भारतीयता और राष्ट्रबोध के लिए संकल्पित संघ
प्रकाशित: 25-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रो. हरीश अरोड़ा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी केवल किसी संगठन के सौ वर्ष पूर्ण होने का अवसर नहीं है बल्कि यह उस विचार-यात्रा का पड़ाव है जिसने भारतीय समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों, राष्ट्रीय अस्मिता और सभ्यतागत चेतना से जोड़ने का सतत प्रयास किया है। वर्ष 1925 में स्थापित संघ ने अपने आरंभिक दिनों से ही यह विश्वास व्यक्त किया कि भारत का पुनरुत्थान केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संभव नहीं होगा; उसके लिए समाज के भीतर राष्ट्रीय चरित्र, सांस्कृतिक आत्मबोध और संगठनात्मक शक्ति का विकास आवश्यक है। यही कारण है कि संघ ने सत्ता के केंद्र के बजाय समाज को अपने कार्य का केंद्र बनाया।
संघ की कार्यपद्धति का मूल आधार व्यक्ति निर्माण रहा है। उसका विश्वास है कि राष्ट्र का निर्माण योजनाओं से नहीं बल्कि संस्कारित, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तियों से होता है। शाखा इसी व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशाला है जहाँ व्यक्ति स्वयं को समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से जोड़ना सीखता है। पिछले सौ वर्षों में यही विचार संघ को एक संगठन से आगे बढ़ाकर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में स्थापित करता है।
संघ की विशेषता यह रही है कि उसने केवल विचार प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि उन्हें समाज के विविध क्षेत्रों में कार्यरूप भी प्रदान किया। वनवासी क्षेत्रों में कार्यरत ‘वनवासी कल्याण आश्रम' ने जनजातीय समाज के भीतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संरक्षण के माध्यम से आत्मविश्वास जगाने का कार्य किया है। ‘सेवा भारती' ने समाज के वंचित वर्गों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा की गतिविधियाँ पहुँचाकर समरसता का सेतु निर्मित किया है। ‘भारत विकास परिषद' ने सामाजिक सहयोग, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों को जनभागीदारी से जोड़ने का कार्य किया है। इसी प्रकार ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए भारतीय मुसलमानों के बीच संवाद और राष्ट्रीय एकात्मता का वातावरण बनाने का प्रयास किया है जबकि ‘राष्ट्रीय सिख संगत' ने सिख और व्यापक भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के बीच ऐतिहासिक एवं वैचारिक संबंधों को पुन रेखांकित करने का कार्य किया है। इन विविध प्रकल्पों को देखकर स्पष्ट होता है कि संघ का लक्ष्य किसी एक वर्ग, क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज का संगठन है।
संघ की शताब्दी यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उसने भारतीयता को किसी संकीर्ण परिभाषा में नहीं बाँधा। उसके लिए भारतीयता वह सांस्कृतिक चेतना है जो विविधताओं में एकता का भाव जगाती है, समाज को विखंडन के बजाय समन्वय की दिशा में ले जाती है और राष्ट्र को केवल राजनीतिक संरचना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परिवार के रूप में देखती है। यही कारण है कि संघ के कार्यों में सेवा, समरसता, संस्कृति और संगठन समान रूप से महत्त्वपूर्ण दिखाई देते हैं।
संघ की शताब्दी यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष भारतीय नारी-शक्ति का संगठन और जागरण भी है। यद्यपि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संरचना पुरुष स्वयंसेवकों पर आधारित रही है लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। संघ में राष्ट्र सेविका समिति, दुर्गा वाहिनी एवं अन्य मातृशक्ति इकाइयों ने पिछले कई दशकों से अधिक समय से महिलाओं में राष्ट्रभाव, नेतृत्व, संगठन क्षमता और सांस्कृतिक चेतना के विकास का उल्लेखनीय कार्य किया है। संघ की मान्यता ही यही है कि राष्ट्रनिर्माण में केवल पुरुषों ही नहीं वरन स्त्रियाँ भी समान सहभागिता बनें। इसके अतिरिक्त शिक्षा, सेवा, संस्कार और सामाजिक जागरण के अनेक क्षेत्रों में कार्यरत महिला कार्यकर्ताओं ने सेवा भारती, विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, संस्कार भारती, अखिल भारतीय साहित्य परिषद आदि अनेक संगठनों के माध्यम से समाज जीवन में सािढय भूमिका निभाई है।
