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लोकतंत्र अवसरवाद का नहीं जनादेश के सम्मान का माध्यम बने

प्रकाशित: 13-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
भारतीय लोकतंत्र में दल-बदल की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। वर्ष 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक अवसरवाद से रोकना और मतदाताओं के जनादेश की रक्षा करना था। लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता गया है कि कानून में मौजूद कुछ प्रावधानों का राजनीतिक दल और जनप्रतिनिधि अपने हित में उपयोग करते रहे हैं। हाल के घटपामों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या वर्तमान दल-बदल कानून लोकतंत्र और मतदाताओं की भावना की पर्याप्त रक्षा कर पा रहा है। तृणमूल कांग्रेस में चल रही राजनीतिक उठापटक और पार्टी के भीतर असंतोष की खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। पार्टी से अलग होने वाले नेताओं का तर्क है कि संगठन में उन्हें उचित महत्व नहीं दिया जा रहा है तथा नेतृत्व की कार्यशैली के कारण वे ऐसा कदम उठाने को मजबूर हुए हैं। किसी भी राजनीतिक दल के भीतर असहमति और मतभेद लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब निर्वाचित प्रतिनिधि जनता से प्राप्त जनादेश के आधार पर चुने जाने के बाद बीच कार्यकाल में अपनी राजनीतिक निष्ठा बदल लेते हैं और फिर भी विधायक या सांसद बने रहते हैं। वर्तमान दल-बदल कानून के अनुसार यदि किसी दल के दो-तिहाई विधायक या सांसद सामूहिक रूप से किसी दूसरे दल में विलय का निर्णय लेते हैं तो इसे वैध माना जाता है। यह प्रावधान मूल रूप से राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और बड़े समूहों के वैचारिक पुनर्गठन को मान्यता देने के उद्देश्य से रखा गया था, लेकिन व्यवहार में इसका उपयोग कई बार सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक समीकरण बदलने के साधन के रूप में होता दिखाई देता है। परिणाम स्वरूप मतदाता स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है क्योंकि उसने जिस पार्टी, विचारधारा और चुनावी कार्पाम के आधार पर प्रतिनिधि को चुना था, वह प्रतिनिधि बाद में किसी दूसरी राजनीतिक धारा का हिस्सा बन जाता है। यदि किसी दल के बड़ी संख्या में विधायक या सांसद पार्टी बदलते हैं और अपने पद पर बने रहते हैं, तो यह लोकतांत्रिक नैतिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है और निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के विश्वास के आधार पर सदन तक पहुंचते हैं। ऐसे में पार्टी बदलने के बाद भी पद पर बने रहना कई लोगों की दृष्टि में मतदाताओं के विश्वास और जनादेश का अपमान माना जा सकता है। इससे जनता के बीच राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास भी बढ़ता है। दल-बदल की घटनाओं का एक बड़ा प्रभाव राजनीतिक अस्थिरता के रूप में भी सामने आता है। कई राज्यों में सरकारों के गठन और पतन के पीछे दल-बदल प्रमुख कारण रहा है। इससे प्रशासनिक कार्य प्रभावित होते हैं, विकास कार्यों में बाधा आती है और जनता के मुद्दे राजनीतिक जोड़तोड़ के बीच पीछे छूट जाते हैं। इसके अतिरिक्त ऐसी परिस्थितियों में धनबल, पद के लालच और राजनीतिक दबाव जैसे आरोप भी लगते हैं, जो लोकतंत्र की साख को कमजोर करते हैं। वर्तमान कानून की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि दो-तिहाई वाला प्रावधान अब अपने मूल उद्देश्य से भटकता हुआ दिखाई देता है। इसके अलावा दल-बदल मामलों में निर्णय लेने की प्रािढया भी कई बार अत्यधिक लंबी हो जाती है। स्पीकर के समक्ष लंबित मामलों के कारण महीनों और कभी-कभी वर्षों तक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती। इससे कानून का प्रभाव भी कमजोर पड़ता है। समय आ गया है कि दल-बदल कानून की व्यापक समीक्षा की जाए। यदि कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़ना चाहता है तो उसके लिए सबसे उचित व्यवस्था यह हो सकती है कि वह पहले अपने पद से इस्तीफा दे और उसके बाद किसी अन्य दल में शामिल हो। इससे जनता को पुन यह अवसर मिलेगा कि वह उस प्रतिनिधि के निर्णय का समर्थन करती है या नहीं। इसी प्रकार दो-तिहाई वाले प्रावधान पर भी पुनर्विचार किया जाना चाहिए ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके। दल-बदल से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए और इस पर भी विचार होना चाहिए कि अंतिम निर्णय का अधिकार केवल स्पीकर के पास रहने के बजाय किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था या न्यायाधिकरण को दिया जाए। साथ ही जो जनप्रतिनिधि दल-बदल करते हैं, उन्हें तत्काल मंत्री पद या अन्य लाभ के पदों से वंचित रखने जैसे प्रावधान भी बनाए जा सकते हैं ताकि राजनीतिक लाभ के लिए दल-बदल की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जा सके। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास और जनादेश का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि बिना जनता की अनुमति लिए और बिना अपने पद से इस्तीफा दिए राजनीतिक निष्ठा बदलते रहते हैं, तो इससे लोकतांत्रिक मूल्यों को क्षति पहुंचती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि दल-बदल कानून को और अधिक मजबूत, पारदर्शी तथा जनहितकारी बनाया जाए, जिससे जनता का विश्वास कायम रहे और लोकतंत्र राजनीतिक अवसरवाद का नहीं बल्कि जनादेश के सम्मान का माध्यम बने।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।