सूचना व्रांति के आदि संचारक देर्वषि नारद
प्रकाशित: 03-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
आज सूचना व्रांति के दौर में जब सूचना की रफ्तार इंटरनेट और सोशल मीडिया से तय हो रही है एवं सोशल मीडिया पर हर सेवंड लाखों खबरें, रील्स और पोस्ट वायरल हो रही हैं, तब यह सवाल दिलचस्प लगता है कि क्या प्राचीन काल में भी ऐसा कोईं संचार तंत्र था? इसका उत्तर पौराणिक कथाओं में ही मिलता है।
पौराणिक संदर्भो में देर्वषि नारद का व्यत्तित्व इस सवाल का सटीक जवाब प्रस्तुत करता है। उन्हें केवल एक त्रषि या भत्त के रूप में नहीं, बल्कि सूचना और संवाद के प्राचीन वाहक के रूप में भी देखा जाता रहा है। धरमिक कथा कहानियों के अनुसार ब्रrा जी के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के परम भत्त नारद मुनि तीनों लोकों, स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में निर्बाध विचरण करते थे। वे जहां भी जाते, वहां की घटनाओं, परिस्थितियों और संदेशों को एकत्र कर दूसरे स्थान तक पहुंचाते। यह कार्यं आधुनिक पत्रकारिता की मूल परिभाषा से काफी हद तक मेल खाता है, सूचना जुटाना, उसका संप्रेषण करना और समाज को प्रभावित करना। नारद मुनि की सबसे प्रमुख खासियत उनकी निष्पक्षता और गतिशीलता थी। वे देवताओं, असुरों और मनुष्यों सभी के बीच समान रूप से संवाद स्थापित करते थे। उनकी वीणा केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि संदेश प्रसार का माध्यम भी थी। यह आज के मोबाइल फोन और वैमरे की तरह उपयोगी थी। वे कथाओं और भजनों के जरिए सूचनाएं इस तरह प्रस्तुत करते थे कि वे जनमानस में गहराईं तक उतर जाएं। वुछ वैसा ही जैसा आज पॉडकास्ट या वायरल वंटेंट करता है। आधुनिक भाषा में कहें तो वे वायरल न्यूज मेकर थे, जिनकी एक खबर पूरे ब्रrांड में तुरंत पैलकर आज की तरह वायरल हो जाती थी।
पौराणिक कथाओं में ऐसे कईं उदाहरण मिलते हैं जो उनकी पत्रकारिता के विविध रूपों को स्पष्ट करते हैं। जैसे एक प्रसंग में वे मर्हषि बाल्मीकि के आश्रम पहुंचकर उन्हें राम कथा सुनाते हैं। यही कथा आगे चलकर रामायण जैसे महाकाव्य की प्रेरणा बन जाती है। यह घटना आधुनिक संदर्भ में एक ‘डिटेल्ड फीचर स्टोरी’ या ‘ब्रेकिग न्यू़ज’ की तरह देखी जा सकती है, जिसने इतिहास रच दिया।
इसी तरह महाभारत काल में नारद मुनि ने पांडवों और कौरवों दोनों पक्षों के बीच संवाद और सूचना का आदान-प्रदान किया। उन्होंने युधिष्ठिर को राज्य नीति और धर्म के विषय में सलाह दी, वहीं दूसरी ओर कौरवों की स्थिति का भी आकलन किया। यह भूमिका आज के इन्वेस्टिगेटिव पत्रकार से कम नहीं लगती। नारद मुनि केवल सूचना वाहक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक संवेदना के प्रतिनिधि भी थे। उन्होंने भत्त प्रह्लाद और ध्रुव जैसे पात्रों को भत्ति का मार्ग दिखाया और उनकी स्थिति को देवताओं तक पहुंचाया। यह आधुनिक पत्रकारिता के उस पहलू से मेल खाता है, जहां मीडिया कमजोर और वंचित वर्ग की आवा़ज बनता है।
(लेखक पीआईंबी शिमला में सहायक निदेशक हैं।
पौराणिक संदर्भो में देर्वषि नारद का व्यत्तित्व इस सवाल का सटीक जवाब प्रस्तुत करता है। उन्हें केवल एक त्रषि या भत्त के रूप में नहीं, बल्कि सूचना और संवाद के प्राचीन वाहक के रूप में भी देखा जाता रहा है। धरमिक कथा कहानियों के अनुसार ब्रrा जी के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के परम भत्त नारद मुनि तीनों लोकों, स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में निर्बाध विचरण करते थे। वे जहां भी जाते, वहां की घटनाओं, परिस्थितियों और संदेशों को एकत्र कर दूसरे स्थान तक पहुंचाते। यह कार्यं आधुनिक पत्रकारिता की मूल परिभाषा से काफी हद तक मेल खाता है, सूचना जुटाना, उसका संप्रेषण करना और समाज को प्रभावित करना। नारद मुनि की सबसे प्रमुख खासियत उनकी निष्पक्षता और गतिशीलता थी। वे देवताओं, असुरों और मनुष्यों सभी के बीच समान रूप से संवाद स्थापित करते थे। उनकी वीणा केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि संदेश प्रसार का माध्यम भी थी। यह आज के मोबाइल फोन और वैमरे की तरह उपयोगी थी। वे कथाओं और भजनों के जरिए सूचनाएं इस तरह प्रस्तुत करते थे कि वे जनमानस में गहराईं तक उतर जाएं। वुछ वैसा ही जैसा आज पॉडकास्ट या वायरल वंटेंट करता है। आधुनिक भाषा में कहें तो वे वायरल न्यूज मेकर थे, जिनकी एक खबर पूरे ब्रrांड में तुरंत पैलकर आज की तरह वायरल हो जाती थी।
पौराणिक कथाओं में ऐसे कईं उदाहरण मिलते हैं जो उनकी पत्रकारिता के विविध रूपों को स्पष्ट करते हैं। जैसे एक प्रसंग में वे मर्हषि बाल्मीकि के आश्रम पहुंचकर उन्हें राम कथा सुनाते हैं। यही कथा आगे चलकर रामायण जैसे महाकाव्य की प्रेरणा बन जाती है। यह घटना आधुनिक संदर्भ में एक ‘डिटेल्ड फीचर स्टोरी’ या ‘ब्रेकिग न्यू़ज’ की तरह देखी जा सकती है, जिसने इतिहास रच दिया।
इसी तरह महाभारत काल में नारद मुनि ने पांडवों और कौरवों दोनों पक्षों के बीच संवाद और सूचना का आदान-प्रदान किया। उन्होंने युधिष्ठिर को राज्य नीति और धर्म के विषय में सलाह दी, वहीं दूसरी ओर कौरवों की स्थिति का भी आकलन किया। यह भूमिका आज के इन्वेस्टिगेटिव पत्रकार से कम नहीं लगती। नारद मुनि केवल सूचना वाहक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक संवेदना के प्रतिनिधि भी थे। उन्होंने भत्त प्रह्लाद और ध्रुव जैसे पात्रों को भत्ति का मार्ग दिखाया और उनकी स्थिति को देवताओं तक पहुंचाया। यह आधुनिक पत्रकारिता के उस पहलू से मेल खाता है, जहां मीडिया कमजोर और वंचित वर्ग की आवा़ज बनता है।
(लेखक पीआईंबी शिमला में सहायक निदेशक हैं।