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सोनम का जीवन

प्रकाशित: 19-07-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
सोनम का जीवन
पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को उनके धरना स्थल जंतर-मंतर से उठाकर पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल भेज दिया जहां उनके स्वास्थ्य का चिकित्सक जांच कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस का कहना है कि स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप सोनम वांगचुक को अस्पताल में भती कराया गया है और चिकित्सकों की निगरानी में उन्हें आवश्यक उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है।
दरअसल जब 17 जुलाई को दिल्ली उच्च न्यायालय ने काकरोच जनता पाटी (सीजेपी) के लोगों की याचिका पर फैसला दिया कि सोनम का जीवन बहुमूल्य है, सरकार उनके जीवन की रक्षा करे, तभी लग गया था कि अब सोनम के धरने का समय समाप्त होने वाला है। सोनम की सरकार से मांग क्या थी, किसलिए उन्होंने 20 दिनों तक जंतर-मंतर पर धरना देकर अपने 20 प्रतिशत स्वास्थ्य को जो क्षरण किया, उसका उद्देश्य क्या था? यदि इसका तात्विक विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाता है कि सोनम ने जिस काकरोच जनता पाटी के समर्थन में इतना बड़ा कदम उठाया वह खुद ही समस्या को लेकर गंभीर नहीं थी। विरोधी पार्टियों का समर्थन हासिल करने के लिए सीजेपी को जिस तरह प्रयास करना चाहिए था, नहीं कर पाई। अब केन्द्र सरकार के खिलाफ यदि बयान देने की बात आती है तो चलते-चलाते अनमने तरीके से विरोधी पार्टियों के किसी नेता ने बयान दे दिया किन्तु पाटी के स्तर पर गंभीरता से समर्थन इसलिए नहीं किया कि इस पाटी ने राजनीति का ही मजाक बना दिया।
सच तो यह है कि 20 जुलाई से ही संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है और इस दौरान सभी विरोधी पार्टियों के नेता धरने पर बैठे सोनम की हालचाल लेने जरूर जाते क्योंकि उनके संपर्क कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों के नेताओं से हैं। इससे संसद सत्र के दौरान सुरक्षा में लगी खुफिया एजेंसियों एवं दिल्ली पुलिस दोनों की परेशानी बढ़ना स्वाभाविक थी। यही कारण है कि सोनम को धरना स्थल से हटाकर अस्पताल भेजना पड़ा।
बहरहाल अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का गांधीवादी शैली को अपनाने की प्रथा बहुत प्रचलित हो चुकी है, किन्तु वास्तविकता तो यह है कि गांधी बनना बड़ा मुश्किल है। सरकार की गलतियों पर यदि पर्याप्त विरोध विपक्षी दल व्यक्त नहीं कर पाते तभी तो सामाजिक कार्यकर्ताओं को सामने आना पड़ता है। नीट की परीक्षा के दौरान प्रश्न पत्र लीक होने के कारण युवाओं के समय की बर्बादी को लेकर सीजेपी राष्ट्रव्यापी आंदोलन करना चाहती थी क्योंकि उसे लगा कि नेपाल की तरह युवाओं में आक्रोश पैदा करके केन्द्र सरकार को अपदस्थ किया जा सकता है। इसीलिए पहले तो नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) की आलोचना की गई जो बिल्कुल सही थी। फिर शिक्षा मंत्री का नैतिकता के आधार पर त्याग पत्र मांगा गया, वह भी गलत नहीं था। क्योंकि सरकार की असफलता के लिए उसे दर्पण दिखाना गलत नहीं है किन्तु किसी घटना के आधार पर आंदोलन का तूफान खड़ा करने के उद्देश्य से दावा करना और अपनी क्षमता का वास्तविक अनुमान न लगा पाना आंदोलनकारी पाटी के भविष्य और अस्तित्व दोनों के लिए चुनौती साबित हो सकती है। सीजेपी को लगा कि वह ‘इण्डिया अगेंस्ट करप्शन' के तर्ज पर सोनम को अन्ना हजारे की तरह धरने पर बैठा देंगे तो वह भी आम आदमी पाटी की तरह अपनी राजनीति चमका लेंगे। किन्तु उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि अन्ना हजारे के धरने के पीछे कांग्रेस विरोधी ताकतें खासकर संघ परिवार का कितना बड़ा सांगठनिक समर्थन था। सीजेपी ने उस अभियान की नकल तो कर ली किन्तु किसी संगठन का समर्थन नहीं हासिल कर सकी। लब्बोलुआब यह है कि सोनम का जीवन अमूल्य है, उन्हें धरना देने से पहले हजार बारे सोचना चाहिए कि उनके धरने से समाज को क्या मिलने वाला है। रही बात सरकार की तो पाटी कोई भी हो चरित्र एक जैसा ही होता है। सरकार को लगता है कि उसकी असफलता पर आंदोलन करने वाले अराजक हैं। बाद में जब वही विपक्ष में चले जाते हैं तो उन्हें सरकार के खिलाफ आंदोलनकारी देवदूत लगते हैं। इसलिए सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे राजनीतिक पार्टियों के लिए इस्तेमाल होने से बचें।