एनडीए की तरफ कदम बढ़ाए शरद पवार ने
प्रकाशित: 19-07-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
आदित्य नरेन्द्र
केन्द्र की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने महत्वाकांक्षी परिसीमन विधेयक को पास कराने के लिए जिस तरह से अपने पत्ते खोले हैं उससे विपक्ष में घबराहट बढ़ती जा रही है। परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक आपस में गहराई से जुड़े हैं। क्योंकि संसद द्वारा पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन, 2023) के तहत महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की शर्त आगामी जनगणना और परिसीमन की प्रकिया पूरी होने से जुड़ी हुई है। नवीनतम घटनाक्रम के अनुसार सरकार लोकसभा की कुल सीटों को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव लाई है। अप्रैल 2026 में इन विधेयकों (131वां संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक) को लोकसभा में पेश किया था लेकिन दो तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह पारित नहीं हो सके। विपक्ष का आरोप था कि नए परिसीमन की आड़ में दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम किया जा सकता है। लोकसभा में इस विधेयक के पास कराने के लिए पर्याप्त बहुमत न होने के बावजूद मोदी सरकार आगामी मानसून सत्र में इसे पास कराना चाहती है और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए भरसक कोशिश कर रही है जिसमें सत्ता के राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है। भाजपा के लिए यह विधेयक कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बंगाल चुनाव में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि वह विधानसभा चुनावों के लिए 15 दिन पश्चिम बंगाल में रहेंगे। इसके बावजूद भी वह 4 दिन के लिए संसद में आए ताकि इस विधेयक को पेश किया जा सके। उस समय लोग हैरान होकर पूछ रहे थे कि विधेयक को पास कराने लायक संख्या बल न होने पर भी अमित शाह इस विधेयक को क्यों पेश कर रहे हैं।
दरअसल लोग मोदी-शाह की रणनीति को भांपने में गलती कर गए। मोदी-शाह यह जानना चाहते थे कि उनके पास इस समय कितना संख्या बल है और उन्हें कितने संख्या बल की जरूरत पड़ेगी ताकि उसका इंतजाम किया जा सके। अप्रैल में जब मतदान हुआ था तब तीन सीटें खाली थी। उस समय शेष 540 में से 528 ने मतदान में हिस्सा लिया था। सरकार को 298 और विपक्ष को 230 वोट मिले थे। इस वोटिंग के बाद अमित शाह हरकत में आ गए। अप्रैल से अभी तक राज्यसभा और लोकसभा के 37 सांसद एनडीए में जुड़ चुके हैं। इनमें टीएमसी, बीजू जनता दल और शिवसेवा (यूबीटी) शामिल है। अब खबरें शरद पवार की एनसीपी के बारे में चल रहीं है। मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि शरद पवार की पार्टी के सांसद और विधायक एनडीए से जुड़ना चाहते है जिससे वह सत्ता पक्ष की मदद से अपने क्षेत्र में विकास कार्य करा सकें। शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले ने इसका इशारा यह कहते हुए दिया है कि सभी राज्यों में 50 फीसदी सीटें बढ़ाने पर हमारी पार्टी के अंदर सहमति है। अप्रैल में भी अमित शाह ने यही कहा था लेकिन उस समय उनकी पार्टी ने इसके खिलाफ वोटिंग की थी, उल्लेखनीय है कि कई साल पहले पीएम मोदी ने शरद पवार से मिलकर काम करने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने मना कर दिया था। उद्धव को समर्थन देकर सीएम बनाने के बाद भाजपा और एनसीपी (शरद पवार) के बीच खटास और बढ़ गई। बाद में पवार-शाह से भी मिले। लेकिन बात नहीं बनी। उनकी शर्तों पर मोदी-शाह तैयार नहीं थे। लेकिन अब जिस तरह से अपनी-अपनी पार्टियां तोड़कर सांसद-विधायक एनडीए का हिस्सा बन रहे हैं उससे शरद पवार की बेचैनी बढ़ रही है। वह समझ गए हैं कि यदि उन्होंने एनडीए की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया तो उन्हें एक और टूट का सामना करना पड़ सकता है। इस स्थिति को टालने के लिए यह खबर आ रही है कि वह एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना से एलायंस करके अप्रत्यक्ष रूप से एनडीए का हिस्सा बन सकते हैं। यह खबर कितनी सच है इसका पता कुछ दिनों में ही लग जाएगा। मोदी-शाह की दूरदर्शिता का फायदा भारत को भविष्य में उस समय भी मिलेगा जब एक देश-एक चुनाव का विधेयक पास कराने के लिए एनडीए मैदान में उतरेगा।
