राष्ट्रीय मेटाबोलिक हेल्थ मिशन की ओर बढ़ा भारत
प्रकाशित: 17-07-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
वीर अर्जुन संवाददाता
नई दिल्ली। देश में तेजी से बढ़ रहे डायबिटीज, मोटापा, फैटी लिवर और हृदय रोगों जैसी मेटाबोलिक बीमारियों से प्रभावी मुकाबले के लिए भारत अब राष्ट्रीय मेटाबोलिक हेल्थ मिशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा रहा है। इसी उद्देश्य से ग्लोबल मेटाबोलिक हेल्थ एलायंस ने बुधवार को अपने अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय में देश के प्रमुख चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को एक मंच पर एकत्र कर इंडिया कंट्री कलेक्टिव की स्थापना की दिशा में ऐतिहासिक पहल की।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि डायबिटीज, मोटापा, फैटी लिवर और हृदय संबंधी रोग अलग-अलग बीमारियां नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी मेटाबोलिक समस्याएं हैं। बावजूद इसके इनका उपचार अब तक विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञताओं द्वारा अलग-अलग तरीके से किया जाता रहा है, जिससे रोकथाम और उपचार दोनों प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों ने भारत की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप एकीकृत, वैज्ञानिक और साक्ष्य-आधारित राष्ट्रीय मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। बैठक में बचपन में बढ़ते मोटापे, कार्डियो-मेटाबोलिक जोखिम, राष्ट्रीय मेटाबोलिक हेल्थ रजिस्ट्री की स्थापना, बहु-केंद्रित शोध, क्लिनिकल टूलकिट, प्रशिक्षण कार्पाम तथा जन-जागरूकता अभियान जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
साथ ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्पामों के साथ समन्वय स्थापित कर भविष्य की कार्ययोजना तैयार करने पर भी सहमति बनी। इंडिया कंट्री कलेक्टिव के अध्यक्ष प्रो. अमितेश अग्रवाल ने कहा कि भारत के पास मेटाबोलिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व करने का सुनहरा अवसर है। उन्होंने कहा, "हमारा उद्देश्य केवल अलग-अलग बीमारियों का इलाज करना नहीं, बल्कि भारत की जरूरतों के अनुरूप ऐसा एकीकृत और व्यावहारिक ढांचा तैयार करना है, जिसमें रोकथाम, उपचार, शोध और स्वास्थ्य नीति सभी को एक साथ जोड़ा जाए। यह कार्यशाला राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत है, जो भविष्य में वैश्विक रणनीतियों को भी दिशा दे सकता है। यूसीएमएस एवं जीटीबी अस्पताल के मेडिसिन विभाग की निदेशक प्रोफेसर डॉ. अर्पणा रायज़ादा ने कहा कि भारत में मेटाबोलिक रोग तेजी से बढ़ रहे हैं और अब समय आ गया है कि इनसे निपटने के लिए विभिन्न विशेषज्ञताओं को एक मंच पर लाया जाए। उन्होंने कहा, "डायबिटीज, मोटापा, फैटी लिवर और हृदय रोग अब अलग-अलग समस्याएं नहीं रह गए हैं।
इनकी रोकथाम, शीघ्र पहचान और बेहतर उपचार के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। जीएमसीए, ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी निदेशक डॉ. अमित गुप्ता ने कहा कि यह पहल देश में मेटाबोलिक बीमारियों से निपटने की रणनीति को नई दिशा देगी। उनके अनुसार, शोध, नवाचार और प्रभावी स्वास्थ्य नीति के माध्यम से बीमारी का बोझ कम किया जा सकता है तथा आम नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। कार्यशाला के अंत में "इंडिया मेटाबोलिक हेल्थ आइडेंटिटी डॉक्यूमेंट" तैयार करने का निर्णय लिया गया। यह दस्तावेज़ भविष्य में राष्ट्रीय परामर्श, बहु-केंद्रित शोध, प्रशिक्षण कार्पाम, कार्यान्वयन टूलकिट, जन-जागरूकता अभियान और नीति निर्माण का आधार बनेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से भारत न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा, बल्कि मेटाबोलिक हेल्थ के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ाएगा।
