छात्रों को विरोध प्रदर्शन का अधिकार सीजेआई
प्रकाशित: 15-08-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
विधि संवाददाता
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के उस आदेश पर कड़ा रुख अपनाया जिसमें सभी राज्य बार काउंसिल को निर्देश दिया गया था कि वे नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के किसी भी स्नातक को अधिवक्ता के तौर पर पंजीकृत नहीं करें।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के हैदराबाद स्थित संस्थान के प्रस्तावित दौरे पर छात्रों के प्रदर्शन के मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि छात्रों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, वहीं प्रधान न्यायाधीश ने कहा, यह छात्रों और मेरे बीच की बात है। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पी" ने कहा कि छात्रों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है। इससे एक दिन पहले ही बीसीआई ने सभी राज्य बार काउंसिल को निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक विश्वविद्यालय के 2026 के किसी भी स्नातक का पंजीकरण नहीं किया जाए। सोशल मीडिया पर विवाद शुरू होने पर कुछ घंटों के भीतर आदेश वापस ले लिया गया। इस पी" में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, यह मेरे और छात्रों के बीच बातचीत का मामला है। वे (बीसीआई) दखल देने वाले कौन होते हैं? यह पूरी तरह अनुचित है। ये टिप्पणियां तब आईं जब बीसीआई के परिपत्र को चुनौती देने वाली याचिका का तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेख किया गया। पी" ने नालसार से कहा कि अपने छात्रों को जल्द से जल्द अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराने को कहे। उसने कहा, हम उन्हें विधिक सहायता मामलों के लिए सूची में शामिल करेंगे। प्रतिष्"ित विधि संस्थान के कुछ छात्रों ने कुलपति, कुलसचिव और प्राध्यापकों को पत्र लिखकर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में प्रधान न्यायाधीश को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित करने के किसी भी प्रस्ताव का विरोध किया है। इस समारोह की तारीख का अभी ऐलान नहीं हुआ है।पी" ने बीसीआई की कार्रवाई को पूरी तरह अनावश्यक करार देते हुए कहा, अगर यह मान भी लें कि वे (विद्यार्थी) गलत है, तब भी उन्हें प्रदर्शन करने का अधिकार है। बीसीआई का इससे कोई लेनादेना नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन का अधिकार है और कोई उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकता। उच्चतम न्यायालय ने बीसीआई के वकील से पूछा कि क्या इस तरह का निर्णय लेने के लिए काउंसिल की कोई बै"क बुलाई गई थी।पी" ने मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद के लिए तय की। न्यायालय ने बीसीआई को नोटिस जारी कर उस याचिका पर दो सप्ताह में जवाब मांगा जिसमें उसके परिपत्र को चुनौती दी गई थी। उसने निर्देश दिया कि बीसीआई या किसी अन्य राज्य बार काउंसिल के कहने पर नालसार के छात्रों या शिक्षकों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
बीसीआई की ओर से पेश वकील ने पी" को बताया कि परिपत्र वापस ले लिया गया है। मामले का उल्लेख करने वाले वरिष्" अधिवक्ता के. परमेश्वर ने पी" से कहा कि बीसीआई ने नालसार के छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए आदेश जारी किए थे। उन्होंने कहा कि केरल के एक बीसीआई सदस्य ने इस तरह के परिपत्र को जारी करने का विरोध किया था। पहले परिपत्र में, बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कहा था कि वे यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत के शामिल होने के खिलाफ अभियान से जुड़े आरोपों की जांच कर रहे हैं और उन्होंने इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने वाली रिपोर्ट मांगी है।
वकीलों के शीर्ष वैधानिक निकाय ने कहा कि मामले में अंतिम निर्णय 19 अगस्त को उसके सामने पेश की गई सामग्री पर विचार करने के बाद लिया जाएगा। बीसीआई ने 13 अगस्त को सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे अगले आदेश तक नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के किसी भी स्नातक को वकील के तौर पर पंजीकृत नहीं करें, लेकिन सोशल मीडिया पर हंगामे के बाद कुछ ही घंटों में यह आदेश वापस ले लिया गया। सोशल मीडिया पर हंगामे के बाद बीसीआई ने अपना निर्णय बदल दिया और कहा कि अधिकतर छात्र निर्देष हैं और कुछ विद्यार्थियों के कदाचार के लिए उन्हें परेशानी नहीं भुगतनी पड़े।मिश्रा ने नए बयान में कहा कि सदस्यों ने पहले जारी पत्र पर विस्तार से चर्चा की और छात्रों के पंजीकरण से संबंधित निर्देश को बदलने का फैसला आम-सहमति से लिया।उन्होंने कहा, सभी छात्रों को उनकी पसंद के राज्य बार काउंसिल में पंजीकरण कराने का अधिकार होगा। बीसीआई ने यह भी कहा कि उसे विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि कुछ शिक्षक और बाहरी लोग निर्देष छात्रों को कथित रूप से उकसाने में शामिल रहे। काउंसिल ने कहा, किसी भी छात्र को उसकी गलती नहीं होने पर परेशानी नहीं भुगतने दी जाएगी।