केन्द्र की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने महत्वाकांक्षी परिसीमन विधेयक को पास कराने के लिए जिस तरह से अपने पत्ते खोले हैं उससे विपक्ष में घबराहट बढ़ती जा रही है। परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक आपस में गहराई से जुड़े हैं। क्योंकि संसद द्वारा पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन, 2023) के तहत महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की शर्त आगामी जनगणना और परिसीमन की प्रकिया पूरी होने से जुड़ी हुई है। नवीनतम घटनाक्रम के अनुसार सरकार लोकसभा की कुल सीटों को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव लाई है। अप्रैल 2026 में इन विधेयकों (131वां संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक) को लोकसभा में पेश किया था लेकिन दो तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह पारित नहीं हो सके। विपक्ष का आरोप था कि नए परिसीमन की आड़ में दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम किया जा सकता है। लोकसभा में इस विधेयक के पास कराने के लिए पर्याप्त बहुमत न होने के बावजूद मोदी सरकार आगामी मानसून सत्र में इसे पास कराना चाहती है और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए भरसक कोशिश कर रही है जिसमें सत्ता के राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है। भाजपा के लिए यह विधेयक कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बंगाल चुनाव में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि वह विधानसभा चुनावों के लिए 15 दिन पश्चिम बंगाल में रहेंगे। इसके बावजूद भी वह 4 दिन के लिए संसद में आए ताकि इस विधेयक को पेश किया जा सके। उस समय लोग हैरान होकर पूछ रहे थे कि विधेयक को पास कराने लायक संख्या बल न होने पर भी अमित शाह इस विधेयक को क्यों पेश कर रहे हैं।
दरअसल लोग मोदी-शाह की रणनीति को भांपने में गलती कर गए। मोदी-शाह यह जानना चाहते थे कि उनके पास इस समय कितना संख्या बल है और उन्हें कितने संख्या बल की जरूरत पड़ेगी ताकि उसका इंतजाम किया जा सके। अप्रैल में जब मतदान हुआ था तब तीन सीटें खाली थी। उस समय शेष 540 में से 528 ने मतदान में हिस्सा लिया था। सरकार को 298 और विपक्ष को 230 वोट मिले थे। इस वोटिंग के बाद अमित शाह हरकत में आ गए। अप्रैल से अभी तक राज्यसभा और लोकसभा के 37 सांसद एनडीए में जुड़ चुके हैं। इनमें टीएमसी, बीजू जनता दल और शिवसेवा (यूबीटी) शामिल है। अब खबरें शरद पवार की एनसीपी के बारे में चल रहीं है। मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि शरद पवार की पार्टी के सांसद और विधायक एनडीए से जुड़ना चाहते है जिससे वह सत्ता पक्ष की मदद से अपने क्षेत्र में विकास कार्य करा सकें। शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले ने इसका इशारा यह कहते हुए दिया है कि सभी राज्यों में 50 फीसदी सीटें बढ़ाने पर हमारी पार्टी के अंदर सहमति है। अप्रैल में भी अमित शाह ने यही कहा था लेकिन उस समय उनकी पार्टी ने इसके खिलाफ वोटिंग की थी, उल्लेखनीय है कि कई साल पहले पीएम मोदी ने शरद पवार से मिलकर काम करने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने मना कर दिया था। उद्धव को समर्थन देकर सीएम बनाने के बाद भाजपा और एनसीपी (शरद पवार) के बीच खटास और बढ़ गई। बाद में पवार-शाह से भी मिले। लेकिन बात नहीं बनी। उनकी शर्तों पर मोदी-शाह तैयार नहीं थे। लेकिन अब जिस तरह से अपनी-अपनी पार्टियां तोड़कर सांसद-विधायक एनडीए का हिस्सा बन रहे हैं उससे शरद पवार की बेचैनी बढ़ रही है। वह समझ गए हैं कि यदि उन्होंने एनडीए की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया तो उन्हें एक और टूट का सामना करना पड़ सकता है। इस स्थिति को टालने के लिए यह खबर आ रही है कि वह एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना से एलायंस करके अप्रत्यक्ष रूप से एनडीए का हिस्सा बन सकते हैं। यह खबर कितनी सच है इसका पता कुछ दिनों में ही लग जाएगा। मोदी-शाह की दूरदर्शिता का फायदा भारत को भविष्य में उस समय भी मिलेगा जब एक देश-एक चुनाव का विधेयक पास कराने के लिए एनडीए मैदान में उतरेगा।