वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

सिकल सेल मुक्त कल की ओर बढ़ती दुनिया

प्रकाशित: 19-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
योगेश कुमार गोयल
मानव सभ्यता ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निदान से लेकर जीन संपादन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों तक विज्ञान ने अनेक असाध्य रोगों के उपचार की संभावनाएं विकसित की हैं। फिर भी दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनके लिए जीवन आज भी एक निरंतर संघर्ष बना हुआ है। सिकल सेल रोग उन्हीं चुनौतियों में से एक है। यह केवल एक आनुवंशिक रक्त विकार नहीं बल्कि स्वास्थ्य असमानता, सामाजिक न्याय और चिकित्सा सुविधाओं तक समान पहुंच से जुड़ा वैश्विक प्रश्न बन चुका है। इसी वास्तविकता को रेखांकित करने के लिए प्रतिवर्ष 19 जून को ‘विश्व सिकल सेल दिवस' मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा मान्यता प्राप्त यह दिवस दुनिया का ध्यान उन लाखों रोगियों और परिवारों की ओर आकर्षित करता है, जो प्रतिदिन इस बीमारी से उत्पन्न पीड़ा, भेदभाव और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
वर्ष 2026 में विश्व सिकल सेल दिवस का वैश्विक विषय है ‘जीवन प्रत्याशा में अंतर को कम करना: सिकल सेल रोग में समानता'। यह विषय इस कठोर सच्चाई को सामने लाता है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों के बावजूद दुनिया के विभिन्न देशों और समुदायों में सिकल सेल रोगियों की जीवन प्रत्याशा में भारी अंतर मौजूद है। विकसित देशों में जहां समय पर जांच, उपचार और विशेषज्ञ देखभाल के कारण रोगी अपेक्षाकृत लंबा जीवन जी रहे हैं, वहीं निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हजारों बच्चे पांच वर्ष की आयु पूरी करने से पहले ही इस रोग के कारण दम तोड़ देते हैं। इस असमानता को समाप्त करना आज वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार हर वर्ष लगभग 2.7 लाख बच्चे सिकल सेल रोग के साथ जन्म लेते हैं। इनमें से अधिकांश जन्म उप-सहारा अफ्रीका में होते हैं, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता स्थिति को और जटिल बना देती है। वैश्विक स्तर पर लाखों लोग इस रोग के साथ जीवन जी रहे हैं। पिछले दो दशकों में रोगियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो जनसंख्या वृद्धि, बेहतर निदान तथा स्वास्थ्य आंकड़ों के अधिक सटीक संकलन का परिणाम भी है। हालांकि चिंता की बात यह है कि आज भी बड़ी संख्या में रोगियों का समय पर निदान नहीं हो पाता और वे आवश्यक उपचार से वंचित रह जाते हैं।
सिकल सेल रोग एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जो माता-पिता से बच्चों में विरासत के रूप में पहुंचता है। यह हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन में आनुवंशिक परिवर्तन के कारण उत्पन्न होता है। सामान्य परिस्थितियों में लाल रक्त कोशिकाएं गोलाकार और लचीली होती हैं, जो शरीर के प्रत्येक अंग तक ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करती हैं लेकिन सिकल सेल रोग में लाल रक्त कोशिकाएं अर्धचंद्राकार या हंसिए जैसी आकृति धारण कर लेती हैं। ये कोशिकाएं कठोर और चिपचिपी हो जाती हैं तथा रक्त वाहिकाओं में फंसकर रक्त प्रवाह को बाधित करती हैं। परिणामस्वरूप रोगी को असहनीय दर्द, एनीमिया, अंगों की क्षति और कई बार जीवन-घातक जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। सामान्य लाल रक्त कोशिकाओं का जीवनकाल लगभग 120 दिन होता है जबकि सिकल कोशिकाएं केवल 10 से 20 दिनों में नष्ट हो जाती हैं। इससे शरीर में लाल रक्त कणों की कमी उत्पन्न होती है और रोगी लगातार एनीमिया से ग्रस्त रहता है। रोग के लक्षण प्राय जन्म के पांच से छह महीने बाद दिखाई देने लगते हैं। बार-बार दर्द का दौरा पड़ना, हाथ-पैरों में सूजन, पांमण की अधिक संभावना, विकास में देरी, दृष्टि संबंधी समस्याएं और थकान इसके प्रमुख लक्षण हैं। समय के साथ यह रोग फेफड़ों, यकृत, गुर्दों, हृदय तथा प्लीहा जैसे महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।