आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार
प्रकाशित: 28-05-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
विधि संवाददाता
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को निर्वाचन आयोग के मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व में जान फूंकती है। निर्वाचन आयोग को बड़ी राहत देते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पी" ने यह भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाती है।
पी" में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। पी" ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) की धारा 21(3) के तहत विशेष पुनरीक्षण करने का अधिकार प्राप्त है।पी" ने कहा, हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते कि विवादित प्रक्रिया केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए अपनाई गई थी। बिहार में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का निपटारा करते हुए न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता मतदाता सूची की सटीकता पर निर्भर करती है।
न्यायालय ने कहा, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते। वे मूल रूप से मतदाता सूचियों की शुचिता, सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया कि निर्वाचन आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमा से बाहर जाकर काम किया। उसने कहा, एसआईआर निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व में जान फूंकती है। पहले चरण में निर्वाचन आयोग ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) शुरू किया था, जहां पिछले चार दशकों में तेजी से शहरीकरण और बड़े पैमाने पर पलायन के आधार पर मतदाता सूची से 65 लाख नाम हटाए गए थे। पी" ने तीन सवालों पर विचार किया कि क्या निर्वाचन आयोग को एसआईआर जैसी प्रक्रिया चलाने का अधिकार है, क्या एसआईआर के तहत की गई जांच किसी वैध उद्देश्य पर आधारित है, और क्या अपनाई गई प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) के प्रावधानों के विपरीत या उनका उल्लंघन करने वाली है।शीर्ष न्यायालय ने एसआईआर के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए कारणों से सहमति जताई।फैसले में कहा गया है, वैधानिक ढांचे और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की जांच करने के बाद अब हम उस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में हैं कि क्या विवादित एसआईआर का सीधे तौर पर आरपीए और उसके तहत बनाए गए नियमों से टकराव है तथा क्या यह मतदाता सूची संशोधन से जुड़े वैधानिक ढांचे का स्थान लेता है। हमारे विचार में दोनों प्रश्नों का उत्तर नहीं में है। न्यायालय ने कहा कि कानून स्वयं किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देता है, बशर्ते उसके कारण दर्ज किए जाएं और प्रक्रिया निर्वाचन आयोग के उपयुक्त समझे जाने के अनुसार अपनाई जाए। इसलिए केवल इस आधार पर इस अभ्यास को अवैध नहीं "हराया जा सकता कि यह नियमित पुनरीक्षण की सामान्य प्रक्रियाओं से हर दृष्टि से मेल नहीं खाता।पी" ने कहा, हमारे विचार में विवादित एसआईआर आरपीए और नियमों का स्थान नहीं लेता। बल्कि यह अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक दायित्व को धारा 21(3) द्वारा निर्धारित वैधानिक सीमाओं के भीतर प्रभावी बनाता है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपने वैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण किया है। पी" ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट है कि एसआईआर का उद्देश्य सीधे तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक लक्ष्य से जुड़ा है।न्यायालय ने कहा, निर्वाचन आयोग द्वारा दर्ज कारण - पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद चार दशकों से अधिक समय बीत जाना, इतने वर्षों में बड़े पैमाने पर नाम जोड़े और हटाए जाना, तेजी से शहरीकरण, पलायन और इसके परिणामस्वरूप मतदाता सूचियों में दोहराव तथा त्रुटियों की संभावना, स्पष्ट रूप से इस मूलभूत शुचिता को बनाए रखने की दिशा में हैं। शीर्ष न्यायालय के अनुसार, एसआईआर समानुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरता है और अपनाए गए उपायों का उद्देश्यों से तार्किक संबंध है। उसने कहा कि ये उपाय स्पष्ट रूप से अत्यधिक नहीं हैं और मनमाने तरीके से नाम हटाए जाने से रोकने के लिए पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय भी मौजूद हैं।याचिकाकाकर्ताओ की एक प्रमुख आपत्ति यह थी कि एसआईआर राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) जैसी प्रक्रिया के रूप में काम कर रहा है, जिसमें निर्वाचन आयोग कथित तौर पर नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि उनका तर्क था कि यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
