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मिनाब 168: महाशक्ति के पतन का कारण बनती मासूमों की शहादत

प्रकाशित: 16-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
तनवीर ज़ाफरी

अमेरिका व इस्राईल द्वारा गत 28 फ़रवरी से ईरान पर किये गये संयुक्त हमलों में हालाँकि ईरान में मरने वालों की संख्या सूत्रों द्वारा अलग अलग बताई जा रही है। परन्तु अनुमानत इन हमलों में अब तक लगभग 6,000 से भी अधिक ईरानी नागरिकों लोगों के मारे जाने की संभावना है। जबकि लगभग 26,500 से भी अधिक लोगों के घायल होने के आंकड़े सामने आये हैं। परन्तु ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह सैय्यद अली ख़ामनेई, अनेक उच्च स्तरीय नेता, अधिकारी व वैज्ञानिकों की हत्या से भी अधिक चर्चा ईरान में हुये जिस एक हमले को लेकर हो रही है वह है दक्षिणी ईरान के मिनाब शहर के एक प्राइमरी स्कूल पर 28 फ़रवरी को अमेरिकी वायु सेना द्वारा किया गया वह हमला जिसने हमले के समय स्कूल में पढ़ रहे 168 मासूम बच्चों को शहीद कर दिया।

ईरान ने मुख्य रूप से इसीएक हमले को रेखांकित करते हुये विश्वशांतिकी बात करने वाले अमेरिका को पूरी दुनिया में बेऩकाब करने की मुहिम चलाई। इतना ही नहीं बल्कि इसी हमले ने मानवीय संवेदना रखने वाले कई अमेरिकी सांसदों व उच्च अधिकारियों को भी आवाज़ उठाने को मजबूर किया।

याद कीजिये गत 10 अप्रैल 2026 को जब एक ईरानी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका से बात चीत करने के म़कसद से इस्लामाबाद पहुंचा था और अमेरिका की तऱफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस वार्ता का नेतृत्व कर रहे थे उस समय ईरानी प्रतिनिधिमंडल जिस ष्श्ग्हं 168 अंकित विमान में बैठकर इस्लामाबाद आया था उस विमान ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था।

ईरानी स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिब़ाफ, ईरानी विदेश मंत्री अरागची व ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने इसी ष्श्ग्हं 168 नामक विमान से ही तेहरान से पाकिस्तान की यात्रा की थी। इस विमान में आगे की 168 सीटों पर अमेरिकी हमले में शहीद हुये बच्चों की तस्वीरें रखी गईं। हर सीट पर उनके ख़ून से सने हुये क्षतिग्रस्त स्कूल बैग व शहीद बच्चों के जूते व साथ ही उन्हें श्रद्धांजलि देने हेतु फूल भी रखे गये थे। यह पहला म़ौका था जबकि ईरान जैसे किसी साहसी देश ने स्वयं को महाशक्ति बताने वाले अमेरिका के वास्तविक ाtढर चेहरे को इस निराले अंदाज़ से बेऩकाब किया था। ष्श्ग्हं 168 विमान केवल पाकिस्तान ही नहीं आया बल्कि अरागची26-27 अप्रैल को इसी विमान पर सवार होकर इस्लामाबाद और ओमान के दौरे के बाद रूस भी पहुंचे। जहां उन्होंने राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से महत्वपूर्ण मुल़ाकात की।

अमेरिका में भी मिनाबके शहीद मासूमों का ख़ून सर चढ़कर बोलता दिखाई दे रहा है। इस हमले को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप को राजनीतिक और सड़क स्तर पर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। डेमोक्रेट्स द्वारा स़ाफ तौर पर इसे ग़ैर ज़िम्मेदाराना अमेरिकी हमला मानकर ट्रंप प्रशासन से इस हमले की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने की मांग रहे हैं। क्योंकि जांच में अमेरिकी टोमाहॉक मिसाइल इस्तेमाल होने की पुष्टि हो चुकी है। यह मिसाइलकेवल अमेरिका के पास ही है। अमेरिकी डेपोट सांसदों ने पेंटागन से निष्पक्ष जांच की मांग करते हुये रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ से जवाब भी तलब किया है। इन अमेरिकी सीनेटर्स ने इसे हताहत होने वाला दशकों का सबसे बुरा नागरिक मामला बताया है साथ ही ट्रंप प्रशासन पर अपनी जवाबदेही स्वीकार न करने का भी आरोप लगाया गया है। कई सीनेटर्स तो इसे अमेरिकी सेना की भयानक ग़लती भी बता रहे हैं।

