खतरे की घंटी
प्रकाशित: 20-05-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मंगलवार को एक सप्ताह के अन्दर ही दूसरी बार बढ़ने के कारण दिल्ली में 97.77 रुपए से बढ़कर 98.64 रुपए हो गया। इससे महंगाई का बढ़ना तय है।
दरअसल पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों का उपभोक्ताओं पर सापेक्ष प्रभाव पड़ता है। बसों के किराए, ट्रकों के ढुलाई की कीमत बढ़ेगी तो सब्जी, दूध और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ेंगी। इसलिए पेट्रोल-डीजल के दाम भले ही 90 पैसे ही बढ़ा किन्तु चक्रीय प्रभाव के कारण उपभोक्ताओं को सेवाओं और वस्तुओं पर ज्यादा कीमतं7 चुकानी पड़ेंगी।
सच तो यह है कि मुद्रास्फीति और विकास दोनों एक साथ नहीं चलने को अच्छी अर्थव्यवस्था नहीं कहा जा सकता। आज की तारीख में भारत की आर्थिक विकास दर लगभग 7 प्रतिशत है जब थोक मूल्य सूचकांक देखें तो महंगाई दर 8.02 प्रतिशत हो गई। जब भारत की मुद्रास्फीति 3.5 प्रतिशत के नीचे रहती थी और जीडीपी यानि आर्थिक विकास दर 6.5 से 7.8 प्रतिशत तक रही तब भी मध्यमवगीय उपभोक्ता महंगाई की शिकायत करता था आज तो मामला बिल्कुल संवेदनशील हो गया है। आम उपभोक्ता के लिए बहुत ही मुश्किलें बढ़ने वाली हैं जबकि सरकार के लिए भी चुनौतियां बहुत विकराल हो चुकी है। मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के लिए ऐसी बीमारी है जो उसकी विदेशी मुद्रा को खाकर डकार जाती है और वह देश भुगतान संतुलन कायम रख पाने में असमर्थ होता है। रही भारत की बात तो आज की तारीख में भारत के पास भले ही विदेशी मुद्रा भण्डार 690 बिलियन डालर मौजूद है किन्तु इसी तरह विश्व बाजार में तेल की कीमतों में आग लगी रहेगी तो देश का चालू वित्तीय घाटा आसमान पर होगा। ऐसी बीमार अर्थव्यवस्था से भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के सामने मुश्किल खड़ी हो जाएगी।
बहरहाल सरकार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में स्थिरता लाने के तीन तरह के कदम उठाने होंगे। पहला तो तात्कालिक। इसके तहत रूस से ज्यादा से ज्यादा तेल खरीदे और कोशिश करे कि अपने विदेशी मुद्रा पर भुगतान का दबाव कम से कम पड़े। दूसरा है दीर्घकालीन व्यवस्था। इसके तहत सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों का टंटा ही खत्म करना होगा। ग्रीन एनजी और सौर ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा वाहनों में इस्तेमाल हो, इस लक्ष्य को हासिल करने का प्रयास होना चाहिए। तीसरा है एहतियात के तौर पर प्रयास होना चाहिए कि निजी वाहनों की बजाए लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें।
लब्बोलुआब यह है कि ईरान अमेरिका युद्ध के कारण दुनिया को महंगाई की मुसीबतों से बच पाना असंभव है। इसलिए सरकार को बहुत सावधानी से भुगतान संतुलन, चालू वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखने तथा आम उपभोक्ता को राहत देने के लिए बहुत ही सावधानी से वित्तीय नीतियों का निर्धारण एवं उनका अनुशरण करना होगा अन्यथा देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने के गंभीर परिणाम होंगे ऐसे में जब उपभोक्ता ठन-ठन गोपाल होगा तो कारोबार ठप होंगे और अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है। इसीलिए सरकार को बड़ी सावधानी से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के बारे में विचार करना होगा। चूंकि यह संकट हमारे देश की सरकार द्वारा पैदा किया हुआ नहीं है और यह कब तक चलेगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए उपभोक्ता भी सेवाएं एवं वस्तुओं का इस्तेमाल अनावश्यक करने से बचें ताकि देश का रिजर्व समाप्त न हो अथवा खतरनाक रूप से सीमित न हो।