शताब्दी वर्ष में संघ ने अपने आगामी पथ को पाँच प्रमुख संकल्पों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। पहला संकल्प ‘सामाजिक समरसता' का है जिसके माध्यम से जाति, वर्ग और क्षेत्रीय विभाजनों से ऊपर उठकर एकात्म समाज के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। दूसरा संकल्प ‘कुटुंब प्रबोधन' का है जो भारतीय परिवार व्यवस्था को सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देता है। तीसरा संकल्प ‘पर्यावरण संरक्षण' का है जो प्रकृति के साथ भारतीय संस्कृति के सहअस्तित्व के भाव को व्यवहार में उतारने का प्रयास है। चौथा संकल्प ‘स्वदेशी जीवन-दृष्टि' का है जिसके माध्यम से आत्मनिर्भरता, स्थानीय उत्पादन और भारतीय आर्थिक चिंतन को बल देने की बात कही गई है। पाँचवाँ संकल्प ‘नागरिक कर्तव्यबोध' का है जो अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति सजग समाज के निर्माण का आह्वान करता है।
वर्तमान समय में जब विश्व सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक विखंडन और मूल्य-संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है तब संघ की शताब्दी यात्रा इस प्रश्न को पुन सामने लाती है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति क्या होती है। संघ का उत्तर स्पष्ट है-राष्ट्र की शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या राजनीतिक संरचना से पहले उसके समाज, उसके संस्कारों और उसकी सांस्कृतिक चेतना में निहित होती है। यदि समाज संगठित, आत्मविश्वासी और अपने मूल्यों के प्रति सजग है तो राष्ट्र की प्रगति का मार्ग स्वत प्रशस्त होता है।
सौ वर्षों की इस यात्रा को देखते हुए कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय समाज में राष्ट्रबोध को केवल वैचारिक विमर्श का विषय नहीं रहने दिया अपितु उसे सेवा, संगठन और संस्कार के माध्यम से जीवन का अंग बनाने का प्रयास किया है। शताब्दी वर्ष में प्रवेश करता संघ केवल अपने अतीत का उत्सव नहीं मना रहा बल्कि भारतीयता के उस सतत प्रवाह को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहरा रहा है जो भारत को एक सशक्त राष्ट्र के साथ-साथ एक जागृत सभ्यता के रूप में प्रतिष्ठित करने की क्षमता रखता है।
(लेखक : प्रोफेसर (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय हैं।)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी केवल किसी संगठन के सौ वर्ष पूर्ण होने का अवसर नहीं है बल्कि यह उस विचार-यात्रा का पड़ाव है जिसने भारतीय समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों, राष्ट्रीय अस्मिता और सभ्यतागत चेतना से जोड़ने का सतत प्रयास किया है। वर्ष 1925 में स्थापित संघ ने अपने आरंभिक दिनों से ही यह विश्वास व्यक्त किया कि भारत का पुनरुत्थान केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संभव नहीं होगा; उसके लिए समाज के भीतर राष्ट्रीय चरित्र, सांस्कृतिक आत्मबोध और संगठनात्मक शक्ति का विकास आवश्यक है। यही कारण है कि संघ ने सत्ता के केंद्र के बजाय समाज को अपने कार्य का केंद्र बनाया।
संघ की कार्यपद्धति का मूल आधार व्यक्ति निर्माण रहा है। उसका विश्वास है कि राष्ट्र का निर्माण योजनाओं से नहीं बल्कि संस्कारित, अनुशासित और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तियों से होता है। शाखा इसी व्यक्ति निर्माण की प्रयोगशाला है जहाँ व्यक्ति स्वयं को समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से जोड़ना सीखता है। पिछले सौ वर्षों में यही विचार संघ को एक संगठन से आगे बढ़ाकर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में स्थापित करता है।
संघ की विशेषता यह रही है कि उसने केवल विचार प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि उन्हें समाज के विविध क्षेत्रों में कार्यरूप भी प्रदान किया। वनवासी क्षेत्रों में कार्यरत ‘वनवासी कल्याण आश्रम' ने जनजातीय समाज के भीतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक संरक्षण के माध्यम से आत्मविश्वास जगाने का कार्य किया है। ‘सेवा भारती' ने समाज के वंचित वर्गों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा की गतिविधियाँ पहुँचाकर समरसता का सेतु निर्मित किया है। ‘भारत विकास परिषद' ने सामाजिक सहयोग, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों को जनभागीदारी से जोड़ने का कार्य किया है। इसी प्रकार ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए भारतीय मुसलमानों के बीच संवाद और राष्ट्रीय एकात्मता का वातावरण बनाने का प्रयास किया है जबकि ‘राष्ट्रीय सिख संगत' ने सिख और व्यापक भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के बीच ऐतिहासिक एवं वैचारिक संबंधों को पुन रेखांकित करने का कार्य किया है। इन विविध प्रकल्पों को देखकर स्पष्ट होता है कि संघ का लक्ष्य किसी एक वर्ग, क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज का संगठन है।