इसी मिनाब घटना को लेकर अमेरिका में कई जगह सड़कों पर भी प्रदर्शन हुये हैं। न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर से लेकर सैन फ्रांसिस्को, शिकागो और मिल्वौकी तक में कई जगह में हज़ारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे और उन्होंने हैंड्स ऑ़फ ईरान के नारे लगाए। यहाँ की कैपिटल हिल पर प्रतीकत्मक रूप से बच्चों के स्कूल बैग रखकर विरोध प्रदर्शन हुआ। इसमें कई डेपोट सांसद भी शामिल हुये थे। हद तो यह है कि व्हाइट हाउस के बाहर इसी अप्रैल में हुए व्यापक प्रदर्शनों में ट्रंप को युद्ध अपराधी बताकर उसे हटाने की भी ज़ोरदार मांग हुई। बहरहाल, इस्राईल हो या उसका संरक्षक अमेरिका, इन दोनों ही देशों ने विश्व अनेक देशों में युद्धापराध अंजाम देने के अनेक क्रूरतम इतिहास लिखे हैं। सही मायने में तो युद्धापराध अंजाम देने के यह आदी हो चुके हैं।

याद कीजिये 1960-70 के मध्य लंबे समय तक चले वियतनाम युद्ध को। यही अमेरिका है जिसने बड़ी बेरहमी से यहाँ लाखों लोगों की हत्यायें की थीं। इनमें एक दिल दहलाने वाली घटना दक्षिण वियतनाम के माई लाई गांव में हुई थी जहाँ न केवल 500 से अधिक निहत्थे नागरिकों जिनमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग शामिल थे की हत्या की गई थी बल्कि उनका सामूहिक बलात्कार किया गया उनके शवों का जलाया गया व अपमान किया गया था। पूरे के पूरे कई गांव जला दिए गये थे।

इसी तरह 2003 के ईऱाक युद्ध के दौरान अबूग़रेब जेल में क़ैदियों की प्रताड़ना के अलावा इऱाक में कई नागरिक नरसंहार की घटनाएं हुईं। इसी तरह अ़फग़ानिस्तान में भी नागरिक हत्या, बलात्कार जैसे कई कारनामे उजागर हुए थे। अमेरिका की तर्ज़ पर इस्राइल भी लेबनॉन, पश्चिमी किनारे व ग़ज़ा के इल़ाकों में मानव नरसंहार के कई इतिहास लिख चुका है। यह तो इतने ाtढर हैं कि भूखे बच्चों को पहले खाने पानी की लालच देकर भीड़ इकट्ठी करते हैं उसके बाद उन मजबूरों को खाना पानी देने के बजाये उनपर बंबारी कर हत्याएं कर देते हैं।

इस्राइली प्रधानमंत्री तो इस समय अंतर्राष्ट्रीय अदालत का वांछित मुजरिम भी है। परन्तु इस बार इनका पाला पड़ा था ईरान में मिनाब के मासूमों से। इनकी चीख़ पुकार व बद्दुआएं पूरे विश्व में इस क़द्र गूँज रही हैं कि मानवीय ह्रदय रखने वाले अमेरिकी भी इस घटना से सदमे में हैं तथा वे यह महसूस कर रहे हैं कि यह घटना कहीं वैश्विक अमेरिकी चौधर के पतन का कारण न बन जाये। तभी ट्रंप प्रशासन इस घटना से पल्ला झाड़ने की असफल कोशिश करता भी दिखाई देता है। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि मिनाब स्कूल हमले की वजह से और ईरान युद्ध नीति के चलते ही अमेरिका में ट्रंप की लोकप्रियता नकारात्मक 20-23ज्ञ् तक गिर गई है। इसी तरह के विरोध के चलते ट्रंप ने अपने कई अधिकारियों को बर्ख़ास्त कर दिया जबकि कई ने इस्त़ीफा देकर अपनी इज़्ज़त बचने में ही अपनी भलाई समझी। कहना ग़लत नहीं होगा कि मासूमों की शहादत को याद दिलाने वाला प्रतीक ष्श्ग्हं 168 पूरे विश्व में नरसंहार की इबारत लिखने वाली महाशक्ति को बेऩकाब कर छोड़ेगा तथा इसके पतन का कारण भी बनेगा।