दरअसल पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों का उपभोक्ताओं पर सापेक्ष प्रभाव पड़ता है। बसों के किराए, ट्रकों के ढुलाई की कीमत बढ़ेगी तो सब्जी, दूध और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ेंगी। इसलिए पेट्रोल-डीजल के दाम भले ही 90 पैसे ही बढ़ा किन्तु चक्रीय प्रभाव के कारण उपभोक्ताओं को सेवाओं और वस्तुओं पर ज्यादा कीमतं7 चुकानी पड़ेंगी।
सच तो यह है कि मुद्रास्फीति और विकास दोनों एक साथ नहीं चलने को अच्छी अर्थव्यवस्था नहीं कहा जा सकता। आज की तारीख में भारत की आर्थिक विकास दर लगभग 7 प्रतिशत है जब थोक मूल्य सूचकांक देखें तो महंगाई दर 8.02 प्रतिशत हो गई। जब भारत की मुद्रास्फीति 3.5 प्रतिशत के नीचे रहती थी और जीडीपी यानि आर्थिक विकास दर 6.5 से 7.8 प्रतिशत तक रही तब भी मध्यमवगीय उपभोक्ता महंगाई की शिकायत करता था आज तो मामला बिल्कुल संवेदनशील हो गया है। आम उपभोक्ता के लिए बहुत ही मुश्किलें बढ़ने वाली हैं जबकि सरकार के लिए भी चुनौतियां बहुत विकराल हो चुकी है। मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था के लिए ऐसी बीमारी है जो उसकी विदेशी मुद्रा को खाकर डकार जाती है और वह देश भुगतान संतुलन कायम रख पाने में असमर्थ होता है। रही भारत की बात तो आज की तारीख में भारत के पास भले ही विदेशी मुद्रा भण्डार 690 बिलियन डालर मौजूद है किन्तु इसी तरह विश्व बाजार में तेल की कीमतों में आग लगी रहेगी तो देश का चालू वित्तीय घाटा आसमान पर होगा। ऐसी बीमार अर्थव्यवस्था से भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के सामने मुश्किल खड़ी हो जाएगी।
बहरहाल सरकार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में स्थिरता लाने के तीन तरह के कदम उठाने होंगे। पहला तो तात्कालिक। इसके तहत रूस से ज्यादा से ज्यादा तेल खरीदे और कोशिश करे कि अपने विदेशी मुद्रा पर भुगतान का दबाव कम से कम पड़े। दूसरा है दीर्घकालीन व्यवस्था। इसके तहत सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों का टंटा ही खत्म करना होगा। ग्रीन एनजी और सौर ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा वाहनों में इस्तेमाल हो, इस लक्ष्य को हासिल करने का प्रयास होना चाहिए। तीसरा है एहतियात के तौर पर प्रयास होना चाहिए कि निजी वाहनों की बजाए लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें।
लब्बोलुआब यह है कि ईरान अमेरिका युद्ध के कारण दुनिया को महंगाई की मुसीबतों से बच पाना असंभव है। इसलिए सरकार को बहुत सावधानी से भुगतान संतुलन, चालू वित्तीय घाटे को नियंत्रण में रखने तथा आम उपभोक्ता को राहत देने के लिए बहुत ही सावधानी से वित्तीय नीतियों का निर्धारण एवं उनका अनुशरण करना होगा अन्यथा देश की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने के गंभीर परिणाम होंगे ऐसे में जब उपभोक्ता ठन-ठन गोपाल होगा तो कारोबार ठप होंगे और अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है। इसीलिए सरकार को बड़ी सावधानी से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के बारे में विचार करना होगा। चूंकि यह संकट हमारे देश की सरकार द्वारा पैदा किया हुआ नहीं है और यह कब तक चलेगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए उपभोक्ता भी सेवाएं एवं वस्तुओं का इस्तेमाल अनावश्यक करने से बचें ताकि देश का रिजर्व समाप्त न हो अथवा खतरनाक रूप से सीमित न हो।