संघ की शताब्दी यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि उसने भारतीयता को किसी संकीर्ण परिभाषा में नहीं बाँधा। उसके लिए भारतीयता वह सांस्कृतिक चेतना है जो विविधताओं में एकता का भाव जगाती है, समाज को विखंडन के बजाय समन्वय की दिशा में ले जाती है और राष्ट्र को केवल राजनीतिक संरचना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परिवार के रूप में देखती है। यही कारण है कि संघ के कार्यों में सेवा, समरसता, संस्कृति और संगठन समान रूप से महत्त्वपूर्ण दिखाई देते हैं।
संघ की शताब्दी यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष भारतीय नारी-शक्ति का संगठन और जागरण भी है। यद्यपि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संरचना पुरुष स्वयंसेवकों पर आधारित रही है लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। संघ में राष्ट्र सेविका समिति, दुर्गा वाहिनी एवं अन्य मातृशक्ति इकाइयों ने पिछले कई दशकों से अधिक समय से महिलाओं में राष्ट्रभाव, नेतृत्व, संगठन क्षमता और सांस्कृतिक चेतना के विकास का उल्लेखनीय कार्य किया है। संघ की मान्यता ही यही है कि राष्ट्रनिर्माण में केवल पुरुषों ही नहीं वरन स्त्रियाँ भी समान सहभागिता बनें। इसके अतिरिक्त शिक्षा, सेवा, संस्कार और सामाजिक जागरण के अनेक क्षेत्रों में कार्यरत महिला कार्यकर्ताओं ने सेवा भारती, विद्या भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, संस्कार भारती, अखिल भारतीय साहित्य परिषद आदि अनेक संगठनों के माध्यम से समाज जीवन में सािढय भूमिका निभाई है।
शताब्दी वर्ष में संघ ने अपने आगामी पथ को पाँच प्रमुख संकल्पों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। पहला संकल्प ‘सामाजिक समरसता' का है जिसके माध्यम से जाति, वर्ग और क्षेत्रीय विभाजनों से ऊपर उठकर एकात्म समाज के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। दूसरा संकल्प ‘कुटुंब प्रबोधन' का है जो भारतीय परिवार व्यवस्था को सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देता है। तीसरा संकल्प ‘पर्यावरण संरक्षण' का है जो प्रकृति के साथ भारतीय संस्कृति के सहअस्तित्व के भाव को व्यवहार में उतारने का प्रयास है। चौथा संकल्प ‘स्वदेशी जीवन-दृष्टि' का है जिसके माध्यम से आत्मनिर्भरता, स्थानीय उत्पादन और भारतीय आर्थिक चिंतन को बल देने की बात कही गई है। पाँचवाँ संकल्प ‘नागरिक कर्तव्यबोध' का है जो अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति सजग समाज के निर्माण का आह्वान करता है।
वर्तमान समय में जब विश्व सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक विखंडन और मूल्य-संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है तब संघ की शताब्दी यात्रा इस प्रश्न को पुन सामने लाती है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति क्या होती है। संघ का उत्तर स्पष्ट है-राष्ट्र की शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या राजनीतिक संरचना से पहले उसके समाज, उसके संस्कारों और उसकी सांस्कृतिक चेतना में निहित होती है। यदि समाज संगठित, आत्मविश्वासी और अपने मूल्यों के प्रति सजग है तो राष्ट्र की प्रगति का मार्ग स्वत प्रशस्त होता है।
सौ वर्षों की इस यात्रा को देखते हुए कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय समाज में राष्ट्रबोध को केवल वैचारिक विमर्श का विषय नहीं रहने दिया अपितु उसे सेवा, संगठन और संस्कार के माध्यम से जीवन का अंग बनाने का प्रयास किया है। शताब्दी वर्ष में प्रवेश करता संघ केवल अपने अतीत का उत्सव नहीं मना रहा बल्कि भारतीयता के उस सतत प्रवाह को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहरा रहा है जो भारत को एक सशक्त राष्ट्र के साथ-साथ एक जागृत सभ्यता के रूप में प्रतिष्ठित करने की क्षमता रखता है।
(लेखक : प्रोफेसर (हिन्दी), दिल्ली विश्वविद्यालय हैं।)