नई दिल्ली। देश में तेजी से बढ़ रहे डायबिटीज, मोटापा, फैटी लिवर और हृदय रोगों जैसी मेटाबोलिक बीमारियों से प्रभावी मुकाबले के लिए भारत अब राष्ट्रीय मेटाबोलिक हेल्थ मिशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा रहा है। इसी उद्देश्य से ग्लोबल मेटाबोलिक हेल्थ एलायंस ने बुधवार को अपने अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय में देश के प्रमुख चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को एक मंच पर एकत्र कर इंडिया कंट्री कलेक्टिव की स्थापना की दिशा में ऐतिहासिक पहल की।
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि डायबिटीज, मोटापा, फैटी लिवर और हृदय संबंधी रोग अलग-अलग बीमारियां नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी मेटाबोलिक समस्याएं हैं। बावजूद इसके इनका उपचार अब तक विभिन्न चिकित्सा विशेषज्ञताओं द्वारा अलग-अलग तरीके से किया जाता रहा है, जिससे रोकथाम और उपचार दोनों प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञों ने भारत की स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप एकीकृत, वैज्ञानिक और साक्ष्य-आधारित राष्ट्रीय मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। बैठक में बचपन में बढ़ते मोटापे, कार्डियो-मेटाबोलिक जोखिम, राष्ट्रीय मेटाबोलिक हेल्थ रजिस्ट्री की स्थापना, बहु-केंद्रित शोध, क्लिनिकल टूलकिट, प्रशिक्षण कार्पाम तथा जन-जागरूकता अभियान जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
साथ ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्पामों के साथ समन्वय स्थापित कर भविष्य की कार्ययोजना तैयार करने पर भी सहमति बनी। इंडिया कंट्री कलेक्टिव के अध्यक्ष प्रो. अमितेश अग्रवाल ने कहा कि भारत के पास मेटाबोलिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व करने का सुनहरा अवसर है। उन्होंने कहा, "हमारा उद्देश्य केवल अलग-अलग बीमारियों का इलाज करना नहीं, बल्कि भारत की जरूरतों के अनुरूप ऐसा एकीकृत और व्यावहारिक ढांचा तैयार करना है, जिसमें रोकथाम, उपचार, शोध और स्वास्थ्य नीति सभी को एक साथ जोड़ा जाए। यह कार्यशाला राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत है, जो भविष्य में वैश्विक रणनीतियों को भी दिशा दे सकता है। यूसीएमएस एवं जीटीबी अस्पताल के मेडिसिन विभाग की निदेशक प्रोफेसर डॉ. अर्पणा रायज़ादा ने कहा कि भारत में मेटाबोलिक रोग तेजी से बढ़ रहे हैं और अब समय आ गया है कि इनसे निपटने के लिए विभिन्न विशेषज्ञताओं को एक मंच पर लाया जाए। उन्होंने कहा, "डायबिटीज, मोटापा, फैटी लिवर और हृदय रोग अब अलग-अलग समस्याएं नहीं रह गए हैं।
इनकी रोकथाम, शीघ्र पहचान और बेहतर उपचार के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। जीएमसीए, ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी निदेशक डॉ. अमित गुप्ता ने कहा कि यह पहल देश में मेटाबोलिक बीमारियों से निपटने की रणनीति को नई दिशा देगी। उनके अनुसार, शोध, नवाचार और प्रभावी स्वास्थ्य नीति के माध्यम से बीमारी का बोझ कम किया जा सकता है तथा आम नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। कार्यशाला के अंत में "इंडिया मेटाबोलिक हेल्थ आइडेंटिटी डॉक्यूमेंट" तैयार करने का निर्णय लिया गया। यह दस्तावेज़ भविष्य में राष्ट्रीय परामर्श, बहु-केंद्रित शोध, प्रशिक्षण कार्पाम, कार्यान्वयन टूलकिट, जन-जागरूकता अभियान और नीति निर्माण का आधार बनेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से भारत न केवल अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाएगा, बल्कि मेटाबोलिक हेल्थ के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ाएगा।