जाति बीच जाति है जस केलन को पात: एक विश्लेषण
प्रकाशित: 03-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
वर्तमान समय में देश के वेंद्रीय विश्वविदृालयों में मात्र 7 ही वुलपति ऐसे हैं जो समाज के अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़े वर्ग से आते हैं।
सरकार और उच्च प्रशासनिक पदों, विश्वविदृालयों में आज भी प्रो़पेसर और बड़े प्रशासनिक पदों पर अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़े वर्ग की सहभागिता सरकारों के सामाजिक न्याय के दांवों को ठेंगा दिखाते हैं।
जाति बीच जाति है जस केलन को पात: एक विश्लेषण भारत का समाज जातियों का समाज है ऐसी ही वुछ युत्ति विदेशी चितकों और इंटेलेक्चुअल वर्ग द्वारा हम पर थोपी गईं। समाज में जाति है, और जाति है तो भेद भी है लेकिन यह तो स्पष्ट हो जाता है कि इस भेद का कोईं आधार नहीं है। इसी जाति को समझने का प्रयास इस लेख में किया गया है।
हम सबके मन में यह प्रश्न तो आता ही है कि यह आि़खर यह जाति है क्या? इसका उद्भव वैसे हुआ? इसके स्वरूप में परिवर्तन वैसेवैसे होता गया। चार वर्णो में विभिजित समाज वैसे 6700 जातियों में विभाजित हो गया। जिस भारतीय समाज को एकत्व के अर्थ में देखा जाता था वही भारत का समाज इतनी सारी जातियों में विभाजित हो गया। वही इसी अदहर पर विभिन्न मानव र्निमित जाति व्यवस्था के आधार पर समाज में सम्मान और असम्मान का विषय पैदा हो गया।
हम देखे की भारत में समाज की संकल्पना को समग्रता में देखा गया है, यही तो कारण है डॉ. अम्बेडकर जी भी समाज को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि समाज कोईं भीड़ का नाम नही है, किसी भय या किसी असामान्य परिस्थिति में संगठित समूह को हम समाज कह दे तो ऐसा नहीं है, समाज इस सबसे भिन्न है समाज का निर्माण ही बंधु भाव के आधार पर होता है, जब व्यत्तियो के सुखदु:ख एक हो वो अपने पड़ोसी के सुख में आनंद करे वही उसके दु:ख में ़खुद भी पीड़ा का अहसास करे ऐसे भाव के आधार पर ही समाज का निर्माण होता है।
इस प्रकार से समाज व्यत्ति व्यत्ति के बीच सहोदर होने के भाव से बनता है जब सब सहोदर तो फिर भेद कहाँ। लेकिन फिर भी सतगुरु रविदास जी को भारत के समाज में व्याप्त जातियों को केले के तने से तुलना करनी पड़ती है।
हमारा भारतीय समाज विविध जातियों व उपजातियों में बँटा हुआ है। इसमें ऊँच्च और निम्न का भाव इस पैमाने पर व्याप्त है कि किसी की परछाईं पड़ने मात्र से कोईं व्यत्ति अपवित्र हो जाता है। प्राचीन समाज में ब्राrाण सबसे अधिक आदर प्राप्त वर्ण था। यह स्थिति आज भी जस की तस बनी हुईं है।
पहले यह व्यवस्था कर्म पर आधारित थी तो भी लोग सन्तुष्ट हो जाते थे। परन्तु आज जाति अर्थात् जन्म के आधार पर यह व्यवस्था दी जाती है जो किसी भी रूप में स्वीकार्यं नहीं है।
उत्तर वैदिक काल में वुछ तथाकथित स्वाथा लोलुप लोगों ने अपने आत्मीय जनों को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए भारतीय सार्वभौमिकता की अक्षुण्ण परम्परा को ताक पर रखकर भारतीय समाज की पूरी की पूरी दिशा ही बदल दी।
प्राचीन समाज में जितनी समानता और पारस्परिक सौहाद्र्र की बात कही गयी है आज उसका एकदम विपरीत स्वरूप देखने को मिलता सम्पूर्ण भारतीय दर्शन में कर्म के सिद्धान्त को सवरेपरि माना गया है। यहाँ तक कि यह भी कह दिया गया है कि कर्म में प्रवृत्त कराना ही वेदों की सार्थकता है।
