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डिगता विश्वास

प्रकाशित: 03-05-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
डिगता विश्वास
डिगता विश्वास सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को टीएमसी से कहा कि मतगणना कर्मचारियों के तौर पर केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को तैनात करने के सम्बन्ध में चुनाव आयोग का सर्वुलर नियमों के विपरीत नहीं है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में तृणमूल कांग्रेस ने एक याचिका दायर करके मांग की थी कि पश्चिम बंगाल में वोटों की गिनती के लिए केन्द्र सरकार के कर्मचारियों जिनमें पीएसयू के लोग भी शामिल हैं उन्हें शामिल न किया जाए। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयोग मतगणना कर्मचारियों के चुनने के मामले में अपनी सीमा के भीतर है। मतलब यह कि चुनाव आयोग मतगणना कर्मियों को सिर्प एक ही पूल यानि केन्द्र सरकार से चुन सकती है और यह सर्वुलर गलत नहीं कहा जा सकता।
सच तो यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में जब तक संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा नहीं किया जाएगा तब तक लोकतंत्र के प्रति जनधारणा में मजबूती नहीं आती। यदि संस्थाओं में किसी तरह की कोईं कमजोरी या विकार आता है तो न्यायपालिका उसको नसीहत दे सकता है और सरकार को निदर्ेेश देता है कि सुधार के लिए जो भी प्रयास संभव हों किए जाएं।
सरकार और विधायिका भी समय-समय पर अपनी तरफ से संवैधानिक संस्थाओं में सुधार के लिए प्रयास करते हैं। खुद संवैधानिक संस्थाएं भी समयानुसार अपने स्ट्रक्चर एवं कार्यंशैली के सन्नियमों में बदलाव की सिफारिशें करती रहती हैं। फिर भी राजनीतिक दलों को यदि शिकायत हो तो वह संसद और न्यायपालिका में शिकायत के लिए स्वतंत्र है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने अपने चुनाव आयोग में जितना सुधार किया है, संभवत: विश्व के जाने-माने लोकतांत्रिक देशों ने भी नहीं किया है। जिस देश में तीन-तीन चुनाव आयुक्त हों और सभी के अधिकार समान हों, वहां जब चुनाव आयोग की नीयत पर सवाल उठाए जाते हैं तो इसके दो ही कारण हो सकते हैं, पहला मूर्खतापूर्ण या फिर शरारतपूर्ण सुप्रीम कोर्ट का पैसला तो संवैधानिक भावनाओं के अनुरूप है किन्तु केन्द्र सरकार और पीएसयू के कर्मियों से यदि किसी को आपत्ति है तो उसे अपनी पाटी के प्रतिनिधियों पर तो भरोसा करना चाहिए।
बहरहाल जब कोईं भी अपने पर भरोसा खो देता है तो उसे अपनी छाया से भी डर लगने लगता है। इसीलिए संदेह होता है कि कहीं टीएमसी नेतृत्व को लगने लगा है कि 2026 का चुनाव उनके हाथ से निकल रहा है।
बदलता भूराजनीतिक परिदृश्य
यह कोईं सामान्य घटना नहीं है कि एकतरफ संयुक्त अरब अमीरात (यूएईं) ने ओपेक यानि तेली बिरादरी की सदस्यता छोड़ी तो वहीं दूसरी तरफ सदस्यता छोड़ने से पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर सऊदी अरब के साथ तनाव के बीच मदद मांगी। सबसे बड़ी बात तो यह कि इजरायल ने यूएईं में अपनी फौज, डिपेंस सिस्टम के तीन उपकरण शनिवार को भेज कर स्पष्ट कर दिया कि अब मुस्लिम जगत का पहला देश यूएईं की सुरक्षा की जिम्मेदारी वह निभाएगा।
इसका मतलब साफ है कि न सिर्प ओपेक में पूट पड़ी बल्कि अरब देशों का बिखराव खुल कर सामने आ गया है। इससे ज्यादा बड़ी बात यह है कि यूएईं जितना ईंरान से चिढ़ा है, उतना ही वह सऊदी अरब की दादागिरी से भी परेशान है। यूएईं ने एक और बड़ा काम किया है जिसका भू-राजनीतिक मामले में बहुत महत्व है। असल में वह भारत के साथ अपनी नजदीकियां तो बढ़ा ही रहा था इसी बीच पाकिस्तान की धूर्तता से परेशान होकर ही पैसले लिए। पहला यह कि पाकिस्तान को दिए अपने कर्ज को वापस मांग लिया और अपने देश में कार्यंरत पाकिस्तानी नागरिकोंे की हजारों में सेवा समाप्त कर दी। इसका सीधा मतलब है कि अब यूएईं मुस्लिम देशों के मकड़जाल से अलग होकर अपनी भू-राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में लगा है और यह भारत के लिए अरब देशों में शक्ति संतुलन में भूमिका निभाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण अवसर है।