डॉ. अम्बेडकर जी की दृष्टि को पूर्ण करता विकसित भारत 2047 का लक्ष्य
प्रकाशित: 06-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. प्रवेश कुमार
भारत के संविधान के निर्माता पूज्य बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर जी ने कहाँ था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो। वर्तमान मोदी सरकार के द्वारा इसी सामाजिक लोकतत्र की मजबूती के प्रयास किए जा रहे है। इसी का परिणाम है कि आजादी के बाद भी 18000 से अधिक ग्रामों तक बिजली नहीं पहुँची थी। वहाँ तक बिजली पहुँचाने का काम सरकार द्वारा किया गया।
देश की बड़ी आबादी बैंकों से जुड़ी नहीं थी। इस समस्या को सरकार के द्वारा जनधन योजना के माध्यम से करोड़ों की संख्या में आम लोगो का बैंक खाता खोलकर पूर्ण किया गया। व्यक्ति की मूल आवश्यकताओ किन पूर्ति हेतु सरकार के द्वारा बहुत से प्रयास किए गये। इसी चरण में हम देखे की भारत वर्ष 2047 में अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्षों की यात्रा को पूर्ण करने जा रहा है। ऐसे में इस ऐतिहासिक पड़ाव में राष्ट्र का प्रत्येक गाँव, शहर, देश प्रत्येक कौने-कौने तक विकास धरातल तक पहुचें। इसी लक्ष्य को लिए देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ‘विकसित भारत 2047' का लक्ष्य दिया है। इसी दिशा में वर्तमान की सरकार द्वारा ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका प्रयास और सबका विश्वास' का यहाँ नारा दिया गया।
हम देखे यह नारा मात्र एक नारा नहीं है,अपितु पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर जी के उस मनोभाव की अभिव्यक्ति भी है। जिस मनोभाव, विचार ने उन्हें साउथबोरो समिति के सामने प्रतिनिधित्व की माँग के लिए अभिप्रेरणा दी। समाज में रहने वाले सभी वर्गों की हिस्सेदारी समाज के सभी संसाधनों में हो। इन संसाधनों के वितरण की क्या पद्धति हो इस से सम्बंधित नीति का निर्माण करने वाली समिति में उसका भी प्रतिनिधित्व हो। सब मिलकर अपने लिए नीतियों, योजनाओं का निर्माण करें। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर जी ने लोकतत्र को लोगो का, लोगो के लिए,लोगो के द्वारा किया जाने वाला शासन व्यवस्था माना। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर से पूर्व भारत दर्शन ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिना' के मूल विचार पर ही आधारित रहा है। यही बात तो प्रभु राम द्वारा समाज की संकल्पना को व्यक्त करते हुए बताया गया।
जब वह समाज को व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भ्रातृत्व के रूप में देखते है। सबका साथ, सबका विकास, सर्वजन हिताय - सर्वजन सुखाय भारत का मूल विचार रहा है। इसी बात को वर्तमान सरकार साकार करने के कार्य में निरन्तर प्रयासरत है। यही कुछ बात तो सतगुरु रविदास जी द्वारा अपने बेगमपुरा नगर के विचार में दिया गया। जहाँ वह कहते हैं, ‘बेगमपुर शहर का नाऊ। दुख अंदेश नहीं तिहि ठाऊ।। जिसका अर्थ है कि बेगमपुर शहर, जिसका नाम है, वहाँ पर किसी भी प्रकार के दुख का अंदेशा भी नहीं है। इसी प्रकार का ही विचार सतगुरु कबीर दास जी भी अपने प्रेमनगर के विचार में देते है। कबीर दास जी कहते है ‘प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय'। सतगुरु कबीर दास जी कहते है ‘प्रेम नगर में किसी का किसी से कोई बैर नहीं है ओर ना ही कोई ऊँच है, ना ही कोई नीच सभी सम्यक भाव के आधार पर समाज में रहते है। यही बात तो रामराज्य के विचार को व्यक्त करते हुए तुलसीदास जी कहते है की ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा?सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती'। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर ने समावेशी (घ्हम्त्ल्sग्न) और सुलभ (Aम्मेग्ंत) विकास की बात की। समावेशन एक भी कई प्रकार है जिसमे एक है सामाजिक यह सामाजिक समावेशन एक सशक्त समाज के लिए और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। समानता और बंधुत्व की नींव इसी सामाजिक समावेशन से जुड़ी है। डॉ. अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि जातिवाद और भेदभाव देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं।
