हिंदी पत्रकारिता की चलती- फिरती पाठशाला थे हजारी बाबू
प्रकाशित: 30-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बाल मुकुंद ओझा
भारत में हर साल 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। आज ही के दिन 1826 में हिंदी भाषा का पहला अखबार उदन्त मार्तण्ड के नाम से कोलकाता से शुरू हुआ था। इस अखबार के पहले प्रकाशक और संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल थे। आज हिंदी पत्रकारिता के 200 साल पूरे हो गए हैं। आज़ादी के आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता देशवासियों की सशक्त आवाज बनी। आजादी से पूर्व की पत्रकारिता समाजिक और सियासी सरोकारों से जुड़ी थी। आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता ने देश की प्रगति और विकास का मार्ग तेजी से तय किया। आज़ादी के बाद जिन लोगों ने हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया उनमें राजस्थान के विख्यात स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व विधायक प. हजारी लाल शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। 1921 में राजस्थान के कोटपूतली के ग्राम कासली में जन्मे स्वभाव से अक्खड़ व जीवनशैली के लिहाज़ से फक्कड़ इंसान प. हजारी लाल शर्मा ने मूल्यपरक पत्रकारिता को एक आयाम तो दिया ही, साथ ही वे हिंदी पत्रकारिता के प्रखर पैरोकार रहे। हिंदी पत्रकारिता के विकास में कुछ पत्रकार प्रकाश स्तंभ बने उनमें राष्ट्रदूत के संस्थापक संपादक पंडित हजारी लाल शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। दैनिक राष्ट्रदूत की स्थापना पंडित हजारी लाल शर्मा ने 1951 में की थी। रजवाडों के प्रदेश राजस्थान में पंडित हजारी लाल शर्मा ने अपने समाचार पत्र राष्ट्रदूत के जरिये हिंदी के गौरव को स्थापित करने और हिंदी को नई गति और शक्ति देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। वे हिंदी के कट्टर समर्थक थे। प. हजारी लाल शर्मा हजारी बाबू के नाम से लोकप्रिय थे। सरल, सहज और स्पष्टवादी हजारी बाबू किसी सियासी विचारधारा के अंध समर्थन नहीं थे। एक सजग सामाजिक प्रहरी और संपादक के रूप में उन्होंने विचारधारा एवं पार्टीवाद से ऊपर उठकर पत्रकारिता को नया आयाम दिया। वे अपने सहकर्मियों की राय को सुनने तथा लेखन के लिए पूरी स्वतंत्रता देने के कट्टर हिमायती थे। वे पत्रकारिता की चलती फिरती पाठशाला थे। सुमनेश जोशी, युगल किशोर चतुर्वेदी और दिनेश खरे जैसे स्वनाम धन्य पत्रकार राष्ट्रदूत के संपादक रह चुके है। राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चंद कुलिश सहित चन्द्रगुप्त वार्ष्णेय, कैलाश मिश्र, शोभागमल जैन, शिवपूजन त्रिपाठी, कमल किशोर जैन, महेश शर्मा आदि विख्यात पत्रकार और संपादक हज़ारी बाबू की पत्रकारिता की पाठशाला से निकले थे। उनके सानिध्य में अनेक लोगों ने पत्रकारिता का ककहरा सीखा।हजारी बाबू एक प्रभावशाली पत्रकार, संपादक और विचारक थे। उन्होंने अपने अखबार राष्ट्रदूत के माध्यम से सत्ता और समाज के बीच के टकराव को बेबाकी से प्रस्तुत किया। पत्रकारिता के साथ हजारी बाबू ने साहित्य को भी नई धार दी। साहित्य समाज का प्राण होता है। हजारी बाबू हिंदी साहित्य के जीते जागते प्रतिमान थे। अगर किसी पत्रकार अथवा संपादक के रूझान साहित्यिक होते हैं तो यह सोने में सुहागे के सामान है। साप्ताहिक राष्ट्रदूत के माध्यम से प्रदेश के इतिहास, साहित्य, संस्कृति, खेल और जन सरोकारों को न केवल स्थापित किया अपितु एक नयी पहचान दी।
हजारी बाबू ने साहित्य और पत्रकारिता दोनों को सहेजते हुए सामाजिक चेतना का शंखनाद किया। उन्होने सप्ताहिक राष्ट्रदूत के माध्यम से प्रदेश की लुप्त होती जा रही सांस्कृतिक परम्पराओं का गौरव बहाल कर प्रदेश के लेखकों, साहित्यकारों और कवियों को उनकी रचनाओं के प्रकाशन का मंच प्रदान किया। देखते देखते साप्ताहिक राष्ट्रदूत ने कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित किये।
