मानसून में धुल गया संसद का मानसून सत्र—क्या सदन चलाना अब असंभव होता जा रहा है?
प्रकाशित: 17-08-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
संसद का मानसून सत्र समाप्त हो गया, लेकिन अपने पीछे एक बेहद गंभीर सवाल छोड़ गया है—क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में संसद को सुचारु रूप से चलाना अब सरकार के लिए लगभग असंभव चुनौती बनता जा रहा है? विरोध करना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन क्या विरोध का अर्थ सदन को चलने ही न देना होना चाहिए?
इस मानसून सत्र के आंकड़े चिंताजनक हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार लोकसभा की उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत और राज्यसभा की करीब 39 प्रतिशत रही। उन्होंने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, पर लगातार व्यवधान डालने का आरोप लगाया। सरकार के अनुसार सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन इनमें से केवल एक विधेयक पर दोनों सदनों में चर्चा हो सकी। यानी विधायी काम तो किसी तरह आगे बढ़ा, पर जिस विस्तृत बहस और विचार-विमर्श के लिए संसद बनी है, वही सबसे अधिक प्रभावित हुआ।
यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्र के अंतिम चरण में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को छात्र आंदोलन और परीक्षा विवाद पर दो दिन तक चर्चा करने की चुनौती दी और सवालों का जवाब देने की तत्परता जताई। इसके बावजूद गतिरोध समाप्त नहीं हुआ। विपक्ष का अपना तर्क था कि वह सरकार से पहले स्पष्ट जवाब और जवाबदेही चाहता था। कांग्रेस ने उलटे सरकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों से बचने और विपक्ष की मांगों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
यही लोकतंत्र की विडंबना है। सरकार कहती है—आइए बहस कीजिए, सवाल पूछिए, हम जवाब देंगे। विपक्ष कहता है—पहले हमारी मांगों का जवाब दीजिए। दोनों अपने-अपने राजनीतिक तर्कों पर अड़े रहते हैं और इनके बीच सबसे बड़ी कीमत संसद और देश का करदाता चुकाता है।
संसद केवल सरकार की नहीं है और न ही केवल विपक्ष की। संसद देश की 140 करोड़ जनता की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। एक-एक मिनट के संचालन में सार्वजनिक धन, प्रशासनिक संसाधन और हजारों लोगों का श्रम जुड़ा होता है। बार-बार स्थगन का नुकसान केवल आर्थिक नहीं है; उससे कहीं बड़ा नुकसान उस अवसर का है जिसमें सांसद सरकार से सवाल पूछ सकते थे, नीतियों की समीक्षा कर सकते थे और कानूनों की बारीकियों पर चर्चा कर सकते थे। संसद में व्यवधान की आर्थिक और लोकतांत्रिक कीमत को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है।
सवाल सरकार से भी पूछा जाना चाहिए कि क्या वह विपक्ष को विश्वास में लेने के लिए पर्याप्त राजनीतिक संवाद कर रही है? लेकिन विपक्ष को भी आत्ममंथन करना होगा कि विरोध और व्यवधान के बीच सीमा आखिर कहां खींची जाए? यदि हर मुद्दे पर नारेबाजी, वेल में प्रदर्शन और स्थगन ही अंतिम राजनीतिक हथियार बन जाएंगे, तो संसदीय बहस का अर्थ क्या रह जाएगा?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कम उत्पादकता के बावजूद विधेयक पारित होते जा रहे हैं। यदि विपक्ष चर्चा में भाग ही नहीं लेगा तो वह कानूनों को प्रभावित करने, संशोधन सुझाने और सरकार को सदन के भीतर जवाबदेह बनाने का अपना सबसे प्रभावी संवैधानिक अवसर स्वयं कमजोर कर देगा।