याचिकाकर्ताओं में गैर-सरकारी संग"न एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) भी शामिल था।
पी" ने कहा कि निर्वाचन आयोग को केवल मतदाता सूची में पात्रता तय करने के सीमित उद्देश्य से नागरिकता की स्थिति की जांच करने का अधिकार है।
उसने यह भी कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाया जाना किसी व्यक्ति को गैर-नागरिक घोषित करने के बराबर नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से नागरिकता का अनुमान लगाया जाता है, लेकिन उचित और समुचित जांच के माध्यम से इस अनुमान को चुनौती दी जा सकती है।
मताधिकार से वंचित होने की स्थिति रोकने के लिए न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि नागरिकता के आधार पर हटाए गए सभी नामों के मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए।
सीजेआई ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी को अगली विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले नागरिकता संबंधी निर्णय देना होगा।
फैसले में निर्देश दिया गया कि यदि सक्षम प्राधिकारी संबंधित व्यक्ति की नागरिकता की पुष्टि करता है तो उसका नाम तुरंत मतदाता सूची में बहाल किया जाए।
न्यायालय ने कहा कि बिहार के वे निवासी, जिनके नाम अनुपस्थित (पलायन) के कारण गलती से हटा दिए गए, लेकिन जो अब भी राज्य में रह रहे हैं, वे पुनर्बहाली के लिए आवेदन देने के हकदार होंगे।
इस मामल में विस्तृत फैसला अभी आना बाकी है।
ये याचिकाएं पिछले वर्ष तब दायर की गई थीं, जब निर्वाचन आयोग ने 2025 विधानसभा चुनावों से पहले बिहार में एसआईआर की अधिसूचना जारी की थी। न्यायालय ने विस्तृत सुनवाई के बाद 29 जनवरी 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को निर्वाचन आयोग के मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व में जान फूंकती है। निर्वाचन आयोग को बड़ी राहत देते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पी" ने यह भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाती है।
पी" में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। पी" ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) की धारा 21(3) के तहत विशेष पुनरीक्षण करने का अधिकार प्राप्त है।पी" ने कहा, हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते कि विवादित प्रक्रिया केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए अपनाई गई थी। बिहार में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का निपटारा करते हुए न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता मतदाता सूची की सटीकता पर निर्भर करती है।
न्यायालय ने कहा, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते। वे मूल रूप से मतदाता सूचियों की शुचिता, सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं। उच्चतम न्यायालय ने इस दलील को खारिज कर दिया कि निर्वाचन आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों की सीमा से बाहर जाकर काम किया। उसने कहा, एसआईआर निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व में जान फूंकती है। पहले चरण में निर्वाचन आयोग ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) शुरू किया था, जहां पिछले चार दशकों में तेजी से शहरीकरण और बड़े पैमाने पर पलायन के आधार पर मतदाता सूची से 65 लाख नाम हटाए गए थे। पी" ने तीन सवालों पर विचार किया कि क्या निर्वाचन आयोग को एसआईआर जैसी प्रक्रिया चलाने का अधिकार है, क्या एसआईआर के तहत की गई जांच किसी वैध उद्देश्य पर आधारित है, और क्या अपनाई गई प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) के प्रावधानों के विपरीत या उनका उल्लंघन करने वाली है।शीर्ष न्यायालय ने एसआईआर के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए कारणों से सहमति जताई।