जब से कर्मवाद की भावना ने जाति का रूप धारण कर लिया तभी से भारतीय समाज का स्वरूप और अधिक नीचे गिरता चला गया।
समाज में व्याप्त जातियों के मकडजाल और उच्च नीच के भाव ने समाज को कभी एकता के सूत्र में बँधने ही नहीं दिया। प्राचीन वर्णव्यवस्था के कर्म आधारित होने के बावजूद समाज के वुछ स्वाथा पाखण्डी लोगों ने इसे जन्म पर आधारित बता इतना प्रचार प्रसार किया कि यही सत्य माना जाने लगा। परन्तु भारतीय दर्शन में सत्य का महत्त्व अधिकाधिक रहा है।
जबकि स्वयं भगवान वृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है कि चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: की बात कही।
इसके अर्थ को यदि देखा जाये तो भगवान वृष्ण कहते है कि मेरे द्वारा ही गुणों और कर्मो के विभागपूर्वक चारों वर्णो की रचना की गयी है।
जब भगवान ने कोईं भेद नहीं किया तो इंसानों ने ऐसा क्यूँ किया।
मनु कहते हैं-जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राrाण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। जिस तरह समाज में गिरवाट आयी, विखण्डनकारी शत्तियों का उद्भव हुआ उसी तरह समाज में कबीर, रविदास, चोखेमेला, गुरु नानक जैसे सन्त परम्परा के अनेकों सन्तों का भी जन्म हुआ। वही समाज सुधारक भी उभर कर आये दयानन्द सरस्वती, ज्योतिबा पुले, छत्रपति साहू जी महाराज, महादेव गोविद रानाडे, वीर सावरकर, डॉ. भीमराव राम जी अम्बेडकर, जैसे मनीषियों का भी जन्म हुआ।
जिन्होंने इस वुत्सित और भ्रष्ट व्यवस्था का प्रतिकार किया और भारतीय संस्वृति को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया। जब हम प्राचीन शिक्षाव्यवस्था पर विचार करते हैं तो सहसा ही मन में यह प्रश्न आता है कि क्या ये शिक्षा शूद्रो को मिलती थी। तब उत्तर मिलता हैं की वैदिक काल में तो सभी वर्णो के साथ शूद्रो को भी शिक्षा का समान अधिकार था।
क्योंकि वहाँ वर्ण के आधार पर किसी को शिक्षा से वंचित नहीं किया गया है, परन्तु बाद के समय में ये शिक्षा और आश्रम तथा गुरुओ का भी विभाजन हो गया।
अब यह आश्रम राज परिवार और आम जन के लिए और शूद्र और अन्य वर्णो में ये बट गया। वैदिक काल में शिक्षा का अधिकार सभी को प्राप्त था इसकी सन्तुति डॉ. अम्बेडकर ने भी की है छंदोगयोउपनिषद (6-1-2) की एक कथा है शूद्र रेकव ने वेदध्यान कराया इससे भी बढ़ कर यह बात हैं की कवश एलशू त्रषि शूद्र थे।
उपरोत्त और त्रग्वेद के दसवें मण्डल के तमाम श्लोकों के रचयिता खुद एलेशू ही हैं। त्रषि परम्परा के श्रेष्ठ त्रषि मतंग शूद्र (चांडाल) ही थे। परन्तु वेदिक कल के बाद शिक्षा का अधिकार शूद्रो से छीन लिया गया। इसी ब्रrाचर्यं आश्रम का संबंध कईं संस्कारो से था जिसमें से ‘‘उपनयन संस्कार’’
प्रमुख था। इस उपनयन का पहले अधिकार गुरु को था बाद में इसका अधिकार पिता को प्राप्त हो गया।
वर्ण व्यवस्था का जन्मना आधार अब यही से प्रारंभ भी हो गया क्यूकि गुरु द्वारा शिक्षाथा के शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत वर्ण का निर्धारण होता था। वही अब पिता गुरुवुल में भेजने से पहले वर्ण तय करके भेजने लगा। इसी जन्मना आधारित वर्ण का भ्रष्टतमरूप हमे जाति के रूप में दिखा। जिस भारत को आर्यं जाति, हिन्दू जाति के रहने वाले जन समूह की भूमि के रूप में जाना जाता था।
वही जाति जिसके बारे बी बद्रीशाह टुलधारिया जैसे समाजविद ने मनुष्य जाति, जानवर जाति और पेड़ो की जाति आदि कहा है। उसी जाति को मनुष्यों के बीच भेद के रूप में देखा जाने लगा। इसी जाति से जातिवाद आया जिसने विशाल हिन्दू समाज के भीतर कईं स्पष्ट एवं अस्पष्ट रेखाओ को उकेर दिया।
