युवा हमारी जनसांख्यिकीय शक्ति है: मोहन भागवत
प्रकाशित: 16-08-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नागपुर, (भाषा)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि युवा देश की जनसांख्यिकीय शक्ति हैं और यदि उन्हें सही मार्गदर्शन मिले तो राष्ट्र को इससे बहुत लाभ होगा, वरना वे भविष्य में समाज पर बोझ बन सकते हैं। भागवत ने जेन-जी के साथ एक सप्ताह के भीतर अपने दूसरे संवाद में यह भी कहा कि आज के युवा 30 साल बाद बूढ़े हो जाएंगे और वे केवल अपने बारे में न सोचें, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों का भी ध्यान रखें।
यह कार्पाम महाराष्ट्र के नागपुर में लोकमत मीडिया समूह द्वारा आयोजित किया गया। उन्होंने कहा, युवा हमारी जनसांख्यिकीय शक्ति हैं। यदि उनका सही ढंग से मार्गदर्शन किया जाए तो हमें इससे बहुत लाभ होगा, अन्यथा भविष्य में वे समाज पर बोझ बन सकते हैं। युवा ही कमाने वाले होंगे। रोजगार का मतलब केवल नौकरी नहीं है, बल्कि मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग भी इसमें शामिल हैं तथा उनकी मेहनत का सम्मान किया जाना चाहिए। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत का दायित्व है कि अपने नजरिये से दुनिया को भविष्य का रास्ता दिखाए और संतुलन हासिल करने में मदद करे। उन्होंने कहा कि देश को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप सोच विकसित करनी होगी। भागवत ने कहा, दुनिया अपने अधूरे नजरिये के कारण लड़खड़ा रही है। भारत का हिस्सा होने के नाते हमारा दायित्व है कि हम अपने नजरिये से दुनिया को भविष्य का रास्ता दिखाएं और उसमें संतुलन लाएं। हमें इसके लिए खुद को तैयार करना होगा। सरसंघचालक ने कार्पाम में फहराए गए 200 फुट ऊंचे तिरंगे का उदाहरण देते हुए कहा कि लोगों को सोचना चाहिए कि राष्ट्रीय ध्वज क्या दर्शाता है और भारत को ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने के लिए कितनी मेहनत करनी होगी। उन्होंने कहा, यह हमारा दायित्व है। हमें दूसरों के साथ अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। भागवत ने कहा कि देश के युवाओं को सबसे पहले यह समझना होगा कि भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, चीन और न्यूजीलैंड जैसे देशों से अलग है तथा उसे विकास एवं प्रगति के अपने मानदंड खुद तय करने चाहिए। उन्होंने कहा, हम भारत हैं और हमारी अपनी प्रतिष्ठा, गरिमा और सर्वोच्च सम्मान है। हम किस तरह का विकास चाहते हैं और प्रगति का हमारा मानदंड क्या होगा, इसके बारे में हमें अपने तथा देश के हित को ध्यान में रखते हुए खुद सोचना होगा। भागवत ने कहा कि दुनिया के बाकी हिस्सों में सोच भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रभावित है, जबकि भारत का नजरिया केवल धन कमाने तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, भारत में हम केवल धन कमाने के बारे में नहीं सोचते।
लोग कहते हैं कि पैसा तो मुर्गी भी नहीं खाएगी। हम ऐसे ही हैं। आरएसएस प्रमुख ने उद्यमिता को बढ़ावा देने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि युवाओं को साहस के साथ चुनौतियों का सामना करना होगा और सफलता हासिल करने के लिए लगातार प्रयास करना होगा। भागवत ने कहा कि भारत की बड़ी आबादी और तुलनात्मक रूप से कम भौगोलिक क्षेत्रफल के कारण वह कनाडा, अमेरिका और चीन जैसे देशों द्वारा अपनाए गए रास्ते को सीधे नहीं अपना सकता। उन्होंने कहा, जिन देशों की आबादी कम है, जिनका भौगोलिक क्षेत्र बहुत बड़ा है या जिनके पास प्रचुर संसाधन हैं, उनके लिए केवल रोजगार के बारे में सोचना पर्याप्त हो सकता है। लेकिन भारत जैसे देश की आबादी बहुत बड़ी है और उसका भौगोलिक क्षेत्र कनाडा, अमेरिका तथा चीन की तुलना में छोटा है। इसलिए हमें अपनी समस्याओं के लिए पूरी तरह अलग सोच विकसित करने की जरूरत है। इसके लिए हमें इन विषयों का गहराई से अध्ययन करना होगा।
