मानवता के माथे पर कलंक है बाल श्रम
प्रकाशित: 12-06-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
हमारी लाख कोशिशों के बाद भी देश में बाल श्रम को ख़त्म नहीं किया जा सका है। इसमें गरीबी, अशिक्षा जैसे अनेक कारण गिनाये जा सकते है मगर खेलने कूदने और शिक्षा प्राप्त करने के दिनों में बच्चों द्वारा मजदूरी करना निश्चय ही मानता पर कलंक के सामान है। बाल मजदूरी के प्रति विरोध एवं जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। साथ ही 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से श्रम न कराकर उन्हें पढ़ने लिखने के लिए जागरूक और प्रेरित करना है। बाल श्रम से हमारा तात्पर्य ऐसे कार्यों से है जिसमें काम करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित उम्र से छोटा होता है और इस प्रथा को अनेक देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने शोषित करने वाली माना है। इस वर्ष का विषय बाल श्रम को रेड कार्ड: बच्चों के लिए निष्पक्ष खेल, वयस्कों के लिए सम्मानजनक काम रखा गया है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, बाल श्रम वह कार्य है जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी क्षमता और उनकी गरिमा से वंचित करता है और जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। यह इस प्रकार का कार्य है जो बच्चों को उनके शिक्षा के अधिकार और सम्मानजनक जीवन से वंचित करता है। बाल श्रम मानवता के माथे पर कलंक है जो किसी भी देश के भविष्य को अंधकार में धकेल देता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विश्व भर में 16 करोड़ बच्चे यानि हर दस में से एक बच्चा, बाल श्रम का शिकार है। एक अनुमान के अनुसार विश्व के बाल श्रमिकों का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा भारत में है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 2 करोड़ बाल मजदूर हैं और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार तो भारत सरकार के आंकडों से लगभग ढाई गुना ज्यादा 5 करोड़ बच्चे बाल मजदूर हैं। इन बाल श्रमिकों में से 19ज्ञ् के लगभग घरेलू नौकर हैं, ग्रामीण और असंगठित क्षेत्रों में तथा कृषि क्षेत्र से लगभग 80ज्ञ् जुड़े हुए हैं। भारत सरकार ने बालश्रम पर विभिन्न कानूनों को अमलीजामा पहना कर निषेध घोषित किया है। भारत के संविधान में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से ऐसे कार्य या कारखाने आदि में नहीं रखा जाये। कारखाना अधिनियम, बाल श्रम निरोधक कानून आदि में भी बच्चों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की गई है। कानूनों के बावजूद आज भी करोड़ो बच्चों का बचपन बाल श्रम की भेंट चढ़ रहा है।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।
-बाल मुकुन्द ओझा,
जयपुर, राजस्थान।