तृणमूल कांग्रेस में बागियों का खेला ही खेला, भाजपा को इनसे बचना होगा
प्रकाशित: 11-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
अशोक उपाध्याय
पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ से निकलने के बाद ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस कोलकाता से लेकर दिल्ली तक बिखर गयी है। बागी विधायक और सांसद ममता बनर्जी के सिर पर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को बचाने की कोशिश नाकाम हो रही है।
बागी नेता अपने गुट को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर खुलकर निशाना साध रहे हैं। इस गुट में ऐसे दलबदलुओं का जमावड़ा है जिसने कभी वाम मोर्चा के राज में सत्ता का सुख भोगा और फिर पलटी मारकर तृणमूल कांग्रेस के राज में भी अपना राजपाट चलाया है।
दरअसल पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार की हार के बाद अनेक वामपंथी नेताओं की अगुवाई में बड़ी संख्या में वामपंथी कार्यकर्ता और समर्थक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे। असलमें वाम मोर्चा के सत्ता से बाहर होने की बड़ी वजह उनकी कार्यशैली रही और इसके पीछे इन दलबदलू वामपंथियों का बड़ा हाथ रहा।
ममता बनर्जी ने सत्ता में बने रहने के लिए इन वामपंथियों को गले तो लगा लिया लेकिन बाद में ये उनके ही गले पड़ गये। गली मोहल्लों से वसूली करने वाले ये वामपंथी कटमनी के बूते सत्ता में टिके रहे और जनता भी बेबस होकर रह गई। ममता बनर्जी ने भी सारी हकीकत को जानने के बाद आंख मूद लिया जिसका नतीजा यह हुआ कि उनके साथ जो गैर वामपंथी जुडे थे वे भी कटमनी की राजनीति के आगे नतमस्तक हो गये।
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चाके कई प्रमुख विधायकों और शीर्ष नेताओं की लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने समय-समय पर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था। इनमें से हाल ही में हुआ एक सबसे बड़ा घटनाक्रम फरवरी 2026 का है जिसमें माकपा के एक बेहद चर्चित युवा चेहरे ने तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ली।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चा से ममता बनर्जी के खेमे में आने वाले प्रमुख चेहरों में प्रतीकुर रहमान शामिल है। वह मार्क्सवादी पार्टी की राज्य समिति के सदस्य और बड़े छात्र नेता थे। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में डायमंड हार्बर सीट से तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन फरवरी 2026 में वे मार्क्सवादी पार्टी छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गये। ऋतब्रत बनर्जी भी पहले माकपा के कद्दावर राज्यसभा सांसद और बड़े वामपंथी नेता थे जो बाद में ममता बनर्जी की पार्टी में शामिल हो गये।
अब जून 2026 की ताजा राजनीतिक बगावत के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के लगभग 58 बागी विधायकों के साथ मिलकर विधानसभा में अपना अलग गुट बना लिया है और उन्हें नेता प्रतिपक्ष की मान्यता मिल गई है। पूर्व में दलबदल करने वाले अन्य प्रमुख वामपंथी विधायक उदयन गुहावाम मोर्चा के घटक दल आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक के कद्दावर नेता और दिनहाटा सीट से विधायक रहे। उदयन गुहा ने भी वाम मोर्चा छोड़कर ममता बनर्जी की उपस्थिति में तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था और बाद में ममता बनर्जी सरकार में मंत्री बने।
हल्दिया से वाम मोर्चा की पूर्व विधायक तापसी मंडल ने भी पाला बदला था। वह बाद में मार्च 2025 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गई थीं। वाम मोर्चा सरकार के पूर्व मंत्री परेश अधिकारी भी वाम मोर्चा का साथ छोड़ कर ममता बनर्जी के साथ आ गए थे। अनंतदेब अधिकारी और दशरथ तिर्की वाम मोर्चा के घटक दल आरएसपी के विधायक रहे लेकिन दोनों वाम मोर्चा छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को एक साथ रखने वाली वजह शासन के लिए एक साझा दृष्टिकोण या एक एकीकृत वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं थी बल्कि सत्ता का आकर्षण और उसके चारों ओर विकसित होने वाला अवसरवादिता का तंत्र था। सही मायने में भ्रष्टाचार ही वाम मोर्चा और फिर तृणमूल कांग्रेस के लिये वास्तविक विचारधारा बन गया था और यह वह नापाक गठबंधन था जिसने बेहद अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि और महत्वाकांक्षाओं वाले अवसरवादी नेताओं को एक साथ बांधे रखा। जब तक सत्ता सुरक्षित रही, यह गठबंधन कायम रहा। लेकिन जैसे ही पार्टी के भविष्य पर सवाल उठने लगे यह गठबंधन तार तारहोने लगा।
भाजपा के पश्चिम बंगाल के नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को पार्टी में शामिल करने के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम बंगाल के राजनीतिक बदलाव से भाजपा के सिद्धांतों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए और न ही इसके शुद्धिकरण की प्रािढया अधूरी रहनी चाहिए। चुनाव में किये गये वादों को पूरा करने पर ही ज्यादा जोर देना चाहिये।
भाजपा को अवसरवादी दलबदलुओं को अपनी राजनीति को पुनर्जीवित करने के मंच के रूप में उपयोग करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का बिना जांच-पड़ताल के स्वागत करने से भाजपा में हिंसा, भ्रष्टाचार और राजनीतिक धमकियों की संस्कृति आ सकती है जिसे उन्होंने सदैव अपनी पार्टी की संस्कृति बताया। भाजपा को ऐसे अवसरवादी हिमायतियोंसे हमेशा सावधान रहना होगा जो आज अपने अतीत के पापों को धोने के नाम पर भाजपा के करीब आ रहे हैं। इन दलबदलुओं का इतिहास किसी से छिपा नही है, इन्होंने जिस पार्टी का दामन थामा, उसे भी अपने रंग में रंग लिया और कटमनी की राजनीति लगातार पनपने ही दिया।
तृणमूल कांग्रेस के ये बागी नेता दिल्ली से लेकर कोलकाता तक खेला ही खेला कर रहे हैं। गुणा भाग के खेल में ममता बनर्जी को लगातार पटखनी दे रहे ये बागी नेता भरोसे के लायक नही है। वैसे भाजपा को तृणमूल कांग्रेस के विधायकों के समर्थन की जरूरत नही है और इस तथ्य से परे कुछ भी सोचना-करना समझदारी नही होगी।
(लेखक पूर्व संपादक, यूनीवार्ता हैं।)
पश्चिम बंगाल की सत्ता हाथ से निकलने के बाद ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस कोलकाता से लेकर दिल्ली तक बिखर गयी है। बागी विधायक और सांसद ममता बनर्जी के सिर पर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को बचाने की कोशिश नाकाम हो रही है।
बागी नेता अपने गुट को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर खुलकर निशाना साध रहे हैं। इस गुट में ऐसे दलबदलुओं का जमावड़ा है जिसने कभी वाम मोर्चा के राज में सत्ता का सुख भोगा और फिर पलटी मारकर तृणमूल कांग्रेस के राज में भी अपना राजपाट चलाया है।
दरअसल पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार की हार के बाद अनेक वामपंथी नेताओं की अगुवाई में बड़ी संख्या में वामपंथी कार्यकर्ता और समर्थक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे। असलमें वाम मोर्चा के सत्ता से बाहर होने की बड़ी वजह उनकी कार्यशैली रही और इसके पीछे इन दलबदलू वामपंथियों का बड़ा हाथ रहा।
ममता बनर्जी ने सत्ता में बने रहने के लिए इन वामपंथियों को गले तो लगा लिया लेकिन बाद में ये उनके ही गले पड़ गये। गली मोहल्लों से वसूली करने वाले ये वामपंथी कटमनी के बूते सत्ता में टिके रहे और जनता भी बेबस होकर रह गई। ममता बनर्जी ने भी सारी हकीकत को जानने के बाद आंख मूद लिया जिसका नतीजा यह हुआ कि उनके साथ जो गैर वामपंथी जुडे थे वे भी कटमनी की राजनीति के आगे नतमस्तक हो गये।
