ही होना चाहिए। अभी ताजा मामला सीजा थॉमस बनाम केरल सरकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केरल सरकार द्वारा नियुक्त कुलपति की नियुक्ति को अमान्य ठहराया क्योंकि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मानदंडों के अनुरूप नहीं थी। अकादमी पृष्ठभूमि के बिना कुलपतियों की नियुक्ति शिक्षण, अनुसंधान और विश्वविद्यालय प्रशासन में महत्वपूर्ण अनुभव रखने वाले सफल शिक्षाविद ही कुलपति बनने के योग रहे हैं। इस मानदंड से यह सुनिश्चित होता था कि संस्थानों का संचालन करने के लिए चुने गए व्यक्ति अकादमिक मूल्यों, संस्थागत प्रशासन और प्रोफेसरों और छात्रों के सामने आने वाली चुनौतियों को समझते हो। राधाकृष्णन आयोग (1948), कोठारी आयोग (1964 -1966) ज्ञानम समिति (1990) और रामलाल पारिख समिति (1993) की रिपोर्ट ने समय-समय पर आवश्यक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय की गुणवत्ता और प्रासंगिकता को बनाए रखने के साथ-साथ इसके विकास और प्रगति में कुलपति की भूमिका के महत्वपूर्ण तत्वों को उजागर किया है। रांची विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्ति के बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा लगातार विरोध कर रहा है झारखंड मुक्ति मोर्चा का आरोप है कि राज्य से बाहर के लोगों को लाकर राज्यपाल कुलपति की कुर्सी दे रहे हैं। राज्यपाल भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं। राज्यपाल भाजपा और आरएसएस के कार्यालय से ही उनके प्रेषित नामों को अनुमोदित कर कुलपति बना रहे हैं। अभी हाल ही में बिहार से केरल में बनाए गए राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अलेकर (अभी तमिलनाडू के राज्यपाल) ने राज्य सरकार से मंत्रणा लिए बगैर अपनी मनमर्जी से कई विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्त किया है। केरल के शिक्षा राज्य मंत्री इसे आलोकतांत्रिक बताते हुए सरकार के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप बताया है। केरल, 2021 में तत्कालीन राज्यपाल रहे आरिफ मोहम्मद खान ने कुलपति के पुनर्नियुक्ति का विरोध किया था। राज्य ने राज्यपाल के स्थान पर कुलाधिपति का पद संभालने के लिए एक विधेयक पारित किया है, जो राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। पश्चिम बंगाल, राज्यपाल द्वारा एकतरफा रूप से की गई अंतरिम कुलपति नियुक्तियों को लेकर विवादों के समाधान में सर्वोच्च न्यायालय में मामला लंबित है। राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को कुलाधिपति बनाने के राज्य विधानसभा के प्रस्ताव को राज्यपाल की सहमति न मिलने के कारण रोक दिया गया है। कर्नाटक, प्रस्तावित विधायी सुधारो का उद्देश्य राज्यपाल को कुलाधिपति पद से हटाना है। विधेयक अनुमोदन की प्रतीक्षा में है। महाराष्ट्र, 2022 में नई सरकार के तहत कुलपति की नियुक्ति में राज्यपाल की भूमिका को सीमित करने के प्रयास भी अधर में है। तमिलनाडु, डीएमके के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा राज्यपाल की मंजूरी के बिना कुलपतियों की नियुक्ति के प्रयास अभी भी अवरुध्द है। अत ऐसे अनेको अनगिनत उदाहरण हैं जो शैक्षणिक ललाट पर कलंक है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा कुलपतियों की नियुक्ति संबंधी भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में शैक्षणिक स्वायत्ता और संस्थागत स्वतंत्रता के हनन को लेकर व्यापक चिंताएं उत्पन्न की गई है। शैक्षणिक निर्णय लेने में राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए भारतीय विश्वविद्यालयों को ऐतिहासिक रूप से एक निश्चित स्तर की स्वायत्तता प्राप्त रही है। इस स्वायत्तता के सबसे महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक कुलपतियों की नियुक्ति है, जो संस्थाओं के शैक्षणिक दिशा निर्देश और संचालन को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी नियुक्तियां अकादमिक वातावरण को खतरे में डाल सकती है। क्योंकि, उच्च शिक्षा के बारे में पर्याप्त ज्ञान न रखने वाले लोग प्रशासनिक या राजनीतिक उद्देश्यों को अकादमिक प्रदर्शन से ऊपर रख सकते हैं। विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में गिरावट के बारे में और भी अधिक चिंताएं पैदा करता है और देश भर के उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और वैधता को खतरे में डाल सकता है। कुलपति के महत्वपूर्ण कार्यों में से एक विश्वविद्यालय के प्रशासन का प्रबंधन और संगठन करना है। इसमें छात्र प्रबंधन, मानव संसाधन, वित्त और अवसंरचना जैसे विभिन्न प्रशासनिक क्षेत्र का समन्वय शामिल है। कुलपति यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रशासनिक प्रक्रियाएं कुशलतापूर्वक चले और कर्मचारियों को उचित सहयोग प्राप्त हो। कुलपति विश्वविद्यालय बोर्ड की ओर से कार्य करते हैं और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों के सर्वोच्च प्रमुख होते हैं। इस पद में विश्वविद्यालय के विकास और उनकी गतिविधियों की उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने की समग्र जिम्मेदारी कुलपति में निहित है। आयें दिन शिक्षा के मंदिरों में जिस तरह की घटनाएं देखने को मिल रही है यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं ना कहीं कुलपति चयन प्रािढया में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। पहले कुलपतियों पर इक्का-दुक्का आरोप ही देखने को मिलते थे तथा इन आरोपों के चलते नैतिकता के आधार पर कुलपति पद भी छोड़ देते थे लेकिन वर्तमान में विश्वविद्यालयों के अधिकतर कुलपतियों पर अनियमिताएं करने और भ्रष्टाचार एवं पक्षपातपूर्ण व्यवहार के आरोप लगना आम बात हो गई है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और विडंबना क्या होगी कि जिनके हाथों में शिक्षा के मंदिरों की कमान हैं उन्हें भ्रष्टाचार और अनियमिताओं के आरोप में जेल तक जाना पड़ रहा है। बिहार में नई सरकार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, नए राज्यपाल सैयद अता हसनैन की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है। राज्यपाल अपने पद पर स्थापित होते ही राज्य के सभी कुलपतियों की नीतिगत फैसले पर रोक लगा दी। यह एक स्वागतयोग और बिहार में शिक्षा का आमूल चूल परिवर्तन की दिशा में धोर नितांत आवश्यकता थी। बिहार की कुल 892 महाविद्यालयों पर आधारित 21 विश्वविद्यालयों की शिक्षा का कायाकल्प करने की दिशा में यह एक स्वागतयोग कदम है। मगध विश्वविद्यालय अपने 64 वें वर्ष के क्रम में 31 कुलपतियों में से लगभग 25 पर वित्तीय अनियमितता का दोषी और भ्रष्ट पाए गए तो कई जेल और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजें तक पहुंचे। बिहार जो कभी शिक्षा का विश्व स्तंभ हुआ करता था, जो आर्यभट्ट ने दुनिया को शून्य दिया। नालंदा जो कभी विश्व में शिक्षा का केंद्र था, तो भगवान बुद्ध ने मगध की धरती से दुनिया को अहिंसा का मंत्र दिया, आज इसी बिहार में शिक्षा का स्तर निरंतर गिरा है। कई महीनों से बिहार के 15 विश्वविद्यालयों में प्रति कुलपति और चार विश्वविद्यालय में कुलपति का पद रिक्त है। मगध विश्वविद्यालय में भी कई महीनों से कुलपति का कार्यकाल खत्म होने के बाद पुन सेवा विस्तार दिया गया है। शिक्षा की गुणवत्ता और उत्कृष्टा हेतु यह अति आवश्यक है कि किसी भी कुलपति को दोबारा पदस्थापित नहीं किया जाए। राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति को कदापि कुलपति के पद पर सुशोभित नहीं होना चाहिए। अकादमिक धरातल वाले कुलपति ही शिक्षा का अलख़ और ज्योत प्रकाशमय कर सकते हैं। अन्यथा, राजनीतिक इच्छाशक्ति से वशीभूत और परिपूर्ण लोग पी.एच.डी. के नाम पर शिक्षा का बाजारीकरण करने मे लेश मात्र भी संकोच और लज्जित नहीं हो पाऐगें। समाचार पत्रों में खुद को प्रायोजित करने में, सरकारी गलियारों में स्वयं को स्थापित करने में, दलगत राजनीति का परिक्रमा करने में, धार्मिक अनुष्ठान की बैशाखी तलें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दुरुपयोग मात्र अपने हित में प्रयोग करने मे बाज़ नहीं आऐगें। समय की मांग है कि विश्वविद्यालयों में ऐसे कुलपति नियुक्त हों जो वास्तव में पारदर्शिता, निष्पक्षता, ईमानदारी एवं सर्वोच्च नैतिकता के साथ आचरण करें एवं विश्वविद्यालय के सर्वोत्तम हित में निर्णय लें। कुलपति को पारदर्शिता, निष्पक्षिता, ईमानदारी, सर्वोच्च नैतिकता के साथ आचरण करने एवं विश्वविद्यालय के सर्वोत्तम हित में निर्णय लेने के लिए है। कुलपति का चयन करते समय अकादमिक उपलब्धियां के साथ-साथ संबंधित संस्था से ईमानदारी, नैतिकता एवं संवेदनशीलता के संबंध में गोपनीय जानकारी भी हासिल की जानी चाहिए। क्योंकि, किसी भी शिक्षक के बारे में सही जानकारी उनके छात्र एवं वह लोग ही दे सकते हैं जो वर्षों से उनके साथ कार्य कर रहे हैं। जब तक की चयन करने वाले लोगों एवं संस्थाओं को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा तब तक शिक्षा में गुणवत्ता नहीं हो सकती। उदारणस्वरूप जिस तरह मोटर वाहन अधिनियम 2019 में नाबालिक द्वारा वाहन चलाने पर अभिभावक को दोषी माना जाएगा ठीक इसी तरह कुलपति बनाने वालों की, तीन सदस्यीय खोज सह चयन समिति अनुशंसा करनें वालों पर जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
(लेखक सामाजिक और राजनीतिक शोधकर्ता हैं।)