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PoK में पाकिस्तान की बर्बर दमनकारी नीति: निर्दोषों पर गोलियां, मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन!

प्रकाशित: 11-06-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
PoK में पाकिस्तान की बर्बर दमनकारी नीति: निर्दोषों पर गोलियां, मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन!
-आदित्य नरेन्द्र
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में इन दिनों खूनखराबे का सिलसिला जारी है। पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की गोलीबारी और अत्यधिक बल प्रयोग से कम से कम 11 लोग मारे गए हैं, जबकि 70 से अधिक घायल हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि मरने वालों की संख्या 20-30 तक पहुंच चुकी है और सैकड़ों घायल हैं। जून 7-8 को रावलकोट में एक शहीद के अंतिम संस्कार के दौरान हुए संघर्ष में पुलिस और सेना ने आंसू गैस, लाठीचार्ज और सीधी फायरिंग की। यह पाकिस्तान की क्रूर दमन नीति का ताजा उदाहरण है, जो मानवाधिकारों का बेधड़क उल्लंघन कर रही है। संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर प्रतिबंध और गिरफ्तारियां सबसे बड़ा ट्रिगर 6 जून को AJK सरकार द्वारा JAAC पर प्रतिबंध लगाना था। आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत इस नागरिक संगठन को ‘आतंक फैलाने’ और ‘अराजकता’ का आरोप लगाकर प्रतिबंधित कर दिया गया। नेताओं को गिरफ्तार किया गया, दफ्तर सील कर दिए गए और पूरे क्षेत्र में इंटरनेट-मोबाइल सेवाएं ठप कर दी गईं। JAAC पिछले कई सालों से आटा, बिजली सब्सिडी, टैक्स में कमी, पाकिस्तानी शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों को खत्म करने और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहा था। ये मांगें आर्थिक संकट, बेरोजगारी और इस्लामाबाद के शोषण के खिलाफ स्थानीय लोगों की पीड़ा को दर्शाती हैं। पाकिस्तानी प्रशासन इसे ‘आतंकवाद’ करार दे रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि यह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर राज्य आतंक का मामला है। सुरक्षा बलों ने अस्पताल के पास भी फायरिंग की, महिलाओं और बच्चों सहित आम नागरिकों को निशाना बनाया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में घायलों की चीखें और लाशें साफ दिख रही हैं। संचार ब्लैकआउट, मनमानी गिरफ्तारियां और प्रेस पर पाबंदी — ये सब मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन हैं। Amnesty International और अन्य संगठनों ने भी इस प्रतिबंध और बल प्रयोग की निंदा की है। PoK में पाकिस्तान का शोषण और भारत की तुलना PoK के लोग दशकों से पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों के कब्जे में जी रहे हैं। यहां के प्राकृतिक संसाधनों का लूट, स्थानीय संस्कृति का दमन और आर्थिक पिछड़ापन आम बात है। 2024-2025 में भी इसी तरह के आंदोलन हुए थे, लेकिन इस बार गुस्सा चरम पर है। 27 जुलाई को होने वाले चुनावों से पहले आरक्षित सीटों का मुद्दा और भड़क गया है, जो पाकिस्तानी बाहरी तत्वों को स्थानीय विधानसभा में अनुचित ताकत देता है। कुछ प्रदर्शनकारियों ने भारत से जुड़ने या मदद मांगने के नारे लगाए हैं। रावलकोट समेत कई जगहों पर ‘भारत में विलय’ जैसे पोस्टर देखे गए। भारतीय प्रशासित जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद विकास, शांति और अवसरों की तुलना में PoK की बदहाली और स्पष्ट हो गई है। पाकिस्तान PoK को ‘आजाद’ बताता है, लेकिन हकीकत में यह गुलामी का प्रतीक है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बर्बरता की कड़ी निंदा की है। प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने इसे शासन विफलता से ध्यान भटकाने की कोशिश बताया। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की मांग की है।
मानवाधिकार उल्लंघन: पाकिस्तान की शर्मनाक सच्चाई
यह केवल आर्थिक आंदोलन नहीं, बल्कि पाकिस्तानी राज्य की क्रूरता का मुद्दा है। निर्दोष नागरिकों पर गोली चलाना, अंतिम संस्कार में भी हमला, घायलों को अस्पताल पहुंचने से रोकना — ये सब जिनेवा कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का खुला उल्लंघन हैं। Diaspora ब्रिटेन समेत दुनिया भर में प्रदर्शन कर रहा है। UK के कुछ सांसदों ने भी पाकिस्तान से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन इस्लामाबाद कान नहीं धर रहा। JAAC के नेताओं ने कहा है कि वे आतंक नहीं, बल्कि न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। पाकिस्तानी विपक्षी दलों (जैसे PTI) ने भी संवाद की मांग की है, लेकिन सत्ता पक्ष दमन पर अड़ा है। PoK में इंटरनेट बंदी और कर्फ्यू जैसे हालात बनाए रखे गए हैं, जिससे सच्चाई दबाई जा रही है। भविष्य की चुनौतियां और सबक यह आंदोलन , PoK की जनता की आजादी की पुकार है। पाकिस्तान अगर दमन जारी रखा तो स्थिति और बिगड़ सकती है। भारत को मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए और PoK के लोगों की आवाज को दुनिया तक पहुंचाना चाहिए। PoK के लोग अब समझ चुके हैं कि पाकिस्तान उन्हें सिर्फ शोषण का साधन मानता है, जबकि भारत विकास और सम्मान का रास्ता दिखाता है।
PoK में चल रहा यह संग्राम सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि पाकिस्तान की पूरी नीति की नाकामी है। जब तक इस्लामाबाद अपने दमनकारी रवैये को नहीं बदलेगा, PoK की पीड़ा जारी रहेगी। भारत हमेशा PoK के लोगों के साथ खड़ा है — यह समय है कि दुनिया इस मानवाधिकार संकट पर ध्यान दे।