इस जाति व्यवस्था के दुष्परिणामों को देखे तो भारत की अवनीति का यह प्रमुख कारक के रूप में जाना जाएगा।
डॉ. अम्बेडकर लिखते हैं कि जाति भावनाओं से आर्थिक विकास रुकता है, इससे वे स्थितियाँ पैदा होती हैं जो वृषि तथा अन्य क्षेत्रों में सामूहिक प्रयत्नों के विरुद्ध हैं। जात-पात के रहते ग्रामीण विकास समाजवादी सिद्धान्तों के विरुद्ध रहेगा। जातीय असमानता एवं ऊँच-नीच की भावना ने सभी के मन में एक-दूसरे के प्रति आाोश भर दिया। इस जातीय असमानता ने भारतीय समाज में वैमनस्यता को पैलाने का काम किया है।
यह वैमनस्यता जब तक भारतीय समाज का हिस्सा रहेगी, तब तक हमारी चुनौतियाँ कम नहीं होंगी। भारतवर्ष की समुन्नति में जितनी भी बाधाएँ सामने आईं हैं, उनमें जातीय असमानता एक प्रमुख कारण है। जातिव्यवस्था ने विविध प्रतिभाओं का हनन किया है।
भारत में जाति और उसके आधार पर समाज भेद और उत्पीड़न ने भारत को वर्षो की अधीनता दी है।
आज भी भारत का समाज इतिहास से सीख न लेकर समाज में असंतोष का निर्माण ही कर रहा है। आज भी देश भर में पीछे छूटे समाज को हिस्सेदरी नहीं मिल पा रही है, सरकारे बदली पर दस्तूर वही है।
वर्तमान समय में देश के वेंद्रीय विश्वविदृालयो में मात्र 7 ही वुलपति ऐसे है जो समाज के अनुसूचित जाति जनजाति एवँ पिछड़े वर्ग से आते है। सरकार और उच्च प्रशासनिक पदो, विश्वविदृालयों में आज भी प्रो़पेसर और बड़े प्रशासनिक पदो पर अनुसूचित जाति जनजाति एवँ पिछड़े वर्ग की सहभागिता सरकारों के सामाजिक न्याय के दाँवों को ठेंगा दिखाते हैं।
(लेखक सहायक प्रोपेसर, तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का केन्द्र, स्वूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविदृालय नईं दिल्ली।)
सरकार और उच्च प्रशासनिक पदों, विश्वविदृालयों में आज भी प्रो़पेसर और बड़े प्रशासनिक पदों पर अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़े वर्ग की सहभागिता सरकारों के सामाजिक न्याय के दांवों को ठेंगा दिखाते हैं।
जाति बीच जाति है जस केलन को पात: एक विश्लेषण भारत का समाज जातियों का समाज है ऐसी ही वुछ युत्ति विदेशी चितकों और इंटेलेक्चुअल वर्ग द्वारा हम पर थोपी गईं। समाज में जाति है, और जाति है तो भेद भी है लेकिन यह तो स्पष्ट हो जाता है कि इस भेद का कोईं आधार नहीं है। इसी जाति को समझने का प्रयास इस लेख में किया गया है।
हम सबके मन में यह प्रश्न तो आता ही है कि यह आि़खर यह जाति है क्या? इसका उद्भव वैसे हुआ? इसके स्वरूप में परिवर्तन वैसेवैसे होता गया। चार वर्णो में विभिजित समाज वैसे 6700 जातियों में विभाजित हो गया। जिस भारतीय समाज को एकत्व के अर्थ में देखा जाता था वही भारत का समाज इतनी सारी जातियों में विभाजित हो गया। वही इसी अदहर पर विभिन्न मानव र्निमित जाति व्यवस्था के आधार पर समाज में सम्मान और असम्मान का विषय पैदा हो गया।
हम देखे की भारत में समाज की संकल्पना को समग्रता में देखा गया है, यही तो कारण है डॉ. अम्बेडकर जी भी समाज को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि समाज कोईं भीड़ का नाम नही है, किसी भय या किसी असामान्य परिस्थिति में संगठित समूह को हम समाज कह दे तो ऐसा नहीं है, समाज इस सबसे भिन्न है समाज का निर्माण ही बंधु भाव के आधार पर होता है, जब व्यत्तियो के सुखदु:ख एक हो वो अपने पड़ोसी के सुख में आनंद करे वही उसके दु:ख में ़खुद भी पीड़ा का अहसास करे ऐसे भाव के आधार पर ही समाज का निर्माण होता है।