विकसित भारत 2047 की परिकल्पना में सामाजिक समावेश का अर्थ एक ऐसे समाज से है, जहाँ किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी जाति, लिंग, धर्म या वर्ग के आधार पर भेदभाव न हो। जातिगत असमानता का अंत हो सभी का विकास की मुख्यधारा में सम्मिलन हो, समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति (दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग) तक सरकार की पहुँच होना अनिवार्य है। समाज में सभी के बीच सच्चा बंधुत्व हो, बाबासाहेब के अनुसार, बंधुत्व का अर्थ है समाज में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और भाईचारे की भावना से है। जब तक सामाजिक दूरी समाप्त नहीं होगी, तब तक देश अखंड रूप से विकसित नहीं हो सकता। इस दिशा में सरकार के द्वारा तमाम ऐतिहासिक निर्णय लिए गये जिसमे पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा देना, अनुसूचित जाति आयोग को अधिक मजबूत बनाना। सरकार में मत्रालयाओ से लेकर सचिवालयो तक समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी को सुनिश्चित करना। इस समावेशन में समाज में दिव्यांगजनों के हिस्सेदारी को भी सुनिश्चित करने का प्रयास सरकार के द्वारा किया गया है। दिव्यांगों को समाज में व्यापत सभी सुविधा सुलभ रूप से प्राप्त हो इसका प्रयास भी सरकार के द्वारा किया जा रहा है। एक विकसित राष्ट्र वही है जो अपने सबसे कमजोर नागरिक की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हो। डॉ. अंबेडकर ने हमेशा कमजोर वर्गों के अधिकारों की वकालत की।
समावेशी समाज के लिए ‘सुलभता' एक अनिवार्य शर्त है। इसी सामाजिक समावेशन में ही हम शिक्षा को शामिल करते है हम जानते है की एक मानव समाज के लिए शिक्षा आवश्यक अहर्ता है। बाबासाहेब ने नारा दिया द्गह्न-शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। उनका मानना था कि शिक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली हथियार है।
शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया गया। देशज ज्ञान परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर शिक्षा का प्रतिमान तैयार हो इस दिशा में सरकार महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। समाज में वंचित वर्गों के लिए कई प्रकार की छात्रवृतियों की संख्या में वृद्धि, यह शिक्षा के सभी स्तरों के साथ जुड़ी है। समाज के अनुसूचित जाति-जनजाति हेतु विदेश में जा कर शिक्षा प्राप्त करने हेतु छात्रवृति। सरकार का मानना है कि शिक्षा गुणवत्तापूर्ण होनी चाहिए। विकसित भारत में उच्च स्तर की शिक्षा को आधुनिक तकनीक (जैसे Aघ्, डिजिटल कौशल) से जोड़ना और इस सबका समाज के गरीब से गरीब बच्चे की पहुँच में होना चाहिए। इसी प्रकार से आर्थिक समावेशन का विषय है। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर जी ने आर्थिक समृद्धि, आर्थिक समावेशन की बात की थी। तभी तो बिरतानी सरकार से भारत के कमजोर समाज और विशेषकर महिलाओं को उद्यमी बनने हेतु आर्थिक सहायत उपलब्ध करने की वह मांग करते थे। वर्तमान सरकार के द्वारा वित्तीय समावेशन हेतु मुद्रा योजना और स्टार्टअप इकोसिस्टम विकसित किया गया है। हम क्या सोच सकते है की सरकार ने 10000 तक की भी वितीय सहायता ग़रीब लोगो को दी और उन बैंको ने दी जो कभी इलीट वर्ग तक सीमित थे। सरकार सोचती है की वंचित वर्गों को केवल रोजगार मांगने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला (उद्यमी) बनाना होगा। इसके लिए लाभ सुदूर गांवों तक पहुँचाना आवश्यक है। सबका प्रयास और सबका विकास सबका कल्याण, विश्व का कल्याण इस दिशा में भारत आगे बढ़ रहा है।
(लेखक सहायक प्रोफेसर, तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का केन्द्र, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली।)