इस अवसर पर लोकमत मीडिया समूह के संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सदस्य विजय दर्डा ने संतुलित विचार रखने वाले लोगों को साथ लाने के प्रयासों के लिए भागवत की सराहना की।
उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान संबंधों, युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और देश के सामने मौजूद अन्य चुनौतियों जैसे मुद्दों पर भागवत ने अपना रुख स्पष्ट रखा है।
दर्डा ने कहा, मैं विशेष रूप से मोहन भागवत जी के बदलाव लाने के प्रयास की सराहना करता हूं। उन्होंने संतुलित सोच रखने वाले लोगों को साथ लाने का प्रयास किया है, चाहे मुद्दा हिंदुस्तान-पाकिस्तान संबंधों का हो, युवाओं के विरोध प्रदर्शन का हो या देश के सामने खड़ी किसी अन्य चुनौती का। भागवत ने इन मुद्दों पर अपना स्पष्ट रुख रखा और लोगों को साथ लाने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि देश के युवा उसकी ताकत हैं और उनकी आकांक्षाओं, भावनाओं तथा विचारों को खासकर पुरानी पीढ़ी के लिए समझना जरूरी है।
दर्डा ने स्थानीय निकायों द्वारा संचालित लाखों स्कूलों की खराब स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि देश विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है, तो बच्चों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
इससे पहले छह अगस्त को भागवत ने जेन-जी के समर्थन में मजबूती से अपनी बात रखते हुए कहा था कि उनकी शिकायतें वास्तविक हैं और उन्हें युवाओं की ईमानदारी पर भरोसा है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया था कि युवाओं के विरोध प्रदर्शन करने से वे देशद्रोही नहीं हो जाते।
यह कार्पाम महाराष्ट्र के नागपुर में लोकमत मीडिया समूह द्वारा आयोजित किया गया। उन्होंने कहा, युवा हमारी जनसांख्यिकीय शक्ति हैं। यदि उनका सही ढंग से मार्गदर्शन किया जाए तो हमें इससे बहुत लाभ होगा, अन्यथा भविष्य में वे समाज पर बोझ बन सकते हैं। युवा ही कमाने वाले होंगे। रोजगार का मतलब केवल नौकरी नहीं है, बल्कि मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग भी इसमें शामिल हैं तथा उनकी मेहनत का सम्मान किया जाना चाहिए। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत का दायित्व है कि अपने नजरिये से दुनिया को भविष्य का रास्ता दिखाए और संतुलन हासिल करने में मदद करे। उन्होंने कहा कि देश को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप सोच विकसित करनी होगी। भागवत ने कहा, दुनिया अपने अधूरे नजरिये के कारण लड़खड़ा रही है। भारत का हिस्सा होने के नाते हमारा दायित्व है कि हम अपने नजरिये से दुनिया को भविष्य का रास्ता दिखाएं और उसमें संतुलन लाएं। हमें इसके लिए खुद को तैयार करना होगा। सरसंघचालक ने कार्पाम में फहराए गए 200 फुट ऊंचे तिरंगे का उदाहरण देते हुए कहा कि लोगों को सोचना चाहिए कि राष्ट्रीय ध्वज क्या दर्शाता है और भारत को ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने के लिए कितनी मेहनत करनी होगी। उन्होंने कहा, यह हमारा दायित्व है। हमें दूसरों के