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के उस आदेश पर कड़ा रुख अपनाया जिसमें सभी राज्य बार काउंसिल को निर्देश दिया गया था कि वे नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के किसी भी स्नातक को अधिवक्ता के तौर पर पंजीकृत नहीं करें।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के हैदराबाद स्थित संस्थान के प्रस्तावित दौरे पर छात्रों के प्रदर्शन के मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि छात्रों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, वहीं प्रधान न्यायाधीश ने कहा, यह छात्रों और मेरे बीच की बात है। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पी" ने कहा कि छात्रों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है। इससे एक दिन पहले ही बीसीआई ने सभी राज्य बार काउंसिल को निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक विश्वविद्यालय के 2026 के किसी भी स्नातक का पंजीकरण नहीं किया जाए। सोशल मीडिया पर विवाद शुरू होने पर कुछ घंटों के भीतर आदेश वापस ले लिया गया। इस पी" में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, यह मेरे और छात्रों के बीच बातचीत का मामला है। वे (बीसीआई) दखल देने वाले कौन होते हैं? यह पूरी तरह अनुचित है। ये टिप्पणियां तब आईं जब बीसीआई के परिपत्र को चुनौती देने वाली याचिका का तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेख किया गया। पी" ने नालसार से कहा कि अपने छात्रों को जल्द से जल्द अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराने को कहे। उसने कहा, हम उन्हें विधिक सहायता मामलों के लिए सूची में शामिल करेंगे। प्रतिष्"ित विधि संस्थान के कुछ छात्रों ने कुलपति, कुलसचिव और प्राध्यापकों को पत्र लिखकर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में प्रधान न्यायाधीश को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित करने के किसी भी प्रस्ताव का विरोध किया है। इस समारोह की तारीख का अभी ऐलान नहीं हुआ है।पी" ने बीसीआई की कार्रवाई को पूरी तरह अनावश्यक करार देते हुए कहा, अगर यह मान भी लें कि वे (विद्यार्थी) गलत है, तब भी उन्हें प्रदर्शन करने का अधिकार है। बीसीआई का इससे कोई लेनादेना नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन का अधिकार है और कोई उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकता। उच्चतम न्यायालय ने बीसीआई के वकील से पूछा कि क्या इस तरह का निर्णय लेने के लिए काउंसिल की कोई बै"क बुलाई गई थी।पी" ने मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद के लिए तय की। न्यायालय ने बीसीआई को नोटिस जारी कर उस याचिका पर दो सप्ताह में जवाब मांगा जिसमें उसके परिपत्र को चुनौती दी गई थी। उसने निर्देश दिया कि बीसीआई या किसी अन्य राज्य बार काउंसिल के कहने पर नालसार के छात्रों या शिक्षकों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
बीसीआई की ओर से पेश वकील ने पी" को बताया कि परिपत्र वापस ले लिया गया है। मामले का उल्लेख करने वाले वरिष्" अधिवक्ता के. परमेश्वर ने पी" से कहा कि बीसीआई ने नालसार के छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए आदेश जारी किए थे। उन्होंने कहा कि केरल के एक बीसीआई सदस्य ने इस तरह के परिपत्र को जारी करने का विरोध किया था। पहले परिपत्र में, बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कहा था कि वे यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत के शामिल होने के खिलाफ अभियान से जुड़े आरोपों की जांच कर रहे हैं और उन्होंने इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने वाली रिपोर्ट मांगी है।
वकीलों के शीर्ष वैधानिक निकाय ने कहा कि मामले में अंतिम निर्णय 19 अगस्त को उसके सामने पेश की गई सामग्री पर विचार करने के बाद लिया जाएगा। बीसीआई ने 13 अगस्त को सभी राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे अगले आदेश तक नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के किसी भी स्नातक को वकील के तौर पर पंजीकृत नहीं करें, लेकिन सोशल मीडिया पर हंगामे के बाद कुछ ही घंटों में यह आदेश वापस ले लिया गया। सोशल मीडिया पर हंगामे के बाद बीसीआई ने अपना निर्णय बदल दिया और कहा कि अधिकतर छात्र निर्देष हैं और कुछ विद्यार्थियों के कदाचार के लिए उन्हें परेशानी नहीं भुगतनी पड़े।मिश्रा ने नए बयान में कहा कि सदस्यों ने पहले जारी पत्र पर विस्तार से चर्चा की और छात्रों के पंजीकरण से संबंधित निर्देश को बदलने का फैसला आम-सहमति से लिया।उन्होंने कहा, सभी छात्रों को उनकी पसंद के राज्य बार काउंसिल में पंजीकरण कराने का अधिकार होगा। बीसीआई ने यह भी कहा कि उसे विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि कुछ शिक्षक और बाहरी लोग निर्देष छात्रों को कथित रूप से उकसाने में शामिल रहे। काउंसिल ने कहा, किसी भी छात्र को उसकी गलती नहीं होने पर परेशानी नहीं भुगतने दी जाएगी।