इस प्रकार से समाज व्यत्ति व्यत्ति के बीच सहोदर होने के भाव से बनता है जब सब सहोदर तो फिर भेद कहाँ। लेकिन फिर भी सतगुरु रविदास जी को भारत के समाज में व्याप्त जातियों को केले के तने से तुलना करनी पड़ती है।
हमारा भारतीय समाज विविध जातियों व उपजातियों में बँटा हुआ है। इसमें ऊँच्च और निम्न का भाव इस पैमाने पर व्याप्त है कि किसी की परछाईं पड़ने मात्र से कोईं व्यत्ति अपवित्र हो जाता है। प्राचीन समाज में ब्राrाण सबसे अधिक आदर प्राप्त वर्ण था। यह स्थिति आज भी जस की तस बनी हुईं है।
पहले यह व्यवस्था कर्म पर आधारित थी तो भी लोग सन्तुष्ट हो जाते थे। परन्तु आज जाति अर्थात् जन्म के आधार पर यह व्यवस्था दी जाती है जो किसी भी रूप में स्वीकार्यं नहीं है।
उत्तर वैदिक काल में वुछ तथाकथित स्वाथा लोलुप लोगों ने अपने आत्मीय जनों को अनुचित लाभ पहुँचाने के लिए भारतीय सार्वभौमिकता की अक्षुण्ण परम्परा को ताक पर रखकर भारतीय समाज की पूरी की पूरी दिशा ही बदल दी।
प्राचीन समाज में जितनी समानता और पारस्परिक सौहाद्र्र की बात कही गयी है आज उसका एकदम विपरीत स्वरूप देखने को मिलता सम्पूर्ण भारतीय दर्शन में कर्म के सिद्धान्त को सवरेपरि माना गया है। यहाँ तक कि यह भी कह दिया गया है कि कर्म में प्रवृत्त कराना ही वेदों की सार्थकता है।
जब से कर्मवाद की भावना ने जाति का रूप धारण कर लिया तभी से भारतीय समाज का स्वरूप और अधिक नीचे गिरता चला गया।
समाज में व्याप्त जातियों के मकडजाल और उच्च नीच के भाव ने समाज को कभी एकता के सूत्र में बँधने ही नहीं दिया। प्राचीन वर्णव्यवस्था के कर्म आधारित होने के बावजूद समाज के वुछ स्वाथा पाखण्डी लोगों ने इसे जन्म पर आधारित बता इतना प्रचार प्रसार किया कि यही सत्य माना जाने लगा। परन्तु भारतीय दर्शन में सत्य का महत्त्व अधिकाधिक रहा है।
जबकि स्वयं भगवान वृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है कि चातुर्वण्र्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: की बात कही।
इसके अर्थ को यदि देखा जाये तो भगवान वृष्ण कहते है कि मेरे द्वारा ही गुणों और कर्मो के विभागपूर्वक चारों वर्णो की रचना की गयी है।
जब भगवान ने कोईं भेद नहीं किया तो इंसानों ने ऐसा क्यूँ किया।
मनु कहते हैं-जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राrाण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। जिस तरह समाज में गिरवाट आयी, विखण्डनकारी शत्तियों का उद्भव हुआ उसी तरह समाज में कबीर, रविदास, चोखेमेला, गुरु नानक जैसे सन्त परम्परा के अनेकों सन्तों का भी जन्म हुआ। वही समाज सुधारक भी उभर कर आये दयानन्द सरस्वती, ज्योतिबा पुले, छत्रपति साहू जी महाराज, महादेव गोविद रानाडे, वीर सावरकर, डॉ. भीमराव राम जी अम्बेडकर, जैसे मनीषियों का भी जन्म हुआ।
जिन्होंने इस वुत्सित और भ्रष्ट व्यवस्था का प्रतिकार किया और भारतीय संस्वृति को पुन: स्थापित करने का प्रयास किया। जब हम प्राचीन शिक्षाव्यवस्था पर विचार करते हैं तो सहसा ही मन में यह प्रश्न आता है कि क्या ये शिक्षा शूद्रो को मिलती थी। तब उत्तर मिलता हैं की वैदिक काल में तो सभी वर्णो के साथ शूद्रो को भी शिक्षा का समान अधिकार था।