भारत के संविधान के निर्माता पूज्य बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर जी ने कहाँ था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक समाज में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो। वर्तमान मोदी सरकार के द्वारा इसी सामाजिक लोकतत्र की मजबूती के प्रयास किए जा रहे है। इसी का परिणाम है कि आजादी के बाद भी 18000 से अधिक ग्रामों तक बिजली नहीं पहुँची थी। वहाँ तक बिजली पहुँचाने का काम सरकार द्वारा किया गया।
देश की बड़ी आबादी बैंकों से जुड़ी नहीं थी। इस समस्या को सरकार के द्वारा जनधन योजना के माध्यम से करोड़ों की संख्या में आम लोगो का बैंक खाता खोलकर पूर्ण किया गया। व्यक्ति की मूल आवश्यकताओ किन पूर्ति हेतु सरकार के द्वारा बहुत से प्रयास किए गये। इसी चरण में हम देखे की भारत वर्ष 2047 में अपनी स्वतंत्रता के 100 वर्षों की यात्रा को पूर्ण करने जा रहा है। ऐसे में इस ऐतिहासिक पड़ाव में राष्ट्र का प्रत्येक गाँव, शहर, देश प्रत्येक कौने-कौने तक विकास धरातल तक पहुचें। इसी लक्ष्य को लिए देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ‘विकसित भारत 2047' का लक्ष्य दिया है। इसी दिशा में वर्तमान की सरकार द्वारा ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका प्रयास और सबका विश्वास' का यहाँ नारा दिया गया।
हम देखे यह नारा मात्र एक नारा नहीं है,अपितु पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर जी के उस मनोभाव की अभिव्यक्ति भी है। जिस मनोभाव, विचार ने उन्हें साउथबोरो समिति के सामने प्रतिनिधित्व की माँग के लिए अभिप्रेरणा दी। समाज में रहने वाले सभी वर्गों की हिस्सेदारी समाज के सभी संसाधनों में हो। इन संसाधनों के वितरण की क्या पद्धति हो इस से सम्बंधित नीति का निर्माण करने वाली समिति में उसका भी प्रतिनिधित्व हो। सब मिलकर अपने लिए नीतियों, योजनाओं का निर्माण करें। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर जी ने लोकतत्र को लोगो का, लोगो के लिए,लोगो के द्वारा किया जाने वाला शासन व्यवस्था माना। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर से पूर्व भारत दर्शन ही ‘सर्वे भवन्तु सुखिना' के मूल विचार पर ही आधारित रहा है। यही बात तो प्रभु राम द्वारा समाज की संकल्पना को व्यक्त करते हुए बताया गया।
जब वह समाज को व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भ्रातृत्व के रूप में देखते है। सबका साथ, सबका विकास, सर्वजन हिताय - सर्वजन सुखाय भारत का मूल विचार रहा है। इसी बात को वर्तमान सरकार साकार करने के कार्य में निरन्तर प्रयासरत है। यही कुछ बात तो सतगुरु रविदास जी द्वारा अपने बेगमपुरा नगर के विचार में दिया गया। जहाँ वह कहते हैं, ‘बेगमपुर शहर का नाऊ। दुख अंदेश नहीं तिहि ठाऊ।। जिसका अर्थ है कि बेगमपुर शहर, जिसका नाम है, वहाँ पर किसी भी प्रकार के दुख का अंदेशा भी नहीं है। इसी प्रकार का ही विचार सतगुरु कबीर दास जी भी अपने प्रेमनगर के विचार में देते है। कबीर दास जी कहते है ‘प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा-परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय'। सतगुरु कबीर दास जी कहते है ‘प्रेम नगर में किसी का किसी से कोई बैर नहीं है ओर ना ही कोई ऊँच है, ना ही कोई नीच सभी सम्यक भाव के आधार पर समाज में रहते है। यही बात तो रामराज्य के विचार को व्यक्त करते हुए तुलसीदास जी कहते है की ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा?सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती'। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर ने समावेशी (घ्हम्त्ल्sग्न) और सुलभ (Aम्मेग्ंत) विकास की बात की। समावेशन एक भी कई प्रकार है जिसमे एक है सामाजिक यह सामाजिक समावेशन एक सशक्त समाज के लिए और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। समानता और बंधुत्व की नींव इसी सामाजिक समावेशन से जुड़ी है। डॉ. अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि जातिवाद और भेदभाव देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं।