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चाके कई प्रमुख विधायकों और शीर्ष नेताओं की लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने समय-समय पर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया था। इनमें से हाल ही में हुआ एक सबसे बड़ा घटनाक्रम फरवरी 2026 का है जिसमें माकपा के एक बेहद चर्चित युवा चेहरे ने तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता ली।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चा से ममता बनर्जी के खेमे में आने वाले प्रमुख चेहरों में प्रतीकुर रहमान शामिल है। वह मार्क्सवादी पार्टी की राज्य समिति के सदस्य और बड़े छात्र नेता थे। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में डायमंड हार्बर सीट से तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन फरवरी 2026 में वे मार्क्सवादी पार्टी छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गये। ऋतब्रत बनर्जी भी पहले माकपा के कद्दावर राज्यसभा सांसद और बड़े वामपंथी नेता थे जो बाद में ममता बनर्जी की पार्टी में शामिल हो गये।
अब जून 2026 की ताजा राजनीतिक बगावत के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के लगभग 58 बागी विधायकों के साथ मिलकर विधानसभा में अपना अलग गुट बना लिया है और उन्हें नेता प्रतिपक्ष की मान्यता मिल गई है। पूर्व में दलबदल करने वाले अन्य प्रमुख वामपंथी विधायक उदयन गुहावाम मोर्चा के घटक दल आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक के कद्दावर नेता और दिनहाटा सीट से विधायक रहे। उदयन गुहा ने भी वाम मोर्चा छोड़कर ममता बनर्जी की उपस्थिति में तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था और बाद में ममता बनर्जी सरकार में मंत्री बने।
हल्दिया से वाम मोर्चा की पूर्व विधायक तापसी मंडल ने भी पाला बदला था। वह बाद में मार्च 2025 में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गई थीं। वाम मोर्चा सरकार के पूर्व मंत्री परेश अधिकारी भी वाम मोर्चा का साथ छोड़ कर ममता बनर्जी के साथ आ गए थे। अनंतदेब अधिकारी और दशरथ तिर्की वाम मोर्चा के घटक दल आरएसपी के विधायक रहे लेकिन दोनों वाम मोर्चा छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को एक साथ रखने वाली वजह शासन के लिए एक साझा दृष्टिकोण या एक एकीकृत वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं थी बल्कि सत्ता का आकर्षण और उसके चारों ओर विकसित होने वाला अवसरवादिता का तंत्र था। सही मायने में भ्रष्टाचार ही वाम मोर्चा और फिर तृणमूल कांग्रेस के लिये वास्तविक विचारधारा बन गया था और यह वह नापाक गठबंधन था जिसने बेहद अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि और महत्वाकांक्षाओं वाले अवसरवादी नेताओं को एक साथ बांधे रखा। जब तक सत्ता सुरक्षित रही, यह गठबंधन कायम रहा। लेकिन जैसे ही पार्टी के भविष्य पर सवाल उठने लगे यह गठबंधन तार तारहोने लगा।
भाजपा के पश्चिम बंगाल के नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को पार्टी में शामिल करने के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम बंगाल के राजनीतिक बदलाव से भाजपा के सिद्धांतों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए और न ही इसके शुद्धिकरण की प्रािढया अधूरी रहनी चाहिए। चुनाव में किये गये वादों को पूरा करने पर ही ज्यादा जोर देना चाहिये।
भाजपा को अवसरवादी दलबदलुओं को अपनी राजनीति को पुनर्जीवित करने के मंच के रूप में उपयोग करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का बिना जांच-पड़ताल के स्वागत करने से भाजपा में हिंसा, भ्रष्टाचार और राजनीतिक धमकियों की संस्कृति आ सकती है जिसे उन्होंने सदैव अपनी पार्टी की संस्कृति बताया। भाजपा को ऐसे अवसरवादी हिमायतियोंसे हमेशा सावधान रहना होगा जो आज अपने अतीत के पापों को धोने के नाम पर भाजपा के करीब आ रहे हैं। इन दलबदलुओं का इतिहास किसी से छिपा नही है, इन्होंने जिस पार्टी का दामन थामा, उसे भी अपने रंग में रंग लिया और कटमनी की राजनीति लगातार पनपने ही दिया।
तृणमूल कांग्रेस के ये बागी नेता दिल्ली से लेकर कोलकाता तक खेला ही खेला कर रहे हैं। गुणा भाग के खेल में ममता बनर्जी को लगातार पटखनी दे रहे ये बागी नेता भरोसे के लायक नही है। वैसे भाजपा को तृणमूल कांग्रेस के विधायकों के समर्थन की जरूरत नही है और इस तथ्य से परे कुछ भी सोचना-करना समझदारी नही होगी।
(लेखक पूर्व संपादक, यूनीवार्ता हैं।)