सुरक्षा लापरवाही
प्रकाशित: 27-04-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी स्थित हिल्टन होटल में आयोजित व्हाइट हाउस करेस्पाण्डेंट्स एसोसिएशन के एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तीसरी बार निशाना बनाया गया। मात्र तीस सेकेण्ड की दूरी पर हमलावर था यदि वह सफल हो जाता तो अकेले राष्ट्रपति ट्रंप ही नहीं बल्कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भी जीवन लीला समाप्त हो जाती जो दुनिया के लिए बहुत ही डरावना उदाहरण बन जाता। अधिकारियों के मुताबिक शूटर 31 वर्षीय कोल थामस एलोन के पास शाटगन, हैंडगन और कई तरह के चाकू थे। इसका मतलब यह कि हमलावर को पहले से ही इस कार्यक्रम के आयोजन की जानकारी थी और उसने उसी होटल में रहकर हत्या की पूरी तैयारी की थी।
अमेरिका अजीब देश है। दुनिया भर से दुश्मनी करने वाले इस मुल्क के नेताओं की समझ में यह बात न आना कि एक साथ देश के सारे बड़े नेताओं खासकर नम्बर-1 और नम्बर-2 को तो नहीं ही आना चाहिए था। सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता से हमलावर पकड़ लिया गया किन्तु यदि वह सुरक्षा घेरे को पार कर राष्ट्रपति ट्रंप, उपराष्ट्रपति वेंस और दूसरे महत्वपूर्ण नेताओं के पास पहुंच जाता और अपनी साजिश में सफल हो जाता, तब तो आज अमेरिका नेतृत्वविहीन हो जाता। अपने नेताओं को इस तरह की हत्याओं में खो चुके अमेरिका की कदाचित आज भी आंख बंद है।
दूसरी जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, वह यह है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने जिस हिल्टन होटल में करेस्पाण्डेंट एसोसिएशन के इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति सहित अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सुरक्षा देने की रणनीति बनाई उसने क्यों नहीं पूरे होटल की तलाशी ली। हमारे देश में जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति आते हैं तो मौर्या शेरेटन को पूरी तरह खाली करा दिया जाता है। यहां तक कि होटल के कर्मचारियों तक की सुरक्षा जांच होती है। आखिर जहां देश का समूचा नेतृत्व मौजूद रहने वाला था, वहां की समुचित सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक के लिए क्यों न जिम्मेदार सुरक्षा एजेंसियों की चूक, लापरवाही और संभावित षड्यंत्र की जांच होनी चाहिए।
यह सच है कि अमेरिका में आग्नेय अस्त्राsं से खेलने की मानसिकता तो बचपन से ही होती है वहां के नागरिकों को किन्तु इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी कार्यक्रम में खुलेआम हथियार लेकर जाने की अनुमति मिल जाए। सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील द्वार पर बिना निमंत्रण पत्र, परिचय पत्र एवं समुचित गहन जांच के किसी व्यक्ति को कार्यक्रम स्थल में जाने ही नहीं दिया जाता। हैरानी की बात है कि आंख और दिमाग पर पट्टी बांधे सुरक्षा के जवान कर क्या रहे थे! इस तरह की लापरवाही तो जानबूझ कर ही की जाती है अथवा इसे निकम्मापन कहते हैं।
बहरहाल अमेरिका में बहुत बड़ी अनहोनी टल गई है, यह संतोष की बात है। लेकिन यदि लापरवाही की स्थिति यही रही तो इस तरह की घटनाएं भविष्य में फिर घट सकती हैं। इसलिए सुरक्षा के निर्धारित मानकों का कठोरता से पालन करें अन्यथा सदियों तक पछताने के अलावा कुछ नहीं मिलने वाला है। भारत भी अपने वीआईपी सिक्योरिटी लैप्स के दुष्परिणामों को भुगत चुका है। इसलिए हमारे देश में मल्टी एजेंसी व्यवस्था है जो समन्वय स्थापित करके अपने नेताओं की सुरक्षा करते हैं। लोकतांत्रिक देशों की मजबूरी यही है कि कुछ मामलों में उनकी सुरक्षा एजेंसियां कम्युनिस्ट या सैन्य तानाशाही देशों की तरह कार्यक्रम के पूर्व कार्रवाई नहीं कर पातीं किन्तु असुरक्षा के इस माहौल में कठोरता की जरूरत है ताकि राष्ट्रीय नेताओं की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके।