विकसित भारत 2047 की परिकल्पना में सामाजिक समावेश का अर्थ एक ऐसे समाज से है, जहाँ किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी जाति, लिंग, धर्म या वर्ग के आधार पर भेदभाव न हो। जातिगत असमानता का अंत हो सभी का विकास की मुख्यधारा में सम्मिलन हो, समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति (दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग) तक सरकार की पहुँच होना अनिवार्य है। समाज में सभी के बीच सच्चा बंधुत्व हो, बाबासाहेब के अनुसार, बंधुत्व का अर्थ है समाज में एक-दूसरे के प्रति सम्मान और भाईचारे की भावना से है। जब तक सामाजिक दूरी समाप्त नहीं होगी, तब तक देश अखंड रूप से विकसित नहीं हो सकता। इस दिशा में सरकार के द्वारा तमाम ऐतिहासिक निर्णय लिए गये जिसमे पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा देना, अनुसूचित जाति आयोग को अधिक मजबूत बनाना। सरकार में मत्रालयाओ से लेकर सचिवालयो तक समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी को सुनिश्चित करना। इस समावेशन में समाज में दिव्यांगजनों के हिस्सेदारी को भी सुनिश्चित करने का प्रयास सरकार के द्वारा किया गया है। दिव्यांगों को समाज में व्यापत सभी सुविधा सुलभ रूप से प्राप्त हो इसका प्रयास भी सरकार के द्वारा किया जा रहा है। एक विकसित राष्ट्र वही है जो अपने सबसे कमजोर नागरिक की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हो। डॉ. अंबेडकर ने हमेशा कमजोर वर्गों के अधिकारों की वकालत की।
समावेशी समाज के लिए ‘सुलभता' एक अनिवार्य शर्त है। इसी सामाजिक समावेशन में ही हम शिक्षा को शामिल करते है हम जानते है की एक मानव समाज के लिए शिक्षा आवश्यक अहर्ता है। बाबासाहेब ने नारा दिया द्गह्न-शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। उनका मानना था कि शिक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली हथियार है।
शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया गया। देशज ज्ञान परंपरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर शिक्षा का प्रतिमान तैयार हो इस दिशा में सरकार महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। समाज में वंचित वर्गों के लिए कई प्रकार की छात्रवृतियों की संख्या में वृद्धि, यह शिक्षा के सभी स्तरों के साथ जुड़ी है। समाज के अनुसूचित जाति-जनजाति हेतु विदेश में जा कर शिक्षा प्राप्त करने हेतु छात्रवृति। सरकार का मानना है कि शिक्षा गुणवत्तापूर्ण होनी चाहिए। विकसित भारत में उच्च स्तर की शिक्षा को आधुनिक तकनीक (जैसे Aघ्, डिजिटल कौशल) से जोड़ना और इस सबका समाज के गरीब से गरीब बच्चे की पहुँच में होना चाहिए। इसी प्रकार से आर्थिक समावेशन का विषय है। पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर जी ने आर्थिक समृद्धि, आर्थिक समावेशन की बात की थी। तभी तो बिरतानी सरकार से भारत के कमजोर समाज और विशेषकर महिलाओं को उद्यमी बनने हेतु आर्थिक सहायत उपलब्ध करने की वह मांग करते थे। वर्तमान सरकार के द्वारा वित्तीय समावेशन हेतु मुद्रा योजना और स्टार्टअप इकोसिस्टम विकसित किया गया है। हम क्या सोच सकते है की सरकार ने 10000 तक की भी वितीय सहायता ग़रीब लोगो को दी और उन बैंको ने दी जो कभी इलीट वर्ग तक सीमित थे। सरकार सोचती है की वंचित वर्गों को केवल रोजगार मांगने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला (उद्यमी) बनाना होगा। इसके लिए लाभ सुदूर गांवों तक पहुँचाना आवश्यक है। सबका प्रयास और सबका विकास सबका कल्याण, विश्व का कल्याण इस दिशा में भारत आगे बढ़ रहा है।
(लेखक सहायक प्रोफेसर, तुलनात्मक राजनीति और राजनीतिक सिद्धांत का केन्द्र, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली।)