फैसले में कहा गया है, वैधानिक ढांचे और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की जांच करने के बाद अब हम उस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में हैं कि क्या विवादित एसआईआर का सीधे तौर पर आरपीए और उसके तहत बनाए गए नियमों से टकराव है तथा क्या यह मतदाता सूची संशोधन से जुड़े वैधानिक ढांचे का स्थान लेता है। हमारे विचार में दोनों प्रश्नों का उत्तर नहीं में है। न्यायालय ने कहा कि कानून स्वयं किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण की अनुमति देता है, बशर्ते उसके कारण दर्ज किए जाएं और प्रक्रिया निर्वाचन आयोग के उपयुक्त समझे जाने के अनुसार अपनाई जाए। इसलिए केवल इस आधार पर इस अभ्यास को अवैध नहीं "हराया जा सकता कि यह नियमित पुनरीक्षण की सामान्य प्रक्रियाओं से हर दृष्टि से मेल नहीं खाता।पी" ने कहा, हमारे विचार में विवादित एसआईआर आरपीए और नियमों का स्थान नहीं लेता। बल्कि यह अनुच्छेद 324 के तहत संवैधानिक दायित्व को धारा 21(3) द्वारा निर्धारित वैधानिक सीमाओं के भीतर प्रभावी बनाता है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपने वैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण किया है। पी" ने कहा कि वह इस बात से संतुष्ट है कि एसआईआर का उद्देश्य सीधे तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक लक्ष्य से जुड़ा है।न्यायालय ने कहा, निर्वाचन आयोग द्वारा दर्ज कारण - पिछली गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद चार दशकों से अधिक समय बीत जाना, इतने वर्षों में बड़े पैमाने पर नाम जोड़े और हटाए जाना, तेजी से शहरीकरण, पलायन और इसके परिणामस्वरूप मतदाता सूचियों में दोहराव तथा त्रुटियों की संभावना, स्पष्ट रूप से इस मूलभूत शुचिता को बनाए रखने की दिशा में हैं। शीर्ष न्यायालय के अनुसार, एसआईआर समानुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरता है और अपनाए गए उपायों का उद्देश्यों से तार्किक संबंध है। उसने कहा कि ये उपाय स्पष्ट रूप से अत्यधिक नहीं हैं और मनमाने तरीके से नाम हटाए जाने से रोकने के लिए पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय भी मौजूद हैं।याचिकाकाकर्ताओ की एक प्रमुख आपत्ति यह थी कि एसआईआर राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) जैसी प्रक्रिया के रूप में काम कर रहा है, जिसमें निर्वाचन आयोग कथित तौर पर नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि उनका तर्क था कि यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
याचिकाकर्ताओं में गैर-सरकारी संग"न एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) भी शामिल था।
पी" ने कहा कि निर्वाचन आयोग को केवल मतदाता सूची में पात्रता तय करने के सीमित उद्देश्य से नागरिकता की स्थिति की जांच करने का अधिकार है।
उसने यह भी कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाया जाना किसी व्यक्ति को गैर-नागरिक घोषित करने के बराबर नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होने से नागरिकता का अनुमान लगाया जाता है, लेकिन उचित और समुचित जांच के माध्यम से इस अनुमान को चुनौती दी जा सकती है।
मताधिकार से वंचित होने की स्थिति रोकने के लिए न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि नागरिकता के आधार पर हटाए गए सभी नामों के मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाए।
सीजेआई ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी को अगली विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले नागरिकता संबंधी निर्णय देना होगा।
फैसले में निर्देश दिया गया कि यदि सक्षम प्राधिकारी संबंधित व्यक्ति की नागरिकता की पुष्टि करता है तो उसका नाम तुरंत मतदाता सूची में बहाल किया जाए।
न्यायालय ने कहा कि बिहार के वे निवासी, जिनके नाम अनुपस्थित (पलायन) के कारण गलती से हटा दिए गए, लेकिन जो अब भी राज्य में रह रहे हैं, वे पुनर्बहाली के लिए आवेदन देने के हकदार होंगे।
इस मामल में विस्तृत फैसला अभी आना बाकी है।
ये याचिकाएं पिछले वर्ष तब दायर की गई थीं, जब निर्वाचन आयोग ने 2025 विधानसभा चुनावों से पहले बिहार में एसआईआर की अधिसूचना जारी की थी। न्यायालय ने विस्तृत सुनवाई के बाद 29 जनवरी 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।