मानसून सत्र वास्तव में राजनीतिक मानसून में बह गया। अब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को तय करना है कि अगला सत्र भी शोर में बीतेगा या संसद फिर बहस, सवाल, जवाब और जवाबदेही का मंच बनेगी। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार का विरोध करना है—लेकिन संसद को ठप करना लोकतंत्र की जीत नहीं हो सकती।
-आदित्य नरेन्द्र
इस मानसून सत्र के आंकड़े चिंताजनक हैं। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार लोकसभा की उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत और राज्यसभा की करीब 39 प्रतिशत रही। उन्होंने विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, पर लगातार व्यवधान डालने का आरोप लगाया। सरकार के अनुसार सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन इनमें से केवल एक विधेयक पर दोनों सदनों में चर्चा हो सकी। यानी विधायी काम तो किसी तरह आगे बढ़ा, पर जिस विस्तृत बहस और विचार-विमर्श के लिए संसद बनी है, वही सबसे अधिक प्रभावित हुआ।
यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सत्र के अंतिम चरण में गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को छात्र आंदोलन और परीक्षा विवाद पर दो दिन तक चर्चा करने की चुनौती दी और सवालों का जवाब देने की तत्परता जताई। इसके बावजूद गतिरोध समाप्त नहीं हुआ। विपक्ष का अपना तर्क था कि वह सरकार से पहले स्पष्ट जवाब और जवाबदेही चाहता था। कांग्रेस ने उलटे सरकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों से बचने और विपक्ष की मांगों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
यही लोकतंत्र की विडंबना है। सरकार कहती है—आइए बहस कीजिए, सवाल पूछिए, हम जवाब देंगे। विपक्ष कहता है—पहले हमारी मांगों का जवाब दीजिए। दोनों अपने-अपने राजनीतिक तर्कों पर अड़े रहते हैं और इनके बीच सबसे बड़ी कीमत संसद और देश का करदाता चुकाता है।
संसद केवल सरकार की नहीं है और न ही केवल विपक्ष की। संसद देश की 140 करोड़ जनता की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। एक-एक मिनट के संचालन में सार्वजनिक धन, प्रशासनिक संसाधन और हजारों लोगों का श्रम जुड़ा होता है। बार-बार स्थगन का नुकसान केवल आर्थिक नहीं है; उससे कहीं बड़ा नुकसान उस अवसर का है जिसमें सांसद सरकार से सवाल पूछ सकते थे, नीतियों की समीक्षा कर सकते थे और कानूनों की बारीकियों पर चर्चा कर सकते थे। संसद में व्यवधान की आर्थिक और लोकतांत्रिक कीमत को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है।
सवाल सरकार से भी पूछा जाना चाहिए कि क्या वह विपक्ष को विश्वास में लेने के लिए पर्याप्त राजनीतिक संवाद कर रही है? लेकिन विपक्ष को भी आत्ममंथन करना होगा कि विरोध और व्यवधान के बीच सीमा आखिर कहां खींची जाए? यदि हर मुद्दे पर नारेबाजी, वेल में प्रदर्शन और स्थगन ही अंतिम राजनीतिक हथियार बन जाएंगे, तो संसदीय बहस का अर्थ क्या रह जाएगा?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कम उत्पादकता के बावजूद विधेयक पारित होते जा रहे हैं। यदि विपक्ष चर्चा में भाग ही नहीं लेगा तो वह कानूनों को प्रभावित करने, संशोधन सुझाने और सरकार को सदन के भीतर जवाबदेह बनाने का अपना सबसे प्रभावी संवैधानिक अवसर स्वयं कमजोर कर देगा।
मानसून सत्र वास्तव में राजनीतिक मानसून में बह गया। अब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को तय करना है कि अगला सत्र भी शोर में बीतेगा या संसद फिर बहस, सवाल, जवाब और जवाबदेही का मंच बनेगी। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार का विरोध करना है—लेकिन संसद को ठप करना लोकतंत्र की जीत नहीं हो सकती।
-आदित्य नरेन्द्र