हजारी बाबू के वक्त में पत्रकारिता का एक सुनहरा दौर था। तब पत्रकार कहलाना गर्वोक्ति थी। लोग बेहद सम्मान के साथ पत्रकार को सम्बोधित करते थे। समय के साथ पत्रकारिता बदल गयी। अब लोग पत्रकार शब्द सुनते ही बिगड़ैल घोड़े की तरह बिदकने लगे है। अब हजारी बाबू का दौर नहीं रहा। उस दौरान पत्रकार भूखे - प्यासे खबर की तरफ दौड़ते थे। हजारी बाबू ने ताजिंदगी मिशनरी पत्रकारिता की पैरवी की थी। वे अपने अखबार में ऐसे लोगों को जोड़ते थे जो नफासत पसंद थे। हजारी बाबू की पहुँच सत्ता के उच्च गलियारों में थी मगर उन्होंने इसका कभी दुरूपयोग नहीं किया। हजारी बाबू के मार्गदर्शन में राष्ट्रदूत ने सूचिता और पवित्रता को अपने साथ बनाये रखा और हिंदी पत्रकारिता की स्वस्थ परम्पराएँ स्थापित की। आज भी राष्ट्रदूत उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आजादी से पूर्व राजस्थान में सामंती व्यवस्था का बोलबाला था। आजादी के बाद सामंती सोच को बदलकर जनतांत्रिक व्यवस्था कायम रखने के लिए उस दौर के नेताओं और पत्रकारों ने अथक प्रयास किये। हजारी बाबू स्वतंत्रता सेनानी थे। सेवा भावना उनमें कूट कूट कर भरी थी। आम आदमी को उनके जनतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों के सांचे में ढालना जरूरी था। ऐसे में उन्होंने राष्ट्रदूत के माध्यम से लोगों के हितों के संरक्षण का मार्ग चुना। राष्ट्रदूत ने उनके बताये मार्ग पर चलकर सेवा भावना का जज्बा जगाया और पत्रकारिता की धार को नए तेवर के साथ आमदमी की बहबूदी से जोड़ा। हजारी बाबू ताजिंदगी अपने आदर्शों और सिद्धांतों से न डिगे और न डगमगाए। शासन से नजदीकियों के बावजूद अपने अखबार को सत्ता के सौदागरों से दूर रखा। हजारी बाबू का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज को प्रकाश देने की निरंतर साधना है। वे आज इस दुनियां में नहीं है किन्तु उनके विचार और संस्कार सदैव मार्ग दर्शन करते रहेंगे।
भारत में हर साल 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। आज ही के दिन 1826 में हिंदी भाषा का पहला अखबार उदन्त मार्तण्ड के नाम से कोलकाता से शुरू हुआ था। इस अखबार के पहले प्रकाशक और संपादक पंडित जुगल किशोर शुक्ल थे। आज हिंदी पत्रकारिता के 200 साल पूरे हो गए हैं। आज़ादी के आंदोलन में हिंदी पत्रकारिता देशवासियों की सशक्त आवाज बनी। आजादी से पूर्व की पत्रकारिता समाजिक और सियासी सरोकारों से जुड़ी थी। आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता ने देश की प्रगति और विकास का मार्ग तेजी से तय किया। आज़ादी के बाद जिन लोगों ने हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया उनमें राजस्थान के विख्यात स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व विधायक प. हजारी लाल शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। 1921 में राजस्थान के कोटपूतली के ग्राम कासली में जन्मे स्वभाव से अक्खड़ व जीवनशैली के लिहाज़ से फक्कड़ इंसान प. हजारी लाल शर्मा ने मूल्यपरक पत्रकारिता को एक आयाम तो दिया ही, साथ ही वे हिंदी पत्रकारिता के प्रखर पैरोकार रहे। हिंदी पत्रकारिता के विकास में कुछ पत्रकार प्रकाश स्तंभ बने उनमें राष्ट्रदूत के संस्थापक संपादक पंडित हजारी लाल शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। दैनिक राष्ट्रदूत की स्थापना पंडित हजारी लाल शर्मा ने 1951 में की थी। रजवाडों के प्रदेश राजस्थान में पंडित हजारी लाल शर्मा ने अपने समाचार पत्र राष्ट्रदूत के जरिये हिंदी के गौरव को स्थापित करने और हिंदी को नई गति और शक्ति देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। वे हिंदी के कट्टर समर्थक थे। प. हजारी लाल शर्मा हजारी बाबू के नाम से लोकप्रिय थे। सरल, सहज और स्पष्टवादी हजारी