वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

मैकॉले के जहर से बाहर निकलता भारत और बेचैन ‘कॉकरोच राजनीति'

प्रकाशित: 30-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
सौरभ त्रिपाठी
पत्थर सी हों मांसपेशियाँ, लौहदंड भुजबल अभय, नस-नस में हो लहर आग की, तभी जवानी पाती जय।
राष्ट्रकवि दिनकर की ये पंक्तियाँ उस युवा शक्ति की बात करती हैं जो राष्ट्र बनाती है, इतिहास बदलती है और सभ्यता को आगे ले जाती है। लेकिन हर दौर में कुछ ऐसी ताकतें भी रही हैं जो युवा ऊर्जा को निर्माण से हटाकर विनाश की तरफ मोड़ना चाहती हैं। आज भारत ठीक उसी मोड़ पर खड़ा है।
लंबे समय तक इस देश के युवाओं को एक खास मानसिकता में ढालने का प्रयास हुआ। उन्हें बताया गया कि अपनी भाषा बोलना पिछड़ापन है, परंपराओं से जुड़ना दकियानूसी है और धर्म की बात करना आधुनिक समाज के खिलाफ है। अंग्रेज़ी को बुद्धिमत्ता का पर्याय बनाया गया और भारतीयता को हीनभावना से जोड़ दिया गया। यह केवल शिक्षा का संकट नहीं था, यह मानसिक उपनिवेशवाद था। अब पहली बार यह ढांचा दरकता दिखाई दे रहा है।
आज का युवा बिना संकोच अपनी मातृभाषा में बात करता है। कॉलेजों में तिलक और कलावा अब मजाक का विषय नहीं रहे। मंदिर जाने वाला युवा अब खुद को आउटडेटेड नहीं मानता। सोशल मीडिया पर भारतीय इतिहास, सनातन परंपरा, गीता, रामायण और राष्ट्र चेतना से जुड़े विषयों की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। महाकुंभ से लेकर कांवड़ यात्रा तक, नई पीढ़ी की भागीदारी यह संकेत दे रही है कि देश अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है।
नई शिक्षा नीति ने भी इस परिवर्तन को दिशा दी है। पहली बार भारतीय भाषाओं, भारतीय ज्ञान परंपरा, कौशल आधारित शिक्षा और सांस्कृतिक बोध को गंभीरता से स्थान मिला। यह बदलाव केवल पाठ्यक्रम का नहीं, सोच का है। अब युवा नौकरी खोजने वाली भीड़ नहीं, अपनी पहचान समझने वाली पीढ़ी बनना चाहता है। यही बदलाव कुछ लोगों को सबसे अधिक बेचैन कर रहा है।
सोशल मीडिया पर पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई प्लेटफॉर्म उभरे हैं जिनकी पूरी राजनीति युवाओं के भीतर स्थायी गुस्सा भरने पर टिकी है। कुछ तथाकथित ‘क्रांतिकारी' पेजों और चैनलों ने बेरोज़गारी, परीक्षा और व्यवस्था के प्रति असंतोष को एक सुनियोजित डिजिटल अभियान में बदल दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार ऐसे कुछ प्लेटफॉर्म करोड़ों फॉलोअर्स तक पहुंच चुके हैं। केवल इंस्टाग्राम पर ही कुछ अकाउंट्स ने दो करोड़ से अधिक युवा फॉलोअर्स जुटा लिए। यह संख्या बताती है कि गुस्से का कारोबार कितना बड़ा हो चुका है।
भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया बाजार बन चुका है। देश में 50 करोड़ से अधिक सक्रिय सोशल मीडिया उपयोगकर्ता हैं और औसतन युवा प्रतिदिन कई घंटे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिताता है। एल्गोरिद्म ऐसी सामग्री को तेजी से आगे बढ़ाते हैं जिसमें उत्तेजना, टकराव और सनसनी हो। यही कारण है कि आज देश खत्म हो गया, सिस्टम पूरी तरह सड़ चुका है और हर संस्था बेकार है जैसे नैरेटिव सबसे तेज़ी से वायरल होते हैं। यही वह जगह है जहाँ कॉकरोच राजनीति जन्म लेती है।
यह राजनीति युवाओं को समाधान नहीं देती, केवल उत्तेजना देती है। यह उन्हें सोचने नहीं, भड़कने के लिए तैयार करती है। हर संस्था को दुश्मन की तरह पेश करना, हर उपलब्धि का मजाक उड़ाना और हर राष्ट्रीय सफलता को प्रोपेगेंडा बताना इसका तरीका बन चुका है। इन लोगों की समस्या बेरोज़गारी से कम और भारत के बदलते आत्मविश्वास से ज्यादा है।
विडंबना देखिए।
जो लोग खुद को प्रगतिशील बताते हैं, वही युवा को सबसे ज्यादा मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। उन्हें ऐसा युवा चाहिए जो अपनी सभ्यता पर शर्म करे, अपनी भाषा से दूरी बनाए और हर राष्ट्रीय उपलब्धि पर संदेह करे। क्योंकि जिस दिन युवा अपनी असली शक्ति पहचान लेगा, उस दिन भ्रम बेचने वाली राजनीति खत्म हो जाएगी। लेकिन देश की जमीन पर तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है।
अगर भारत का युवा सचमुच निराशा में डूबा होता तो दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों का नेतृत्व भारतीय युवा नहीं कर रहे होते। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बनकर नहीं उभरता। लाखों युवा नवाचार, डिजिटल टेक्नोलॉजी और उद्यमिता में आगे नहीं बढ़ रहे होते। यूपीआई मॉडल दुनिया में चर्चा का विषय नहीं बनता। भारतीय युवा केवल विरोध की राजनीति में नहीं, बल्कि निर्माण की प्रक्रिया में भी बड़ी संख्या में भाग ले रहा है।
महाकुंभ, कांवड़ यात्रा और धार्मिक आयोजनों में युवाओं की रिकॉर्ड भागीदारी ने भी उस मिथक को तोड़ा है जिसमें कहा जाता था कि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से कट चुकी है। आज का युवा गीता भी पढ़ना चाहता है और ऐ भी सीखना चाहता है। वह स्टार्टअप भी बनाना चाहता है और मंदिर भी जाना चाहता है। यही संतुलन भारत की सबसे बड़ी ताकत है। भारत का युवा अब पहले जैसा नहीं रहा।
वह सवाल पूछता है, लेकिन देश से घृणा नहीं करता। वह सुधार चाहता है, पर अराजकता नहीं। उसे समझ में आने लगा है कि बसें जलाने, पत्थर फेंकने और सोशल मीडिया पर जहर फैलाने से न रोजगार पैदा होते हैं, न राष्ट्र मजबूत होता है। सच्चाई यह है कि भारत का युवा अब उधार की सोच से बाहर निकल रहा है। वह आधुनिकता चाहता है, लेकिन आत्महीनता नहीं। वह तकनीक चाहता है, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं। यही संतुलन भारत की असली ताकत है।
आज सबसे ज्यादा डर उसी बात का है कि भारत का युवा अब सुन नहीं रहा, समझ रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)