साथ अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। भागवत ने कहा कि देश के युवाओं को सबसे पहले यह समझना होगा कि भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, चीन और न्यूजीलैंड जैसे देशों से अलग है तथा उसे विकास एवं प्रगति के अपने मानदंड खुद तय करने चाहिए। उन्होंने कहा, हम भारत हैं और हमारी अपनी प्रतिष्ठा, गरिमा और सर्वोच्च सम्मान है। हम किस तरह का विकास चाहते हैं और प्रगति का हमारा मानदंड क्या होगा, इसके बारे में हमें अपने तथा देश के हित को ध्यान में रखते हुए खुद सोचना होगा। भागवत ने कहा कि दुनिया के बाकी हिस्सों में सोच भौतिकवादी दृष्टिकोण से प्रभावित है, जबकि भारत का नजरिया केवल धन कमाने तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, भारत में हम केवल धन कमाने के बारे में नहीं सोचते।
लोग कहते हैं कि पैसा तो मुर्गी भी नहीं खाएगी। हम ऐसे ही हैं। आरएसएस प्रमुख ने उद्यमिता को बढ़ावा देने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि युवाओं को साहस के साथ चुनौतियों का सामना करना होगा और सफलता हासिल करने के लिए लगातार प्रयास करना होगा। भागवत ने कहा कि भारत की बड़ी आबादी और तुलनात्मक रूप से कम भौगोलिक क्षेत्रफल के कारण वह कनाडा, अमेरिका और चीन जैसे देशों द्वारा अपनाए गए रास्ते को सीधे नहीं अपना सकता। उन्होंने कहा, जिन देशों की आबादी कम है, जिनका भौगोलिक क्षेत्र बहुत बड़ा है या जिनके पास प्रचुर संसाधन हैं, उनके लिए केवल रोजगार के बारे में सोचना पर्याप्त हो सकता है। लेकिन भारत जैसे देश की आबादी बहुत बड़ी है और उसका भौगोलिक क्षेत्र कनाडा, अमेरिका तथा चीन की तुलना में छोटा है। इसलिए हमें अपनी समस्याओं के लिए पूरी तरह अलग सोच विकसित करने की जरूरत है। इसके लिए हमें इन विषयों का गहराई से अध्ययन करना होगा।
इस अवसर पर लोकमत मीडिया समूह के संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सदस्य विजय दर्डा ने संतुलित विचार रखने वाले लोगों को साथ लाने के प्रयासों के लिए भागवत की सराहना की।
उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान संबंधों, युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और देश के सामने मौजूद अन्य चुनौतियों जैसे मुद्दों पर भागवत ने अपना रुख स्पष्ट रखा है।
दर्डा ने कहा, मैं विशेष रूप से मोहन भागवत जी के बदलाव लाने के प्रयास की सराहना करता हूं। उन्होंने संतुलित सोच रखने वाले लोगों को साथ लाने का प्रयास किया है, चाहे मुद्दा हिंदुस्तान-पाकिस्तान संबंधों का हो, युवाओं के विरोध प्रदर्शन का हो या देश के सामने खड़ी किसी अन्य चुनौती का। भागवत ने इन मुद्दों पर अपना स्पष्ट रुख रखा और लोगों को साथ लाने का प्रयास किया।
उन्होंने कहा कि देश के युवा उसकी ताकत हैं और उनकी आकांक्षाओं, भावनाओं तथा विचारों को खासकर पुरानी पीढ़ी के लिए समझना जरूरी है।
दर्डा ने स्थानीय निकायों द्वारा संचालित लाखों स्कूलों की खराब स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि देश विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखता है, तो बच्चों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
इससे पहले छह अगस्त को भागवत ने जेन-जी के समर्थन में मजबूती से अपनी बात रखते हुए कहा था कि उनकी शिकायतें वास्तविक हैं और उन्हें युवाओं की ईमानदारी पर भरोसा है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया था कि युवाओं के विरोध प्रदर्शन करने से वे देशद्रोही नहीं हो जाते।