बाबू किसी सियासी विचारधारा के अंध समर्थन नहीं थे। एक सजग सामाजिक प्रहरी और संपादक के रूप में उन्होंने विचारधारा एवं पार्टीवाद से ऊपर उठकर पत्रकारिता को नया आयाम दिया। वे अपने सहकर्मियों की राय को सुनने तथा लेखन के लिए पूरी स्वतंत्रता देने के कट्टर हिमायती थे। वे पत्रकारिता की चलती फिरती पाठशाला थे। सुमनेश जोशी, युगल किशोर चतुर्वेदी और दिनेश खरे जैसे स्वनाम धन्य पत्रकार राष्ट्रदूत के संपादक रह चुके है। राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चंद कुलिश सहित चन्द्रगुप्त वार्ष्णेय, कैलाश मिश्र, शोभागमल जैन, शिवपूजन त्रिपाठी, कमल किशोर जैन, महेश शर्मा आदि विख्यात पत्रकार और संपादक हज़ारी बाबू की पत्रकारिता की पाठशाला से निकले थे। उनके सानिध्य में अनेक लोगों ने पत्रकारिता का ककहरा सीखा।हजारी बाबू एक प्रभावशाली पत्रकार, संपादक और विचारक थे। उन्होंने अपने अखबार राष्ट्रदूत के माध्यम से सत्ता और समाज के बीच के टकराव को बेबाकी से प्रस्तुत किया। पत्रकारिता के साथ हजारी बाबू ने साहित्य को भी नई धार दी। साहित्य समाज का प्राण होता है। हजारी बाबू हिंदी साहित्य के जीते जागते प्रतिमान थे। अगर किसी पत्रकार अथवा संपादक के रूझान साहित्यिक होते हैं तो यह सोने में सुहागे के सामान है। साप्ताहिक राष्ट्रदूत के माध्यम से प्रदेश के इतिहास, साहित्य, संस्कृति, खेल और जन सरोकारों को न केवल स्थापित किया अपितु एक नयी पहचान दी।
हजारी बाबू ने साहित्य और पत्रकारिता दोनों को सहेजते हुए सामाजिक चेतना का शंखनाद किया। उन्होने सप्ताहिक राष्ट्रदूत के माध्यम से प्रदेश की लुप्त होती जा रही सांस्कृतिक परम्पराओं का गौरव बहाल कर प्रदेश के लेखकों, साहित्यकारों और कवियों को उनकी रचनाओं के प्रकाशन का मंच प्रदान किया। देखते देखते साप्ताहिक राष्ट्रदूत ने कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में नए प्रतिमान स्थापित किये।
हजारी बाबू के वक्त में पत्रकारिता का एक सुनहरा दौर था। तब पत्रकार कहलाना गर्वोक्ति थी। लोग बेहद सम्मान के साथ पत्रकार को सम्बोधित करते थे। समय के साथ पत्रकारिता बदल गयी। अब लोग पत्रकार शब्द सुनते ही बिगड़ैल घोड़े की तरह बिदकने लगे है। अब हजारी बाबू का दौर नहीं रहा। उस दौरान पत्रकार भूखे - प्यासे खबर की तरफ दौड़ते थे। हजारी बाबू ने ताजिंदगी मिशनरी पत्रकारिता की पैरवी की थी। वे अपने अखबार में ऐसे लोगों को जोड़ते थे जो नफासत पसंद थे। हजारी बाबू की पहुँच सत्ता के उच्च गलियारों में थी मगर उन्होंने इसका कभी दुरूपयोग नहीं किया। हजारी बाबू के मार्गदर्शन में राष्ट्रदूत ने सूचिता और पवित्रता को अपने साथ बनाये रखा और हिंदी पत्रकारिता की स्वस्थ परम्पराएँ स्थापित की। आज भी राष्ट्रदूत उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आजादी से पूर्व राजस्थान में सामंती व्यवस्था का बोलबाला था। आजादी के बाद सामंती सोच को बदलकर जनतांत्रिक व्यवस्था कायम रखने के लिए उस दौर के नेताओं और पत्रकारों ने अथक प्रयास किये। हजारी बाबू स्वतंत्रता सेनानी थे। सेवा भावना उनमें कूट कूट कर भरी थी। आम आदमी को उनके जनतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों के सांचे में ढालना जरूरी था। ऐसे में उन्होंने राष्ट्रदूत के माध्यम से लोगों के हितों के संरक्षण का मार्ग चुना। राष्ट्रदूत ने उनके बताये मार्ग पर चलकर सेवा भावना का जज्बा जगाया और पत्रकारिता की धार को नए तेवर के साथ आमदमी की बहबूदी से जोड़ा। हजारी बाबू ताजिंदगी अपने आदर्शों और सिद्धांतों से न डिगे और न डगमगाए। शासन से नजदीकियों के बावजूद अपने अखबार को सत्ता के सौदागरों से दूर रखा। हजारी बाबू का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज को प्रकाश देने की निरंतर साधना है। वे आज इस दुनियां में नहीं है किन्तु उनके विचार और संस्कार सदैव मार्ग दर्शन करते रहेंगे।