क्योंकि वहाँ वर्ण के आधार पर किसी को शिक्षा से वंचित नहीं किया गया है, परन्तु बाद के समय में ये शिक्षा और आश्रम तथा गुरुओ का भी विभाजन हो गया।
अब यह आश्रम राज परिवार और आम जन के लिए और शूद्र और अन्य वर्णो में ये बट गया। वैदिक काल में शिक्षा का अधिकार सभी को प्राप्त था इसकी सन्तुति डॉ. अम्बेडकर ने भी की है छंदोगयोउपनिषद (6-1-2) की एक कथा है शूद्र रेकव ने वेदध्यान कराया इससे भी बढ़ कर यह बात हैं की कवश एलशू त्रषि शूद्र थे।
उपरोत्त और त्रग्वेद के दसवें मण्डल के तमाम श्लोकों के रचयिता खुद एलेशू ही हैं। त्रषि परम्परा के श्रेष्ठ त्रषि मतंग शूद्र (चांडाल) ही थे। परन्तु वेदिक कल के बाद शिक्षा का अधिकार शूद्रो से छीन लिया गया। इसी ब्रrाचर्यं आश्रम का संबंध कईं संस्कारो से था जिसमें से ‘‘उपनयन संस्कार’’
प्रमुख था। इस उपनयन का पहले अधिकार गुरु को था बाद में इसका अधिकार पिता को प्राप्त हो गया।
वर्ण व्यवस्था का जन्मना आधार अब यही से प्रारंभ भी हो गया क्यूकि गुरु द्वारा शिक्षाथा के शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत वर्ण का निर्धारण होता था। वही अब पिता गुरुवुल में भेजने से पहले वर्ण तय करके भेजने लगा। इसी जन्मना आधारित वर्ण का भ्रष्टतमरूप हमे जाति के रूप में दिखा। जिस भारत को आर्यं जाति, हिन्दू जाति के रहने वाले जन समूह की भूमि के रूप में जाना जाता था।
वही जाति जिसके बारे बी बद्रीशाह टुलधारिया जैसे समाजविद ने मनुष्य जाति, जानवर जाति और पेड़ो की जाति आदि कहा है। उसी जाति को मनुष्यों के बीच भेद के रूप में देखा जाने लगा। इसी जाति से जातिवाद आया जिसने विशाल हिन्दू समाज के भीतर कईं स्पष्ट एवं अस्पष्ट रेखाओ को उकेर दिया।
इस जाति व्यवस्था के दुष्परिणामों को देखे तो भारत की अवनीति का यह प्रमुख कारक के रूप में जाना जाएगा।
डॉ. अम्बेडकर लिखते हैं कि जाति भावनाओं से आर्थिक विकास रुकता है, इससे वे स्थितियाँ पैदा होती हैं जो वृषि तथा अन्य क्षेत्रों में सामूहिक प्रयत्नों के विरुद्ध हैं। जात-पात के रहते ग्रामीण विकास समाजवादी सिद्धान्तों के विरुद्ध रहेगा। जातीय असमानता एवं ऊँच-नीच की भावना ने सभी के मन में एक-दूसरे के प्रति आाोश भर दिया। इस जातीय असमानता ने भारतीय समाज में वैमनस्यता को पैलाने का काम किया है।
यह वैमनस्यता जब तक भारतीय समाज का हिस्सा रहेगी, तब तक हमारी चुनौतियाँ कम नहीं होंगी। भारतवर्ष की समुन्नति में जितनी भी बाधाएँ सामने आईं हैं, उनमें जातीय असमानता एक प्रमुख कारण है। जातिव्यवस्था ने विविध प्रतिभाओं का हनन किया है।
भारत में जाति और उसके आधार पर समाज भेद और उत्पीड़न ने भारत को वर्षो की अधीनता दी है।
आज भी भारत का समाज इतिहास से सीख न लेकर समाज में असंतोष का निर्माण ही कर रहा है। आज भी देश भर में पीछे छूटे समाज को हिस्सेदरी नहीं मिल पा रही है, सरकारे बदली पर दस्तूर वही है।
वर्तमान समय में देश के वेंद्रीय विश्वविदृालयो में मात्र 7 ही वुलपति ऐसे है जो समाज के अनुसूचित जाति जनजाति एवँ पिछड़े वर्ग से आते है। सरकार और उच्च प्रशासनिक पदो, विश्वविदृालयों में आज भी प्रो़पेसर और बड़े प्रशासनिक पदो पर अनुसूचित जाति जनजाति एवँ पिछड़े वर्ग की सहभागिता सरकारों के सामाजिक न्याय के दाँवों को ठेंगा दिखाते हैं।
(लेखक सहायक प्रोपेसर, तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का केन्द्र, स्वूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविदृालय नईं दिल्ली।)