अमेरिका अजीब देश है। दुनिया भर से दुश्मनी करने वाले इस मुल्क के नेताओं की समझ में यह बात न आना कि एक साथ देश के सारे बड़े नेताओं खासकर नम्बर-1 और नम्बर-2 को तो नहीं ही आना चाहिए था। सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता से हमलावर पकड़ लिया गया किन्तु यदि वह सुरक्षा घेरे को पार कर राष्ट्रपति ट्रंप, उपराष्ट्रपति वेंस और दूसरे महत्वपूर्ण नेताओं के पास पहुंच जाता और अपनी साजिश में सफल हो जाता, तब तो आज अमेरिका नेतृत्वविहीन हो जाता। अपने नेताओं को इस तरह की हत्याओं में खो चुके अमेरिका की कदाचित आज भी आंख बंद है।
दूसरी जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, वह यह है कि अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने जिस हिल्टन होटल में करेस्पाण्डेंट एसोसिएशन के इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति सहित अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सुरक्षा देने की रणनीति बनाई उसने क्यों नहीं पूरे होटल की तलाशी ली। हमारे देश में जब भी अमेरिकी राष्ट्रपति आते हैं तो मौर्या शेरेटन को पूरी तरह खाली करा दिया जाता है। यहां तक कि होटल के कर्मचारियों तक की सुरक्षा जांच होती है। आखिर जहां देश का समूचा नेतृत्व मौजूद रहने वाला था, वहां की समुचित सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक के लिए क्यों न जिम्मेदार सुरक्षा एजेंसियों की चूक, लापरवाही और संभावित षड्यंत्र की जांच होनी चाहिए।
यह सच है कि अमेरिका में आग्नेय अस्त्राsं से खेलने की मानसिकता तो बचपन से ही होती है वहां के नागरिकों को किन्तु इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी कार्यक्रम में खुलेआम हथियार लेकर जाने की अनुमति मिल जाए। सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील द्वार पर बिना निमंत्रण पत्र, परिचय पत्र एवं समुचित गहन जांच के किसी व्यक्ति को कार्यक्रम स्थल में जाने ही नहीं दिया जाता। हैरानी की बात है कि आंख और दिमाग पर पट्टी बांधे सुरक्षा के जवान कर क्या रहे थे! इस तरह की लापरवाही तो जानबूझ कर ही की जाती है अथवा इसे निकम्मापन कहते हैं।
बहरहाल अमेरिका में बहुत बड़ी अनहोनी टल गई है, यह संतोष की बात है। लेकिन यदि लापरवाही की स्थिति यही रही तो इस तरह की घटनाएं भविष्य में फिर घट सकती हैं। इसलिए सुरक्षा के निर्धारित मानकों का कठोरता से पालन करें अन्यथा सदियों तक पछताने के अलावा कुछ नहीं मिलने वाला है। भारत भी अपने वीआईपी सिक्योरिटी लैप्स के दुष्परिणामों को भुगत चुका है। इसलिए हमारे देश में मल्टी एजेंसी व्यवस्था है जो समन्वय स्थापित करके अपने नेताओं की सुरक्षा करते हैं। लोकतांत्रिक देशों की मजबूरी यही है कि कुछ मामलों में उनकी सुरक्षा एजेंसियां कम्युनिस्ट या सैन्य तानाशाही देशों की तरह कार्यक्रम के पूर्व कार्रवाई नहीं कर पातीं किन्तु असुरक्षा के इस माहौल में कठोरता की जरूरत है ताकि राष्ट्रीय नेताओं की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके।